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Nagaur Temple History : नागौर के पांडूखां गांव में 1500 साल पुराना श्री कुंती माता मंदिर है. इसे पांडवा ओरण भी कहते हैं. मान्यता है कि पांडवों ने यहां तपस्या की थी. मंदिर में प्राचीन शिलालेख और मूर्तियां हैं. दिर के गर्भगृह में तीन प्रमुख प्रतिमाएं स्थापित हैं. बीच में महिषासुर मर्दिनी माता, बाईं ओर माता कुंती और दाईं ओर सिंह पर विराजमान संगमरमर की दुर्गा माता की प्रतिमा है.
Ajab Gajab: नागौर की धरती पर इतिहास, आस्था और लोकमान्यताओं से जुड़े अनेक ऐसे स्थल हैं, जिनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं. जिले के मेड़ता के निकट स्थित पांडूखां गांव में श्री कुंती माता का एक प्राचीन मंदिर मौजूद है. इसे पांडवा ओरण के नाम से भी जाना जाता है. माना जाता है कि यह मंदिर करीब 1500 साल पुराना है. स्थानीय मान्यता के अनुसार वनवास के दौरान पांडवों ने यहां तपस्या की थी. यही नहीं, मंदिर के सामने स्थित प्राचीन बावड़ी का निर्माण भी पांडवों ने कराया था. आज भी जब तालाब सूखता है, तब यह बावड़ी अपने प्राचीन स्वरूप में दिखाई देती है.
मंदिर के पुजारी कुंतीदास के अनुसार, मंदिर परिसर में कई प्राचीन शिलालेख मौजूद हैं. इन पर उस समय की लिपि अंकित है. मंदिर के प्रवेश द्वार पर माता के सामने स्थापित दो सिंहों की प्रतिमाएं भी इसकी प्राचीनता की गवाही देती हैं. इनमें एक सिंह का सिर और दूसरे का पैर खंडित है. करीब आठ वर्ष पहले बावड़ी से 1260 ईस्वी का एक पत्थर का अवशेष भी मिला था. इसके अलावा विशेष धातु से बनी एक बाल्टी भी बावड़ी से निकली थी, जिस पर आज तक जंग नहीं लगा है.
गर्भगृह में स्थापित हैं तीन प्रमुख प्रतिमाएं
मंदिर के गर्भगृह में तीन प्रमुख प्रतिमाएं स्थापित हैं. बीच में महिषासुर मर्दिनी माता, बाईं ओर माता कुंती और दाईं ओर सिंह पर विराजमान संगमरमर की दुर्गा माता की प्रतिमा है. गर्भगृह के बाईं ओर गणेशजी की प्रतिमा के पास भी एक प्राचीन शिलालेख सुरक्षित रखा गया है. मान्यता है कि इस मंदिर की प्रसिद्धि इतनी बढ़ी कि बाद में गांव का नाम भी पांडूखां पड़ गया.
रोज सुबह 4 बजे होती है पहली आरती
इस मंदिर की सबसे खास परंपरा इसकी आरती है. पुजारी बताते हैं कि यहां प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में सुबह 4 बजे पहली आरती होती है. यह परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है और उनके पूर्वज भी इसी समय माता की पूजा-अर्चना करते थे. रात 9 बजे मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं. विशेष अवसरों पर माता को लापसी और दाल-बाटी का भोग लगाया जाता है. वहीं शारदीय नवरात्रि की अष्टमी पर यहां विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं.
हालांकि यह प्राचीन धाम अभी भी पर्यटन के नक्शे पर ज्यादा प्रसिद्ध नहीं हो पाया है, लेकिन नागौर के अलावा राजसमंद सहित राजस्थान के कई जिलों और दूसरे राज्यों से श्रद्धालु अपनी कुलदेवी के दर्शन के लिए यहां पहुंचते हैं. इतिहास, धार्मिक आस्था और रहस्यमयी विरासत को समेटे यह मंदिर आज भी उन मान्यताओं को जीवंत बनाए हुए है, जो पांडवों के वनवास काल से जुड़ी लोककथाओं में सदियों से सुनाई जाती रही हैं.
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आनंद पाण्डेय वर्तमान में News18 हिंदी (राजस्थान डिजिटल) में बतौर कंटेंट प्रोड्यूसर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. पिछले 5 वर्षों से सक्रिय पत्रकारिता के क्षेत्र में अ…
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