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क्या गाली देने वालों को हो सकती है सजा, अभ‍िजीत दीपके और...


नई दिल्ली: दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET-UG से जुड़े विरोध प्रदर्शन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभद्र और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल हुआ. जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान गाली देने वाली 25 वर्षीय युवती के खिलाफ ‘जीरो एफआईआर’ दर्ज होने के बाद एक बड़ा कानूनी सवाल उठ खड़ा हुआ है. क्या किसी नेता, सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति या सामान्य नागरिक को गाली देना अपने आप अपराध है? क्या केवल आपत्तिजनक शब्द बोलने पर जेल हो सकती है? और आंदोलन के आयोजक या प्रवक्ता इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताकर कानूनी कार्रवाई से बच सकते हैं?

मामले में सामने आई जानकारी के मुताबिक, महिला की पहचान सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के आधार पर की गई और नोएडा में जीरो एफआईआर दर्ज की गई. जीरो एफआईआर का अर्थ यह है कि घटना किसी दूसरे थाना क्षेत्र में हुई हो तब भी कोई पुलिस स्टेशन प्रारंभिक मुकदमा दर्ज कर उसे संबंधित क्षेत्र की पुलिस को भेज सकता है. मामले की अंतिम धाराएं और कार्रवाई जांच के तथ्यों पर निर्भर करेंगी.

सौरभ दास ने क्‍या कहा?
इस बीच कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) से जुड़े सौरभ दास ने कथित आपत्तिजनक भाषा के मामले में आपराधिक न्याय व्यवस्था के इस्तेमाल पर सवाल उठाया है. उनका कहना था कि जिस व्यक्ति को टिप्पणी से ठेस पहुंची है वह मानहानि जैसे कानूनी उपाय अपना सकता है लेकिन केवल आपत्तिजनक भाषण के आधार पर आपराधिक मशीनरी का इस्तेमाल उचित नहीं है. यह बचाव कानूनी बहस का हिस्सा हो सकता है लेकिन अंतिम निर्णय वीडियो, बोले गए शब्दों, संदर्भ, इरादे और उनके संभावित प्रभाव को देखने के बाद ही होगा.

क्या हर गाली पर दर्ज हो सकता है मुकदमा?
इसका सीधा जवाब है- नहीं…

भारतीय न्याय संहिता 2023 में ऐसी कोई एक अलग धारा नहीं है जो हर प्रकार की गाली या असभ्य भाषा को अपने आप अपराध घोषित करती हो. कानून यह देखता है कि शब्द किस परिस्थिति में बोले गए, किसे निशाना बनाया गया, उनका उद्देश्य क्या था और क्या उनसे हिंसा, डर, सार्वजनिक अशांति या प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने की आशंका थी. अदालतें पहले भी स्पष्ट कर चुकी हैं कि केवल बदतमीजी, रूखापन या गाली देना ही पर्याप्त नहीं होता. पुराने IPC की धारा 504, जिसकी जगह अब लगभग समान तत्वों वाली BNS की धारा 352 ने ली है उन मामलों में अदालतों ने कहा है कि अभियोजन को यह दिखाना होगा कि अपमान जानबूझकर किया गया और उससे शांति भंग होने या दूसरा अपराध होने की संभावना थी. इसलिए किसी भी वायरल वीडियो को देखकर सीधे यह कहना सही नहीं होगा कि वक्ता को निश्चित रूप से जेल होगी लेकिन यदि शब्दों के साथ आवश्यक कानूनी तत्व साबित होते हैं तो कई धाराएं मुश्किल बढ़ा सकती हैं.

BNS की धारा 352: जानबूझकर अपमान और शांति भंग का खतरा
इस तरह के मामले में सबसे अधिक चर्चा BNS की धारा 352 की होती है. यह धारा उस स्थिति से जुड़ी है जिसमें कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति का जानबूझकर अपमान करता है और उसे उकसाता है यह जानते हुए या इरादा रखते हुए कि इससे सार्वजनिक शांति भंग हो सकती है या कोई अन्य अपराध हो सकता है.

इस धारा के तहत दोषी पाए जाने पर अधिकतम दो साल की जेल, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी कसौटी है. पुलिस को केवल यह दिखाना पर्याप्त नहीं होगा कि शब्द बेहद आपत्तिजनक थे. यह भी दिखाना होगा कि वक्ता का इरादा उकसाने का था या उसे पता था कि उसके शब्दों से शांति भंग होने की संभावना है. जंतर-मंतर जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील और भीड़ वाले प्रदर्शन में बोले गए शब्दों का संदर्भ जांच में महत्वपूर्ण हो सकता है. क्या शब्द केवल व्यक्तिगत गुस्से में बोले गए थे या उनका मकसद भीड़ को भड़काना था-इसी अंतर से धारा 352 का भविष्य तय हो सकता है.

