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Kailash Mansarovar Yatra Experience: जब कैलाश मानसरोवर ने मुझे बुलाया… अद्भुत, अविस्मरणीय,...


रात के लगभग दस बजे थे. मैं मानसरोवर के तट पर खड़ी थी. चारों ओर घना अंधेरा पसरा हुआ था. बर्फ़ीली हवा पूरे वेग से चल रही थी और उसकी सिहरन शरीर के आर-पार उतर रही थी. दूर-दूर तक कोई आवाज़ नहीं थी. ऐसा मौन, जिसे केवल महसूस किया जा सकता है. मैंने सामने देखने की कोशिश की, लेकिन कैलाश दिखाई नहीं दे रहा था. तभी मेरी नज़र दूर एक ऐसी उजली आभा पर ठहर गई, जो अंधेरे के बीच किसी दिव्य दीप की तरह चमक रही थी. आश्चर्य यह था कि उस रात पूर्णिमा भी नहीं थी, फिर भी उस दिशा में मानो चांदनी उतर आई हो. मैंने उत्सुकता से पूछा- “वहां क्या है?” किसी ने धीमे से उत्तर दिया- “उधर कैलाश है…”

मैं निःशब्द रह गई. पर्वत दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन उसकी उपस्थिति स्पष्ट महसूस हो रही थी. उस क्षण मन बिल्कुल शांत हो गया. विचार जैसे कहीं ठहर गए. आंखें उसी दिव्य आभा पर टिकी रहीं और भीतर एक अनकही अनुभूति जन्म लेने लगी. ऐसा लगा, जैसे स्वयं भगवान शिव अपनी मौन उपस्थिति का एहसास करा रहे हों. तभी मुझे वर्षों से सुनी हुई वह बात याद आई- “कैलाश के दर्शन करने कोई नहीं जाता, कैलाश स्वयं बुलाता है.” उस रात मुझे पहली बार लगा कि यह केवल एक कहावत नहीं, बल्कि हज़ारों यात्रियों के अनुभवों से उपजा सत्य है. शायद मेरा बुलावा भी आख़िरकार आ ही गया था…

वैसे कैलाश के बारे में लिखना आसान नहीं है. यह केवल एक पर्वत नहीं, बल्कि एक ऐसी अनुभूति है जिसे शब्दों में बांधना लगभग असंभव है. उसकी ऊर्जा, उसका चैतन्य, उसका रहस्य और उसका मौन… इन सबको महसूस तो किया जा सकता है, लेकिन पूरी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता. शायद यही कारण है कि जो लोग कैलाश की यात्रा करके लौटते हैं, वे अक्सर कहते हैं कि उन्होंने केवल एक यात्रा नहीं की, बल्कि स्वयं को एक नए रूप में पाया.

कहा जाता है कि कैलाश के दर्शन करने कोई अपनी इच्छा से नहीं जाता. वहां वही पहुंचता है, जिसे स्वयं शिव बुलाते हैं. यह केवल एक धार्मिक मान्यता नहीं, बल्कि हज़ारों यात्रियों के अनुभवों से उपजा विश्वास है. अनेक लोग वर्षों तक योजना बनाते हैं, सारी तैयारियां कर लेते हैं, लेकिन अंतिम समय में कोई न कोई बाधा आ जाती है. वहीं कुछ लोग अचानक बिना किसी विशेष योजना के वहां पहुंच जाते हैं. मानो सब कुछ किसी अदृश्य शक्ति द्वारा पहले से ही तय हो.

कैलाश की परिक्रमा दुनिया की सबसे कठिन आध्यात्मिक यात्राओं में गिनी जाती है. समुद्र तल से लगभग 18500 हज़ार फीट की ऊंचाई, ऑक्सीजन की कमी, बर्फ़ीली हवाएं, कठोर मौसम और लगातार बदलती परिस्थितियां हर क़दम पर आपकी परीक्षा लेती हैं. कहा जाता है कि कैलाश जाने वाले लगभग 90 फ़ीसदी लोग किसी न किसी कारण से पूरी परिक्रमा नहीं कर पाते. लेकिन यदि मन में अटूट श्रद्धा, दृढ़ संकल्प और शिव पर अटूट विश्वास हो, तो कठिन से कठिन राह भी सरल लगने लगती है.

