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मानसून से पहले घर पर बनाएं Seed Ball! कम खर्च, कम मेहनत...


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मानसून से पहले घर पर बनाएं Seed Ball! कम खर्च, कम मेहनत में बढ़ेगी हरियाली

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Eco Friendly Gardening: मानसून का मौसम पौधारोपण के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है और सीड बॉल (Seed Ball) इसके लिए एक आसान व प्रभावी तरीका है. मिट्टी, गोबर या कम्पोस्ट और बीजों से तैयार की गई सीड बॉल को बारिश से पहले खुले स्थानों पर फेंका जा सकता है. वर्षा होने पर ये बीज अंकुरित होकर पौधों का रूप ले लेते हैं. इस तकनीक में कम मेहनत और कम लागत लगती है, जबकि बड़े पैमाने पर हरियाली बढ़ाने में मदद मिलती है. पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता बढ़ाने और बंजर भूमि को हरा-भरा बनाने के लिए यह तरीका बेहद उपयोगी और इको-फ्रेंडली माना जाता है.

भीलवाड़ा: मानसून का मौसम पौधारोपण के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है. बारिश शुरू होने से पहले यदि सीड बॉल (Seed Ball) तैयार कर ली जाए तो बरसात के दौरान बिना ज्यादा मेहनत के बड़ी संख्या में पौधे उगाए जा सकते हैं. सीड बॉल एक आसान और पर्यावरण के अनुकूल तरीका है, जिसमें मिट्टी, गोबर की खाद और बीज को मिलाकर छोटी-छोटी गोलियां बनाई जाती हैं. बारिश होने पर यही गोलियां धीरे-धीरे गलती हैं और इनके अंदर मौजूद बीज अंकुरित होकर पौधे का रूप ले लेते हैं. यह तरीका उन जगहों पर भी बेहद कारगर है, जहां नियमित रूप से पौधों की देखभाल करना संभव नहीं होता. स्कूल, कॉलेज, सामाजिक संगठन और आम नागरिक मानसून से पहले सीड बॉल तैयार कर हरियाली बढ़ाने के अभियान में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं. इससे कम खर्च और कम मेहनत में अधिक पौधे तैयार किए जा सकते हैं, जो आने वाले वर्षों में पर्यावरण संरक्षण का मजबूत आधार बनेंगे.

सीड बॉल बनाना बेहद आसान है और इसे कोई भी व्यक्ति घर पर तैयार कर सकता है. सबसे पहले बारीक मिट्टी लें और यदि गोबर की सड़ी हुई खाद उपलब्ध हो तो उसे मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें. इसके बाद अपनी पसंद के पौधों के एक या दो बीज इस मिश्रण में डालें. अब इसमें थोड़ा-थोड़ा पानी मिलाकर हाथों से छोटी-छोटी गोल गेंदें तैयार करें. ध्यान रखें कि गेंद ज्यादा गीली या ज्यादा सूखी न हो, ताकि वह आसानी से अपना आकार बनाए रखे. तैयार सीड बॉल को एक से दो दिन तक छाया वाली जगह पर सूखने के लिए रख दें. धूप में सुखाने से कई बार बीज की अंकुरण क्षमता प्रभावित हो सकती है, इसलिए छाया में सुखाना बेहतर माना जाता है. सूखने के बाद सीड बॉल पूरी तरह तैयार हो जाती है और इसे जरूरत पड़ने पर किसी भी उपयुक्त स्थान पर इस्तेमाल किया जा सकता है.

सीड बॉल तैयार होने के बाद इन्हें खाली जमीन, पहाड़ी क्षेत्रों, पार्कों, सड़क किनारे या ऐसे स्थानों पर फेंका जा सकता है, जहां हरियाली बढ़ाने की जरूरत हो. मानसून की पहली अच्छी बारिश के बाद मिट्टी नरम हो जाती है और सीड बॉल धीरे-धीरे गलने लगती है. इसके बाद अंदर मौजूद बीज को नमी और पोषण मिलने से वह अंकुरित होकर पौधे का रूप लेने लगता है. इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि पौधा लगाने के लिए अलग से गड्ढा खोदने या बार-बार सिंचाई करने की जरूरत नहीं पड़ती. प्राकृतिक रूप से बारिश का पानी ही बीज के विकास में मदद करता है.

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मिट्टी की परत बीज को पक्षियों, चींटियों और अन्य कीड़ों से सुरक्षित रखने का काम करती है. इसके साथ ही गोबर की खाद बीज को शुरुआती पोषण उपलब्ध कराती है, जिससे अंकुरण की संभावना बढ़ जाती है. जब बारिश होती है तो मिट्टी नरम होकर धीरे-धीरे टूटती है और बीज को प्राकृतिक वातावरण में बढ़ने का मौका मिलता है. यदि सही किस्म के स्थानीय पौधों के बीजों का उपयोग किया जाए तो उनके जीवित रहने की संभावना भी अधिक होती है. यही वजह है कि वन विभाग और कई पर्यावरण संगठन भी इस तकनीक को बढ़ावा दे रहे हैं. यह तरीका जंगलों के पुनर्विकास, बंजर भूमि को हरा-भरा बनाने और जैव विविधता को बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है.

हर परिवार मानसून से पहले कुछ सीड बॉल तैयार कर उन्हें उचित स्थानों पर डाले, तो आने वाले वर्षों में लाखों नए पौधे तैयार किए जा सकते हैं. बढ़ती आबादी, कटते जंगल और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों के बीच यह एक सरल लेकिन प्रभावी पहल साबित हो सकती है. विशेष रूप से बच्चों को इस गतिविधि से जोड़ने पर उनमें प्रकृति के प्रति प्रेम और पर्यावरण संरक्षण की भावना विकसित होती है. स्कूलों और सामाजिक संस्थाओं द्वारा सामूहिक रूप से सीड बॉल निर्माण और वितरण अभियान चलाकर लोगों को जागरूक किया जा सकता है. इस मानसून यदि हर व्यक्ति कुछ सीड बॉल बनाकर हरियाली बढ़ाने का संकल्प ले, तो आने वाले समय में इसका सकारात्मक प्रभाव पर्यावरण, वन्यजीवों और मानव जीवन तीनों पर देखने को मिलेगा.



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