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Palamu Sawan Celebation: पलामू के तिसीबार गांव शिव जी का एक मंदिर है जिसे झारखंड का इकलौता विश्वनाथ मंदिर कहा जाता है. यहां हर साल सावन के महीने में हजारों श्रद्धालु आते हैं. इस बार भी नजारा कुछ ऐसा ही है. 16 किमी की कांवर यात्रा कर भक्तों ने बाबा विश्वनाथ का जलाभिषेक किया.
पलामू. सावन शुरू हो गया है. यह महीना शुरू होते ही पलामू जिले का तिसीबार गांव पूरी तरह शिवमय हो उठता है. वहीं, पांडू प्रखंड स्थित बांकी नदी के तट पर बसे झारखंड विश्वनाथ मंदिर में इस वर्ष भी हजारों श्रद्धालुओं की आस्था उमड़ पड़ी. जिला मुख्यालय मेदिनीनगर से करीब 60 किलोमीटर दूर स्थित इस धाम से भव्य कांवर यात्रा निकाली गई, जिसमें आसपास के 15 से 20 गांवों के शिवभक्त शामिल हुए. बोल बम और हर-हर महादेव के जयघोष से पूरा इलाका भक्तिमय हो गया.
16 किमी की पदयात्रा की
बता दें कि श्रद्धालु मंदिर परिसर से कांवर लेकर लगभग 16 किलोमीटर की पदयात्रा करते हुए बांकी नदी के तिसीबार त्रिवेणी घाट पहुंचे. वहां वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पवित्र जल भरने के बाद कांवरिए चपिया, धनुडीह, झरना, डाला, ढांचाबार, मुरमा सहित कई गांवों से गुजरते हुए पुनः मंदिर पहुंचे और भगवान विश्वनाथ का विधि-विधान से जलाभिषेक किया. यात्रा के दौरान जगह-जगह ग्रामीणों ने श्रद्धालुओं का स्वागत किया और सेवा शिविर भी लगाए.
झारखंड का विश्वनाथ मंदिर
मंदिर से जुड़े शैलेश कुमार सिंह बताते हैं कि झारखंड विश्वनाथ मंदिर राज्य का अपनी तरह का इकलौता विश्वनाथ धाम माना जाता है. इसी विशेष पहचान के कारण इसका नाम ‘झारखंड विश्वनाथ मंदिर’ रखा गया. उन्होंने बताया कि इस धाम के निर्माण में संरक्षक विनय कुमार दुबे की महत्वपूर्ण भूमिका रही. शुरुआत में यहां केवल एक छोटा चबूतरा और शिवलिंग था, लेकिन वर्ष 2007 में ग्रामीणों के सहयोग से इसका भव्य निर्माण कराया गया. मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के लिए वाराणसी से आए विद्वान पुरोहितों ने वैदिक विधि से अनुष्ठान संपन्न कराया और तभी इस धाम का नाम झारखंड विश्वनाथ मंदिर रखा गया.
सच्चे मन से की गई प्रार्थना नहीं जाती व्यर्थ
मंदिर की देखरेख करने वाले सोना दुबे बताते हैं कि पहले यह स्थान देवधाम के रूप में प्रसिद्ध था. भव्य मंदिर बनने के बाद यहां धार्मिक गतिविधियां लगातार बढ़ी हैं. सावन, महाशिवरात्रि, नवरात्र और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी जैसे पर्व पूरे उत्साह के साथ मनाए जाते हैं. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि बाबा विश्वनाथ के दरबार में सच्चे मन से की गई प्रार्थना कभी व्यर्थ नहीं जाती.
साल 2012 से हो रही है यात्रा
उन्होंने आगे बताया कि मंदिर निर्माण के पांच वर्ष बाद, वर्ष 2012 में कांवर यात्रा की शुरुआत हुई थी. तब से यह यात्रा लगातार आयोजित की जा रही है और हर साल इसका स्वरूप और अधिक भव्य होता जा रहा है. सावन भर चलने वाली इस धार्मिक परंपरा में प्रतिदिन श्रद्धालु त्रिवेणी घाट से जल लेकर बाबा विश्वनाथ का जलाभिषेक करते हैं. यह यात्रा केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि क्षेत्र की सामाजिक एकता, सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक आस्था का भी प्रतीक बन चुकी है.
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Raina Shukla is an experienced journalist and content professional with nearly two decades of experience in print and digital media. She holds a Master’s degree in Mass Communication and Journalism from Bundelk…
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