धमकी भी दी तो धारा 351 बढ़ा सकती है परेशानी
यदि गाली के साथ जान से मारने, चोट पहुंचाने, प्रतिष्ठा बिगाड़ने या संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की धमकी दी गई हो तो मामला BNS की धारा 351, यानी आपराधिक धमकी के तहत आ सकता है. इस धारा में यह देखा जाता है कि क्या किसी व्यक्ति को डराने या उसे कोई काम करने अथवा न करने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से धमकी दी गई. सामान्य आपराधिक धमकी में दो साल तक की सजा का प्रावधान हो सकता है. गंभीर धमकी-जैसे मौत, गंभीर चोट या आग से संपत्ति नष्ट करने की धमकी के मामलों में सजा सात साल तक जा सकती है. इसलिए वीडियो में इस्तेमाल किए गए सटीक शब्द बहुत महत्वपूर्ण होंगे. केवल अपशब्द और स्पष्ट धमकी के बीच कानून बड़ा अंतर करता है.

झूठा आरोप लगाकर प्रतिष्ठा खराब की तो धारा 356
यदि अपमान के दौरान किसी व्यक्ति पर झूठा आरोप लगाया गया. उसके बारे में ऐसा दावा प्रकाशित या प्रसारित किया गया जिससे उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा तो BNS की धारा 356 के तहत मानहानि का सवाल उठ सकता है.
मानहानि केवल गाली से नहीं बनती. सामान्यतः यह देखना होता है कि-
– कोई आरोप या दावा किया गया
– वह किसी व्यक्ति से संबंधित था
– उसे दूसरों तक पहुंचाया गया
– और उससे उस व्यक्ति की सामाजिक या सार्वजनिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचने की आशंका थी.

हालांकि मानहानि कानून में कई अपवाद भी हैं. जनहित में सद्भावना से की गई आलोचना, सार्वजनिक सेवक के कार्यों पर उचित टिप्पणी और सत्य से जुड़े कुछ बचाव उपलब्ध हो सकते हैं. इसलिए किसी सरकार या प्रधानमंत्री की कठोर राजनीतिक आलोचना और झूठे व्यक्तिगत आरोप के बीच कानूनी अंतर किया जाएगा. केवल यह तथ्य कि बयान किसी बड़े राजनीतिक नेता के खिलाफ दिया गया, अपने आप उसे अपराध नहीं बना देता. लोकतंत्र में सरकार और उसके नेताओं की आलोचना संरक्षित राजनीतिक अभिव्यक्ति का हिस्सा हो सकती है लेकिन आलोचना, गाली, धमकी और झूठे मानहानिकारक आरोप की कानूनी श्रेणियां अलग-अलग हैं.

सार्वजनिक शरारत वाली धारा 353 कब लग सकती है?
यदि कोई व्यक्ति झूठी सूचना, अफवाह या रिपोर्ट फैलाता है और उससे जनता में भय पैदा होने, सार्वजनिक शांति के खिलाफ अपराध होने या समुदायों के बीच दुश्मनी बढ़ने की संभावना होती है तो BNS की धारा 353 पर भी विचार हो सकता है. इस धारा के तहत सामान्य मामलों में तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। धार्मिक स्थल या धार्मिक सभा में कुछ गंभीर मामलों में सजा पांच साल तक जा सकती है लेकिन केवल प्रधानमंत्री को गाली देने से धारा 353 अपने आप नहीं लग जाएगी. इसके लिए झूठी सूचना, अफवाह या सार्वजनिक शरारत से जुड़े विशेष तत्व होने चाहिए.

महिला को निशाना बनाया तो धारा 79
अगर किसी महिला की मर्यादा का अपमान करने के इरादे से उसके लिए आपत्तिजनक शब्द, आवाज, इशारा या हरकत की जाती है तो BNS की धारा 79 लागू हो सकती है. इसमें अधिकतम तीन साल की साधारण कैद और जुर्माने का प्रावधान है. वर्तमान कथित मामले में निशाना प्रधानमंत्री बताए जा रहे हैं इसलिए धारा 79 सीधे प्रासंगिक दिखाई नहीं देती लेकिन राजनीतिक विवादों में यदि महिला नेताओं, पुलिसकर्मियों, पत्रकारों या प्रदर्शनकारियों के खिलाफ लैंगिक और अश्लील शब्द इस्तेमाल किए जाते हैं तो यह धारा लागू हो सकती है.

क्या आयोजक भी जिम्मेदार हो सकते हैं?
सिर्फ इस आधार पर कि कथित बयान किसी संगठन के प्रदर्शन में दिया गया, आयोजकों या नेताओं की आपराधिक जिम्मेदारी अपने आप तय नहीं होती. पुलिस को यह दिखाना होगा कि आयोजकों ने
– ऐसे भाषण की योजना बनाई,
– वक्ता को उकसाया,
– बयान का समर्थन किया,
– या अपराध में किसी प्रकार सहायता की. केवल मंच पर मौजूद होना, संगठन से जुड़ा होना या बाद में बयान का कानूनी बचाव करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता. इसलिए दीपके, सौरभ दास या किसी अन्य आयोजक की भूमिका के बारे में निष्कर्ष जांच के साक्ष्यों के बिना नहीं निकाला जा सकता.



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