रांची: झारखंड की राजधानी रांची के पवन कुमार झा जेपीएससी के फील्ड में काफी जाना माना नाम है. शायद ही कोई उनको न जानता हो. उनकी खुद की कोचिंग सेंटर विजय स्टडी सर्किल है और उनके द्वारा पढ़ाए गए नहीं भी तो कम से कम एक बार में 70 से अधिक बच्चे जेपीएससी निकालते हैं. इसीलिए बच्चों के बीच काफी पॉप्युलर हैं. अब तक वह हजारों बच्चों को ऑफिसर बना चुके हैं. आइये जानते हैं उनके बारे में.
पवन कुमार झा ने बताया कि वह 2 बार यूपीएससी फेल हुए हैं. हालांकि उनके द्वारा सुपर 30 बैच चलता है, जिसमें केवल गरीब बच्चों को लिया जाता है. इसमें से पिछली बार 13 बच्चों ने यह एक्जाम क्रैक किया था. ऐसे में टीचर होने की वजह से पवन कुमार झा समाज के प्रति भी अपनी नैतिक जिम्मेदारी निभा रहे हैं. उन्होंने बताया कि शिक्षा पर सबका अधिकार है और सबको समान अवसर जरूर मिलना चाहिए.
कभी वह भी रहते थे डिप्रेशन में
पवन कुमार झा ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि वह जब यूपीएससी में फेल हुए तो डिप्रेशन में चले गए थे. क्योंकि उन्होंने अपनी सारी जिंदगी सिर्फ पढ़ाई में झोंक दी थी. ऐसे में उनके पास कोई खास नौकरी भी नहीं थी. उन्हें लगा कि अब उनका करियर पूरी तरह से बर्बाद हो चुका है. उनके पूरे अटेम्प्ट भी चले गए थे, तब उनके दोस्त ने कहा कि तुम रोते क्यों हो, तुम अफसर बनने के लिए नहीं, बल्कि अफसर बनाने के लिए पैदा लिए हो, नौकर नहीं मालिक बनो” . यह बातें उनके दिमाग में बैठ गई और वहीं से एक नई शुरुआत हुई.
पिता के निधन ने बदल दी जिंदगी
वह बताते हैं कि दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे थे तो बीच में पिताजी का निधन हो गया. पिता बिहार सरकार में कर्मचारी थे, लेकिन उनके जाने के बाद जिम्मेदारी काफी बढ़ गई. दिल्ली छोड़कर वापस पटना आना पड़ा और वहीं पर असली संघर्ष शुरू हुआ. 2002 में वह रांची आए और उस समय केवल महीने के अगर 5000 कमा लेता था, तो यह मेरे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि होती थी.
एक टूटे रूम में किया है गुजारा
पवन कुमार झा अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि जब रांची आया था तो एक रूम था और वह आधा ऐसा था कि बारिश के मौसम में आधे रूम में पानी गिरता रहता था. आधे रूम में ही रहना पड़ता था, लेकिन आज ईमानदारी और मेहनत के दम पर रांची में मेरे दो फ्लैट हैं, अपने परिवार के साथ आराम से रह रहे हैं.
सुपर 30 बैच है बेहद ही खास
आज उनके पास सुपर 30 बैच है. हर साल कुछ ऐसे बच्चे आते हैं, जिनके पास पैसे नहीं होते हैं, लेकिन उनके अंदर काबिलियत होती है, लगन होती है. ऐसे में उन बच्चों के लिए यह स्पेशल बौच चलाया जाता है. पिछली बार 13 बच्चों ने एग्जाम निकाला था, यह हर साल होता है. उनको एक टेस्ट देना होता है जो पास करते हैं, उनसे ₹1 भी नहीं लिया जाता है.
सफलता का कोई नहीं है शॉर्टकट
पवन कुमार बताते हैं कि सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता है. अगर आप ईमानदारी से मेहनत कर रहे हैं, आपकी नियत सही है और अगर आप किसी परीक्षा में फिर भी फेल कर जाते हैं तो हताश होने की जरूरत नहीं है. मेहनत कभी बेकार नहीं जाती है. आगे चलकर आपको इसका फल किसी न किसी रूप में जरूर मिलेगा. बस आपको थोड़ा सब्र और धैर्य रखने की जरूरत है.