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सागर की डॉक्टर हरिसिंह गौर सेंट्रल यूनिवर्सिटी में LAW डिपार्टमेंट में की एक रिसर्च में चौंकाने वाला सच निकलकर सामने आया है इस रिसर्च में पाया गया कि अज्ञानता, गरीबी, भाषा और जजों की कमी की वजह से पेंडेंसी का मामला बढ़ता जा रहा है. जिसमें क्रिमिनल मामलों के 77% कैदी ऐसे हैं जो जेल में बंद है
बुंदेलखंड में एक कहावत है कि अगर कोर्ट कचहरी के चक्कर में फंस गए तो न्याय पाने के लिए एडिया घिस जाती हैं. यानी की कोर्ट में केस गया तो न्याय नहीं तारीख पर तारीख मिलती हैं.
और यह सिर्फ कहावत या बुंदेलखंड का हाल नहीं है. बल्कि देश में न्याय पाने के लिए कोर्ट ट्रायल में फंसे 77% कैदी और उनके परिजन भी इसी स्थिति से गुजर रहे है. हर बार इन्हें तारीख पर तारीख मिल जाती है.
सागर की डॉक्टर हरिसिंह गौर सेंट्रल यूनिवर्सिटी में LAW डिपार्टमेंट में की एक रिसर्च में चौंकाने वाला सच निकलकर सामने आया है इस रिसर्च में पाया गया कि अज्ञानता, गरीबी, भाषा और जजों की कमी की वजह से पेंडेंसी का मामला बढ़ता जा रहा है. जिसमें क्रिमिनल मामलों के 77% कैदी ऐसे हैं जो जेल में बंद है और अंडर ट्रायल है यानी की वर्षों से उनकी कोर्ट में सुनवाई तो हो रही लेकिन ना तो वह गुनहगार साबित हो पा रहे और ना ही बेगुनाह हो पा रहे. इसमें कई मामले ऐसे हैं 30 साल से अधिक लंबे समय से कोर्ट में ट्रायल चल रहा है लेकिन कोई डिसीजन नहीं हो पाया. इस वजह से जो कैदी देश भर की जेल में बंद है जेल में ओवरक्राउड की समस्या बढ़ रही है और सरकार का लगभग डेढ़ से दो प्रतिशत जीडीपी इसको मेंटेन करने में खर्च हो रहा है.
जेल में बंद 77% कैदियों को मिल रही तारीख
पीएचडी करने वाले वैभव सिंह यादव बताते हैं कि रिस्ट्रक्चर ट्रायल सिस्टम इन इंडिया क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम टॉपिक पर शोध किया है. अपने 4 साल लंबे रिसर्च में उन्होंने पाया कि मैं जो न्याय पाने की जो प्रक्रिया है वह बहुत पुरानी है. जिसको अब रिस्ट्रक्चर करने की आवश्यकता है ताकि लोगों को समय पर न्याय मिल सके.वैभव आगे बताते हैं कि नेशनल ज्यूडिशरी डाटा के अनुसार देशभर की निचली अदालतो में तकरीबन 5 करोड़ मामले पेंडिंग है. जिसमें 3.8 करोड़ क्रिमिनल मामले शामिल है. इसमें अगर मध्य प्रदेश की बात की जाए तो 1 लाख 61 हजार कुल मामले पेंडिंग हैं. जिसमें 133000 से अधिक क्रिमिनल मामले शामिल है. इसकी एक बड़ी वजह है भारत में जजों की कमी भी है एक रिपोर्ट के अनुसार देश में प्रति 10 लाख व्यक्ति मात्र 15 जज है जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 150 और यूरोप में 220 का है भारत में भी अगर पेंडिंग मामलों को जल्द खत्म करना है तो प्रति लाख कम से कम 50 जज होने चाहिए.
आधुनिक टेक्नोलॉजी का सही तरीके से इस्तेमाल
गरीबी अज्ञानता और भाषा की कमी का एक उदाहरण सागर में ही देखने को मिला जहां खुरई निवासी एक व्यक्ति को 14 साल के लिए सजा सुनाई गई लेकिन हाई कोर्ट ने इस सजा को 7 साल कर दिया था. लेकिन ना तो परिवार को उसकी जानकारी लगी ना ही सिस्टम के माध्यम से उस व्यक्ति तक यह बात पहुंची, जिसका नतीजा यह हुआ की 7 साल के वजाय 11 साल 7 महीने तक जेल में रहे. 4 साल 7 महीने एक्स्ट्रा जेल में रखने को लेकर हाई कोर्ट के आदेश में आर्टिकल 21 के तहत सोहन नाम के व्यक्ति को मध्य प्रदेश सरकार से 25 लाख हर्जाने के रूप में देने आदेशित किया गया. ताकि इस तरह की गलती दोबारा ना हो.वैभव कहते हैं कि अगर इस व्यवस्था को रिस्ट्रक्चर किया जाए तो कुछ तेजी आ सकती है जैसे आधुनिक टेक्नोलॉजी का सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए, जजों की संख्या को बढ़ाया जाए. जो भाषा को लेकर परेशानी आती है उसको क्षेत्रीय भाषा के अनुरूप किया जाए, ताकि हर व्यक्ति उसको समझ सके इसके अलावा जो समन भेजना, वारंट भेजना पर सरकारी आर्डर भेजने में लचीलापन होता है. उसमें तेजी लाई जाए. जिससे ट्रायल जल्दी कंप्लीट हो न्याय जल्द मिल सके लोगों का भरोसा न्याय पालिका पर और अधिक मजबूत हो.