मेरे मन में भी एक दिन यही संकल्प जन्मा था कि जीवन में एक बार कैलाश अवश्य जाना है. उस संकल्प का बीज आज से लगभग पच्चीस वर्ष पहले पड़ा था. वर्ष 2000 में मैं पत्रकारिता कर रही थी. उसी दौरान मुझे मुलुंड के एक आर्किटेक्ट परिवार का इंटरव्यू लेने का अवसर मिला. वे हाल ही में कैलाश-मानसरोवर की यात्रा करके लौटे थे. बातचीत के दौरान उन्होंने अपनी पूरी यात्रा का ऐसा सजीव वर्णन किया कि मैं मानो स्वयं उस रास्ते पर चलने लगी. उन्होंने बर्फ़ से ढकी चोटियों, मानसरोवर की दिव्यता, कठिन परिक्रमा और हर क़दम पर महसूस होने वाली अलौकिक ऊर्जा के बारे में जिस भाव से बताया, उसने मेरे मन में एक गहरी छाप छोड़ दी.

इंटरव्यू समाप्त हो गया, लेकिन कैलाश मेरे भीतर बस गया. उस दिन पहली बार मन में एक विचार उठा—जीवन में चाहे कुछ भी हो जाए, एक बार कैलाश अवश्य जाना है. समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा. पत्रकारिता की व्यस्तता, परिवार, ज़िम्मेदारियां और जीवन की भागदौड़ में यह इच्छा कहीं मन के एक कोने में शांत होकर बैठ गई. लेकिन वह कभी समाप्त नहीं हुई.

क़रीब उन्नीस वर्ष बाद, वर्ष 2019 में, मुंबई प्रेस क्लब में मेरी मुलाक़ात मेरी पत्रकार मित्र रश्मि पुराणिक से हुई. वह उसी समय कैलाश यात्रा करके लौटी थीं. बातचीत के दौरान जब उन्होंने परिक्रमा के अनुभव सुनाने शुरू किए, तो वर्षों पहले मन में बोया गया वह बीज अचानक फिर से अंकुरित हो उठा. उन्होंने केवल रास्तों की कठिनाइयों का वर्णन नहीं किया. उन्होंने बताया कि वहां पहुंचने के बाद व्यक्ति के भीतर क्या परिवर्तन होता है. कैसे हर क़दम पर अहंकार टूटता है, कैसे प्रकृति मनुष्य को उसकी वास्तविक सीमाओं का एहसास कराती है और कैसे कैलाश के सामने पहुंचकर मन पूरी तरह शांत हो जाता है. उनकी बातें सुनते-सुनते मैंने उसी क्षण मन ही मन निर्णय ले लिया कि अब यह सपना केवल सपना नहीं रहेगा. अब मुझे कैलाश जाना ही है.

रश्मि ने जिस टूर ऑपरेटर के साथ यात्रा की थी, उसका विवरण भी मुझे दिया. मैंने उसी समय अगले वर्ष की तैयारी शुरू कर दी. यह केवल टिकट बुक कराने भर की तैयारी नहीं थी. मुझे पता था कि कैलाश केवल इच्छा से नहीं, बल्कि शारीरिक और मानसिक तैयारी से भी जीता जाता है. लिहाज़ा, मैंने नियमित रनिंग शुरू की. सुबह-शाम पैदल चलना शुरू किया. योग और प्राणायाम को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाया, ताकि ऊंचाई पर होने वाली सांस की कठिनाइयों का सामना कर सकूं.

सब कुछ योजना के अनुसार चल रहा था. लेकिन तभी पूरी दुनिया पर कोविड-19 महामारी का संकट टूट पड़ा. पूरे देश में ही नहीं पूरी दुनिया में लॉकडाउन लग गया. सीमाएं बंद हो गईं. पूरी दुनिया जैसे थम गई. इसके चलते कैलाश की यात्रा भी अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गई. महामारी समाप्त होने के बाद भी भारतीय पासपोर्ट धारकों के लिए चीन ने यात्रा की अनुमति नहीं दी. हर वर्ष नई उम्मीद बंधती, लेकिन फिर कोई न कोई कारण सामने आ जाता. ऐसा लगने लगा मानो कैलाश अभी भी मुझे बुलाने के लिए तैयार नहीं था. आख़िरकार वर्ष 2025 में भारतीय यात्रियों के लिए यात्रा फिर से शुरू हुई. लेकिन इस बार भी परिस्थितियां मेरे पक्ष में नहीं थीं.

उसी समय मैंने दुनिया की सबसे कठिन अल्ट्रा मैराथनों में शामिल 90 किलोमीटर की कॉमरेड्स मैराथन पूरी की थी. शरीर को पर्याप्त आराम देना आवश्यक था. मजबूरी में उस वर्ष भी कैलाश की योजना टालनी पड़ी. एक बार फिर प्रतीक्षा… लेकिन इस बार मैंने तय कर लिया था कि अगला अवसर हाथ से नहीं जाने दूंगी. साल 2026 की शुरुआत होते ही मेरी तैयारी फिर शुरू हो गई. मैंने लोनावला में आयोजित 65 किलोमीटर की लंबी दौड़ में भाग लिया. रोज़ाना कई किलोमीटर पैदल चलना, योग, प्राणायाम और शारीरिक अभ्यास मेरी दिनचर्या बन गए. अब यह केवल यात्रा की तैयारी नहीं रह गई थी. ऐसा लगने लगा था कि मैं स्वयं को कैलाश के योग्य बनाने की कोशिश कर रही हूं. धीरे-धीरे हमारे 14 लोगों का एक समूह तैयार हुआ. सबने तय किया कि इस बार हर हाल में कैलाश यात्रा करेंगे. जाने की योजना जुलाई की थी.

