Supreme Court on Bulldozer Action: बुलडोजर एक्शन पर सुप्रीम कोर्ट ने अहम टिप्पणी की है. सुप्रीम कोर्ट की मानें तो कानून के लिए बुलडोजर चल सकता है, मगर लोगों को निशाना बनाने के लिए नहीं. जी हां, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को साफ किया कि उसके पहले के फैसले में सभी बुलडोजर एक्शन पर रोक नहीं लगाई गई है. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि तोड़-फोड़ की कार्रवाई का इस्तेमाल चुनिंदा लोगों को निशाना बनाने के लिए नहीं किया जा सकता. सुप्रीम कोर्ट में मनमाने ढंग से बुलडोजर एक्शन के आरोपों वाली अवमानना याचिका दायर हुई थी. इस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर बुलडोजर एक्शन की वैधता की जांच उसके अपने तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए. हाईकोर्ट ही इसके लिए सही जगह हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने ‘बुलडोजर जस्टिस’ पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि अवैध निर्माण और सरकारी जमीन पर अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है, मगर किसी आरोपी या उसके परिवार को चुन-चुनकर निशाना नहीं बनाया जा सकता. सीजेआई सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि बुलडोजर कानून और संविधान के दायरे में ही चलना चाहिए. इस तरह चीफ जस्टिस सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया. बेंच का मानना था कि उठाए गए मुद्दों में तथ्यों से जुड़े विवादित सवाल शामिल हैं, जिनकी विस्तार से जांच की जरूरत है.
‘अवैध कबजों के खिलाफ बुलडोजर की जरूरत है, न कि लोगों के खिलाफ’
याचिका पर सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने कहा कि अवैध कब्जों के मामलों में बुलडोजर का इस्तेमाल सही हो सकता है, लेकिन उन्होंने भेदभावपूर्ण तरीके से इसके इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी दी. उन्होंने कहा, ‘हां, जब अधिकारियों और अवैध कब्जा करने वालों की मिलीभगत से कानून के शासन का गला घोंटा जा रहा हो, तब बुलडोजर का इस्तेमाल जरूरी हो जाता है. लेकिन कानून लागू करने के नाम पर लोगों की छवि खराब नहीं की जानी चाहिए. यह बुनियादी सिद्धांतों के ख़िलाफ़ है… सवाल यह है कि क्या उस व्यक्ति के पास मंजूरी थी और क्या कानून की प्रक्रिया का पालन किया गया था?’
सीजेआई सूर्यकांत की बेंच ने कहा कि किसी भी डिमोलिशन यानी तोड़-फोड़ के मामले में मुख्य मुद्दा यह होता है कि क्या वह ढांचा कानूनी रूप से अधिकृत था और क्या अधिकारियों ने कार्रवाई करने से पहले तय कानूनी प्रक्रिया का पालन किया था. अलग-अलग मामलों की जांच के लिए हाई कोर्ट सबसे उपयुक्त हैं.
क्या मामला था
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि अधिकारियों ने बुलडोजर एक्शन पर नवंबर 2024 के अपने अहम फैसले में तय सुरक्षा उपायों का उल्लंघन किया है. हालांकि, बेंच ने कहा कि उन आरोपों के लिए तथ्यों की जांच जरूरी है, इसलिए यह जांचने के लिए कि क्या उचित प्रक्रिया का पालन किया गया था, हाई कोर्ट ही सही मंच हैं.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नवंबर 2024 के उसके फैसले को उसमें बताए गए अपवादों के साथ पढ़ा जाना चाहिए, न कि किसी अलग कानूनी प्रावधान के तौर पर. उसने यह भी कहा कि बुलडोजर एक्शन के अलग-अलग मामलों में तथ्यों से जुड़े विवादों को सुलझाने के लिए अवमानना की कार्यवाही सही तरीका नहीं है. इसके अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने सभी लंबित याचिकाओं को संबंधित हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया और हर कानूनी व तथ्यात्मक मुद्दे को नए सिरे से विचार के लिए खुला छोड़ दिया. उसने यह भी स्पष्ट किया कि कुछ अवमानना मामलों में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले जारी किए गए नोटिस, उन मामलों पर स्वतंत्र रूप से फैसला करते समय हाई कोर्ट पर कोई असर नहीं डालेंगे.
