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DRDO Defence Plan: भारत अपने डिफेंस सिस्टम को लगातार अपग्रेड कर रहा है. 21वीं सदी में वॉरफेयर का स्वरूप काफी हद तक बदल चुका है. अब फाइटर जेट और मिसाइल के साथ ही ड्रोन भी काफी अहम हो गया है. DRDO ने इस दिशा में बड़ा कदम उठाया है.
DRDO ने ड्रोन वॉरफेयर को लेकर नया प्लान तैयार किया है. (फाइल फोटो/Reuters)
रिपोर्ट: आकाश शर्मा
DRDO ने देश के स्टार्टअप्स और (MSMEs को अत्याधुनिक सैन्य ड्रोन तकनीक विकसित करने के लिए आमंत्रित किया है. DRDO ने जाम प्रूफ ड्रोन स्वॉर्म के विकास के लिए प्रस्ताव आमंत्रित किए हैं. इसमें 50 ड्रोन होंगे, जो एक-दूसरे से मात्र आधा मीटर की दूरी बनाए रखते हुए सटीक उड़ान भर सकेंगे. इस DRDO की टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड (TDF) योजना के तहत लागू किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य घरेलू रक्षा तकनीक को बढ़ावा देना और स्टार्टअप्स को उन्नत रक्षा प्रणालियों के विकास में भागीदारी का अवसर देना है. ‘डेवलपमेंट ऑफ क्लोज फॉर्मेशन फ्लाइंग ऑफ मल्टीपल ड्रोन्स’ नामक इस परियोजना के तहत बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों को शामिल नहीं किया गया है. इसका उद्देश्य जमीनी स्तर पर इनोवेशन को प्रोत्साहित करना और स्वदेशी रक्षा उद्योग को मजबूत बनाना है. भारतीय सशस्त्र बलों द्वारा भविष्य के युद्धक्षेत्र में स्वायत्त प्रणालियों और ड्रोन तकनीक के बढ़ते उपयोग को देखते हुए इस परियोजना को महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान मिली सीख
एक्सपर्ट का मानना है कि मई 2025 में हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान UAV (Unmanned Aerial Systems) ने निगरानी, खुफिया जानकारी जुटाने और सटीक हमलों में अहम भूमिका निभाई थी. इस अनुभव ने यह स्पष्ट कर दिया कि भविष्य के युद्धों में स्वदेशी, सुरक्षित और अत्यधिक समन्वित ड्रोन नेटवर्क की आवश्यकता और अधिक बढ़ने वाली है. DRDO के दिशा-निर्देशों के अनुसार इस ड्रोन स्वॉर्म में एक ‘मास्टर ड्रोन’ होगा, जो 49 ‘स्लेव ड्रोन’ का संचालन करेगा. मास्टर ड्रोन ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन से निर्देश प्राप्त करेगा और सभी ड्रोन को एक निर्धारित ग्रिड में संचालित करेगा. सबसे बड़ी तकनीकी चुनौती यह होगी कि सभी ड्रोन केवल 500 मिलीमीटर की दूरी पर उड़ते हुए भी आपस में टकराए बिना स्थिर रहें. प्रत्येक ड्रोन को सभी दिशाओं में अधिकतम पांच सेंटीमीटर की सटीकता के साथ अपनी स्थिति बनाए रखनी होगी.
इस वजह से होगा बेहद खास
परियोजना के तहत ड्रोन को अत्यंत कठिन भौगोलिक और मौसमीय परिस्थितियों में भी काम करने योग्य बनाया जाएगा. ये ड्रोन 5000 मीटर तक की ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों में उड़ान भरने, मंडराने और सुरक्षित लौटने में सक्षम होंगे. साथ ही 20 मीटर प्रति सेकंड तक की तेज हवाओं में भी उनकी स्थिरता बनी रहेगी. दुश्मन द्वारा कम्यूनिकेशन सिस्टम को बाधित करने की आशंका को देखते हुए ड्रोन स्वॉर्म में अत्यधिक सुरक्षित और एंटी इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग कम्यूनिकेशन सिस्टम विकसित करना अनिवार्य होगा.
2 किलो तक का पेलोड
प्रत्येक ड्रोन को दो किलोग्राम तक का पेलोड ले जाने में सक्षम होना चाहिए, जिसमें कैमरे, सेंसर या इलेक्ट्रॉनिक युद्ध से जुड़े उपकरण शामिल हो सकते हैं. पूरी प्रणाली को पैकिंग खोलने के पांच मिनट के भीतर उड़ान के लिए तैयार होना होगा. इसके अलावा बैटरी कम से कम 30 मिनट की उड़ान देने में सक्षम हो और केवल 15 मिनट में दोबारा चार्ज हो सके.
मेक इन इंडिया
‘मेक इन इंडिया’ को बढ़ावा देने के उद्देश्य से DRDO ने स्पष्ट किया है कि पूरी प्रणाली का कम से कम 70 प्रतिशत हिस्सा स्वदेशी घटकों से तैयार किया जाना चाहिए. साथ ही प्रतिद्वंद्वी देशों से प्राप्त व्यावसायिक पुर्जों के उपयोग पर प्रतिबंध रहेगा. इस परियोजना के लिए DRDO विकास लागत का 90 प्रतिशत तक अनुदान के रूप में उपलब्ध कराएगा. चयनित कंपनी को 12 महीने के भीतर कार्यशील प्रोटोटाइप तैयार करना होगा, जिसके बाद एक वर्ष तक DRDO की सुविधाओं में परीक्षण किए जाएंगे. 24 महीने की परियोजना पूरी होने पर कंपनी को 50 ड्रोन, अतिरिक्त बैटरियां और संपूर्ण सॉफ्टवेयर कोड DRDO को सौंपने होंगे. माना जा रहा है कि यह पहल भारतीय सेना को अगली पीढ़ी की ड्रोन क्षमता उपलब्ध कराने के साथ-साथ देश में आत्मनिर्भर रक्षा एवं एयरोस्पेस उद्योग को भी नई गति देगी.