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Palamu Kharif Farming: पलामू में इस वर्ष सामान्य से कम बारिश और एल नीनो के प्रभाव के कारण धान की खेती प्रभावित हो रही है. कई खेत अब भी खाली पड़े हैं और किसान रोपाई नहीं कर सके हैं. कृषि विशेषज्ञ डॉ. प्रमोद कुमार ने किसानों को केवल धान पर निर्भर रहने के बजाय अरहर और ज्वार की सहफसली खेती अपनाने की सलाह दी है. उन्होंने बताया कि अरहर की बुवाई से पहले बीज उपचार जरूरी है. वहीं, कम पानी में तैयार होने वाली ज्वार की खेती बदलते मौसम में किसानों के लिए सुरक्षित और लाभदायक विकल्प साबित हो सकती है.
पलामू: खरीफ सीजन में किसान मुख्य रूप से धान की खेती करते हैं. लेकिन इस वर्ष पलामू जिले में सामान्य से कम बारिश होने के कारण खरीफ खेती प्रभावित हो रही है. एल नीनो के प्रभाव की वजह से पर्याप्त वर्षा नहीं हुई है. इसके चलते जिले के अधिकांश खेत अब भी खाली पड़े हैं. बड़ी संख्या में किसान धान की रोपाई नहीं कर सके हैं. कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आने वाले दिनों में भी अच्छी बारिश नहीं होती है, तो किसानों को केवल धान पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. उन्हें वैकल्पिक फसलों की खेती पर भी ध्यान देना चाहिए. ऐसी स्थिति में अरहर और ज्वार की सहफसली खेती किसानों के लिए बेहतर और लाभदायक विकल्प साबित हो सकती है.
बुवाई से पहले बीज का उपचार
कृषि विशेषज्ञ डॉ. प्रमोद कुमार ने लोकल18 से बातचीत में बताया कि अरहर की बुवाई से पहले बीज का उपचार जरूर करना चाहिए. उन्होंने कहा कि अरहर की फसल में उकठा (विल्ट) रोग की समस्या अक्सर देखने को मिलती है. इस रोग के कारण पौधे सूखने लगते हैं और उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है. उन्होंने बताया कि इस रोग से बचाव के लिए बुवाई से पहले बीज का उपचार कार्बेंडाजिम या मैनकोजेब दवा से करना चाहिए. बीज उपचार करने से फसल की शुरुआती अवस्था में रोग का खतरा काफी कम हो जाता है. साथ ही पौधों का विकास भी बेहतर होता है.
सहफसली खेती अपनाने की सलाह
डॉ. प्रमोद कुमार ने किसानों को अरहर के साथ ज्वार की सहफसली खेती अपनाने की सलाह दी. उन्होंने बताया कि इस पद्धति में चार कतार अरहर और दो कतार ज्वार लगाने की सिफारिश की जाती है. दोनों फसलें एक-दूसरे के अनुकूल होती हैं. इससे खेत में रोग और कीटों का प्रकोप भी अपेक्षाकृत कम रहता है. उन्होंने कहा कि सहफसली खेती से एक ही खेत में दो फसलें तैयार होती हैं. इससे खेती का जोखिम कम हो जाता है. यदि किसी एक फसल को नुकसान होता है, तो दूसरी फसल किसानों को आर्थिक सहारा देती है. इससे किसानों की आय बढ़ने की भी संभावना रहती है.
काफी कम पानी की जरूरत
डॉ. प्रमोद कुमार ने बताया कि ज्वार को श्री अन्न (मोटा अनाज) की श्रेणी में रखा गया है. इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसकी खेती के लिए धान की तुलना में काफी कम पानी की जरूरत होती है. ऐसे में कम बारिश होने पर भी किसान इसकी सफल खेती कर सकते हैं. डॉ. प्रमोद कुमार ने कहा कि यदि बारिश की कमी के कारण धान की खेती प्रभावित होती है, तो ज्वार किसानों के लिए अच्छा विकल्प बन सकता है. इसका उपयोग खाद्यान्न के रूप में किया जा सकता है. वहीं, पशुओं के लिए इसका चारा भी काफी उपयोगी होता है.
सुरक्षित और लाभदायक विकल्प
डॉ. प्रमोद कुमार के मुताबिक, बदलते मौसम और अनियमित वर्षा की स्थिति को देखते हुए किसानों को खेती की रणनीति में बदलाव करना होगा. अरहर और ज्वार की सहफसली खेती ऐसे समय में सुरक्षित और लाभदायक विकल्प साबित हो सकती है. इससे किसानों का जोखिम कम होगा और कम बारिश की स्थिति में भी उन्हें बेहतर उत्पादन और आय मिलने की संभावना बनी रहेगी.
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न्यूज़18इंडिया में कार्यरत हैं. आजतक से रिपोर्टर के तौर पर करियर की शुरुआत फिर सहारा समय, ज़ी मीडिया, न्यूज नेशन और टाइम्स इंटरनेट होते हुए नेटवर्क 18 से जुड़ी. टीवी और डिजिटल न्यूज़ दोनों विधाओं में काम करने क…
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