याचिका में क्या दावा किया गया था
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को उन अवमानना याचिकाओं पर विचार करने से इनकार कर दिया, जिनमें दावा किया गया था कि कोर्ट के 2024 के एक फैसले का उल्लंघन करते हुए बुलडोजर एक्शन की कार्रवाई की गई. सुनवाई के दौरान सोमनाथ में मस्जिदों को गिराए जाने से संबंधित मामले में पेश वरिष्ठ अधिवक्ता हुजैफा अहमदी ने कहा कि इस मामले में सार्वजनिक भूमि पर कोई अतिक्रमण नहीं था. उन्होंने शीर्ष अदालत के आदेशों का ‘गंभीर उल्लंघन’ किए जाने का आरोप लगाया और कहा कि अधिकारियों ने न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना करते हुए कार्रवाई की.
सीजेआई सूर्यकांत ने अहम टिप्पणी की
इस दलील पर सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, ‘‘मुख्य शिकायत यह प्रतीत होती है कि प्रक्रिया का पालन नहीं किया जा रहा है. आप (अधिकारी) कहेंगे कि प्रक्रिया का पालन किया गया है और दूसरा पक्ष इससे इनकार करेगा. क्यों न हम यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दें और हाईकोर्ट को इस पर निर्णय लेने दें.’ वहीं, महाराष्ट्र से संबंधित एक अवमानना मामले में पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सी. यू. सिंह ने दावा किया कि कई बार स्थानीय नेताओं द्वारा बुलडोजर कार्रवाई का आह्वान किए जाने के बाद ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जाती है. उन्होंने कहा कि ऐसे कई मामले हैं, जहां इस तरह की कार्रवाई स्पष्ट रूप से ‘दंडात्मक कार्रवाई’ के रूप में की जाती है.
जस्टिस बागची ने क्या कहा?
सिंह ने दलील दी कि अगर न्यायालय को लगता है कि अवमानना नहीं हुई है तो याचिका खारिज की जा सकती है. उन्होंने कहा, ‘अगर सुप्रीम कोर्ट अपने ही फैसले के लिए खड़ा नहीं होता है, तो मुझे यह कहते हुए खेद है….’ जस्टिस बागची ने इसके बाद कहा, ‘‘फैसले को कानून नहीं माना जा सकता. निर्देश कुछ शर्तों और सीमाओं के साथ दिए गए हैं. ये निर्देश केवल उन वैधानिक अधिकारों की पुन: पुष्टि के रूप में हैं, जो पहले से मौजूद हैं.’ उन्होंने आगे कहा, ‘यह फैसला इसलिए दिया गया क्योंकि न्यायालय की अंतरात्मा को झकझोर दिया गया था. निर्दोष भाव की धारणा का आधार था. हां, जब अधिकारियों और अवैध अतिक्रमणकारियों की मिलीभगत से कानून का शासन कमजोर होता है, तब बुलडोजर का इस्तेमाल जरूरी हो सकता है.’
सुप्रीम कोर्ट का बुलडोजर एक्शन पर क्या आदेश था
सुप्रीम कोर्ट ने ‘बुलडोजर एक्शन’ की आलोचना करते हुए 13 नवंबर 2024 को संपत्तियों को गिराने के मामले में देशभर के लिए दिशानिर्देश जारी किए थे. सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कार्यपालिका जज की भूमिका नहीं निभा सकती, किसी आरोपी को दोषी घोषित नहीं कर सकती और उसका घर नहीं गिरा सकती. पीठ ने कई निर्देश जारी करते हुए कहा था, ‘किसी भी संपत्ति को गिराने की कार्रवाई कारण बताओ नोटिस जारी किए बिना नहीं की जानी चाहिए.’ यह नोटिस संबंधित स्थानीय नगर निकाय कानूनों में निर्धारित अवधि के अनुसार या नोटिस की तामील की तारीख से 15 दिन के भीतर इनमें से जो अवधि बाद में समाप्त हो, उस समय तक प्रभावी होना चाहिए.’