लेकिन जैसे-जैसे समय नज़दीक आने लगा, एक-एक करके साथी निजी कारणों से पीछे हटने लगे. किसी की नौकरी की समस्या, किसी के परिवार की मजबूरी, किसी की स्वास्थ्य संबंधी चिंता. कुछ ही दिनों में पूरा समूह बिखर गया. अंत में केवल मैं रह गई. एक क्षण के लिए मेरा मन भी डगमगाया. क्या इतनी कठिन यात्रा अकेले करनी चाहिए? क्या केवल टूर ऑपरेटर के भरोसे इतनी दूर निकल जाना उचित होगा? मन में इस तरह के अनेक प्रश्न उठे. लेकिन उसी क्षण भीतर से एक आवाज़ आई- “यदि इतने वर्षों से इस बुलावे की प्रतीक्षा की है, तो अब पीछे हटने का प्रश्न ही नहीं उठता.” मैंने निर्णय ले लिया. जो होगा, देखा जाएगा. इस बार मुझे हर हाल में कैलाश जाना है. शायद अब बुलावा सचमुच आ चुका था…

कैलाश यात्रा केवल पर्वत तक पहुंचने का नाम नहीं है. यह यात्रा तो उस क्षण से शुरू हो जाती है, जब आप अपने घर से पहला क़दम बाहर रखते हैं. जैसे-जैसे मंज़िल निकट आती जाती है, वैसे-वैसे लगता है कि कोई अदृश्य शक्ति आपको अपने पास खींच रही है. शरीर आगे बढ़ रहा होता है, लेकिन मन बहुत पहले ही कैलाश पहुंच चुका होता है. मेरी यात्रा भी इसी विश्वास के साथ शुरू हुई. वर्षों की प्रतीक्षा, अनगिनत बाधाओं और अधूरी रह गई योजनाओं के बाद आख़िर वह दिन आ ही गया, जब मैं कैलाश-मानसरोवर यात्रा के लिए निकल पड़ी. मन में उत्साह भी था, हल्की-सी घबराहट भी और एक अनकहा विश्वास भी कि अब शायद सचमुच भगवान शिव ने बुलावा भेज दिया है.

नेपाल की सीमा में प्रवेश करते ही वातावरण बदलने लगा. महानगरों का शोर पीछे छूट गया और प्रकृति का विस्तार सामने खुलने लगा. यात्रा के पहले पड़ाव नेपालगंज पहुंची, जहां से आगे हिमालय की कठिन राहें शुरू होती हैं. लेकिन शायद कैलाश हर यात्री की परीक्षा यहीं से लेना शुरू कर देता है. नेपालगंज पहुंचते ही मेरे दांत में असहनीय दर्द शुरू हो गया. दर्द इतना तीव्र था कि ठीक से खाना भी मुश्किल हो गया. दर्द-निवारक दवाइयां भी कोई ख़ास असर नहीं कर रही थीं. मन में एक पल के लिए यह आशंका भी उठी कि कहीं पूरी यात्रा यहीं समाप्त न हो जाए. पांच दिन तक लगातार एंटीबायोटिक दवाएं लेनी पड़ीं. धीरे-धीरे दर्द कम हुआ और लगा कि अब रास्ता साफ़ हो गया है. लेकिन यह राहत बहुत देर तक नहीं टिक सकी.

अगले पड़ाव सिमिकोट पहुंचते ही पेट में संक्रमण हो गया. तेज़ कमज़ोरी महसूस होने लगी. ऊंचाई बढ़ रही थी और शरीर एक के बाद एक नई चुनौतियों से गुज़र रहा था. उस समय पहली बार समझ में आया कि कैलाश यात्रा केवल पैरों की ताक़त से पूरी नहीं होती. यहां मन और शरीर, दोनों की परीक्षा होती है. दो दिन बाद स्वास्थ्य कुछ बेहतर हुआ. शायद भगवान शिव यह देख रहे थे कि श्रद्धा कठिनाइयों से बड़ी है या नहीं. सिमिकोट से आगे यात्रा का स्वरूप पूरी तरह बदल जाता है. हेलीकॉप्टर, संकरे पहाड़ी रास्ते, सीमित सुविधाएं और हर पल बदलता मौसम… सब कुछ यह एहसास दिलाने लगता है कि अब आप सामान्य दुनिया से दूर निकल आए हैं.

