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इलाज के बाद 40-45% महिलाओं को मिला मां बनने का सुख
टीबी को आमतौर पर फेफड़ों की बीमारी माना जाता है, लेकिन अब इसका एक ऐसा रूप तेजी से सामने आ रहा है, जो महिलाओं की मां बनने की क्षमता पर सीधा असर डाल रहा है। झारखंड में बड़ी संख्या में महिलाएं जननांग टीबी और पेट की टीबी से पीड़ित पाई जा रही हैं। चिंता की बात यह है कि इनमें अधिकांश महिलाओं को लंबे समय तक बीमारी का पता ही नहीं चल पाता और वे बांझपन का इलाज कराती रहती हैं। रांची की वरिष्ठ स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. कुसुम प्रसाद द्वारा वर्ष 2020 से 2025 तक किए गए अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है। उनके अनुसार पिछले छह वर्षों में उनके अस्पताल में 528 महिलाओं में प्रजनन अंगों में टीबी और पेट की टीबी की पुष्टि हुई है। इनमें अधिकांश मरीज झारखंड के अलावा बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ से भी इलाज के लिए पहुंचे थे। डॉ. कुसुम प्रसाद का कहना है कि पहले टीबी के अधिकांश मरीज फेफड़ों से जुड़े होते थे, जिनकी पहचान एक्स-रे और बलगम जांच से आसानी से हो जाती थी। लेकिन अब महिलाओं में गर्भाशय, फैलोपियन ट्यूब और पेट की टीबी के मामले बढ़ रहे हैं। यही कारण है कि कई महिलाएं वर्षों तक बांझपन का इलाज कराती रहती हैं, जबकि वास्तविक कारण टीबी होता है। हर साल मिल रहे 66 से 98 मरीज
डॉ. कुसुम प्रसाद की अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार साल 2020 से 2025 के बीच हर साल 66 से 98 महिलाओं में टीबी की पुष्टि हुई है। इसमें एब्डोमिनल टीबी और जेनाइटल टीबी दोनों के मामले शामिल हैं। उनके क्लिनिक में छह सालों में 144 महिलाअों में एब्डोमिनल टीबी और 350 में जेनाइटल टीबी की पुष्टि हुई है। 6 से 9 महीने तक चलता है इलाज
रिपोर्ट की सबसे सकारात्मक बात यह रही कि समय पर पहचान और पूरा इलाज मिलने के बाद 40- 45% महिलाओं को गर्भधारण हुआ और उन्हें संतान सुख प्राप्त हुआ। डॉ. कुसुम प्रसाद के अनुसार जननांग टीबी का इलाज सामान्यतः नौ महीने और पेट की टीबी का इलाज छह महीने तक चलता है। इलाज शुरू होने के शुरुआती 3 माह तक गर्भधारण से बचने की सलाह दी जाती है। बिना स्पष्ट लक्षणों के होती है बीमारी
विशेषज्ञों का कहना है कि जिन महिलाओं को लंबे समय तक गर्भधारण नहीं हो रहा हो या बार-बार गर्भपात हो रहा हो, उनमें जननांग टीबी की जांच भी जरूरी है। यह बीमारी अक्सर बिना स्पष्ट लक्षणों के होती है और केवल विशेष जांच से ही पकड़ में आती है। डॉ. कुसुम प्रसाद बताती हैं कि उनके अध्ययन में केवल लगभग 10 प्रतिशत मरीजों ने बताया कि परिवार में पहले किसी को टीबी हुई थी। लगातार बढ़ रहे मामले
इन लक्षणों को नजरअंदाज न करें स्त्री रोग विशेषज्ञ बोलीं…इलाज से संभव है मातृत्व
स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अर्चना पाठक का कहना है कि जननांग टीबी लाइलाज नहीं है। समय पर जांच, सही दवा और पूरा उपचार मिलने पर बड़ी संख्या में महिलाएं सामान्य जीवन जी रही हैं और मां भी बन रही हैं। बांझपन के मामलों में टीबी की संभावना को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जागरूकता सही उपचार और मातृत्व का सुख दिला सकती है। टीबी की पहचान जरूरी
रिम्स की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. मीना मेहता ने बताया कि लंबे समय तक गर्भधारण नहीं होने या बार-बार गर्भपात होने पर केवल हार्मोनल कारणों पर ही नहीं, बल्कि जननांग टीबी की संभावना पर भी विचार करना चाहिए। समय पर जांच व सही उपचार से बीमारी नियंत्रित की जा सकती है तथा कई महिलाओं को मातृत्व का सुख भी मिल सकता है। बीमारी से अनजान रहते हैं लोग
स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ डॉ. तुलिका जोशी ने कहा कि जननांग टीबी के कई मामलों में शुरुआती लक्षण स्पष्ट नहीं होते, इसलिए मरीज लंबे समय तक अनजान रहते हैं। यदि बांझपन का कारण समझ में नहीं आ रहा हो तो विशेषज्ञ की सलाह पर आवश्यक जांच करानी चाहिए। जल्द पहचान और पूरा इलाज मामले में जरूरी है। फेफड़ों तक सीमित नहीं रही टीबी : टीबी का बैक्टीरिया शरीर के किसी भी अंग तक पहुंच सकता है। महिलाओं में यह गर्भाशय, फैलोपियन ट्यूब और अंडाशय को प्रभावित कर सकता है। समय पर इलाज नहीं मिलने पर ट्यूब बंद हो सकती हैं और बांझपन की समस्या उत्पन्न हो सकती है। अब टीबी केवल फेफड़ों तक सीमित नही है। समय पर इलाज व जांच बेहद जरूरी है।- डॉ. ब्रजेश मिश्रा, हेड टीबी एंड चेस्ट विभाग, रिम्स
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