सिमिकोट से हिल्सा और फिर तिब्बत की सीमा पार कर तकलाकोट पहुंचना अपने आप में एक रोमांचकारी अनुभव है. रास्ते में विशाल पर्वत, गहरी घाटियां और दूर-दूर तक फैला नीरव सन्नाटा मन को बार-बार भीतर झांकने के लिए विवश करता है. तकलाकोट पहुंचने के बाद यात्रियों को कुछ समय रुककर अपने शरीर को ऊंचाई के अनुकूल बनाना पड़ता है. इसे चिकित्सा की भाषा में एक्लाइमेटाइज़ेशन कहा जाता है. समुद्र तल से लगभग 15 से 18 हज़ार फीट की ऊंचाई पर ऑक्सीजन सामान्य स्थानों की तुलना में काफ़ी कम होती है. यदि शरीर को पर्याप्त समय न दिया जाए, तो सांस लेने में तकलीफ़, चक्कर आना, सिरदर्द और ऊंचाई से जुड़ी गंभीर समस्याएं भी हो सकती हैं. यही कारण है कि कैलाश यात्रा में धैर्य सबसे बड़ा साथी बन जाता है.

बहरहाल, तकलाकोट से आगे बढ़ते ही वह क्षण आता है, जिसका हर यात्री बेसब्री से इंतज़ार करता है. सबसे पहले दिखाई देता है राक्षस ताल. दूर से देखने पर उसकी विशालता मन को विस्मित कर देती है. गहरे नीले रंग का शांत जल, चारों ओर फैले निर्जन पहाड़ और रहस्यमयी वातावरण… सब कुछ ऐसा लगता है मानो समय सदियों पहले रुक गया हो. राक्षस ताल का आकार अर्धचंद्राकार है. इसका पानी खारा है और पीने योग्य नहीं माना जाता. हिंदू मान्यताओं के अनुसार, यही वह स्थान है जहां लंकापति रावण ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए बहुत कठोर तपस्या की थी. लोकविश्वास यह भी कहता है कि रावण के अहंकार और उसकी प्रचंड तपस्या की ऊर्जा आज भी इस झील के वातावरण में महसूस की जा सकती है.

यद्यपि यह आस्था का विषय है, लेकिन राक्षस ताल के किनारे खड़े होकर सचमुच एक अलग तरह का मौन महसूस होता है- गंभीर, रहस्यमय और भीतर तक उतर जाने वाला. राक्षस ताल से कुछ ही दूरी पर है मानसरोवर. और यही वह क्षण था, जिसका मैं वर्षों से इंतज़ार कर रही थी. पहली बार कैलाश ने अपने होने का अहसास करा रहा था. समुद्र तल से लगभग 15 हज़ार से अधिक फीट की ऊंचाई पर स्थित मानसरोवर केवल एक झील नहीं है. भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में इसे सृष्टि की सबसे पवित्र झीलों में गिना गया है. पुराणों के अनुसार भगवान ब्रह्मा ने पहले अपने मन में इसकी कल्पना की और फिर इसे पृथ्वी पर प्रकट किया. इसी कारण इसका नाम पड़ा—मानस अर्थात मन और सरोवर अर्थात झील.

कहा जाता है कि इस पवित्र जल में स्नान करने से मनुष्य के पाप धुल जाते हैं और आत्मा निर्मल हो जाती है. लेकिन सच कहूं तो वहां पहुंचने के बाद मेरे मन में कोई धार्मिक कर्मकांड नहीं था. मैं केवल उस वातावरण को महसूस करना चाहती थी. उस ऊर्जा को अपने अंदर आत्मसात करना चाहती थी, जिसके बारे में वर्षों से सुनती आई थी. रात तक हम मानसरोवर पहुंच गए. चारों ओर घना अंधेरा था. हवा इतनी ठंडी थी कि मोटे ऊनी कपड़े भी उसका सामना करने में असमर्थ लग रहे थे. सर्दी हड्डियों तक पहुंच रही थी. ऐसा लग रहा है इतनी ठंड शरीर बर्दाश्त नहीं कर पाएगा. तेज़ हवाएं लगातार बह रही थीं और पूरा वातावरण एक अलौकिक निस्तब्धता में डूबा हुआ था. कैलाश पर्वत दिखाई नहीं दे रहा था. लेकिन तभी मेरी नज़र दूर एक चमकती हुई पहाड़ी पर ठहर गई.

आसमान में पूर्णिमा नहीं थी, फिर भी उस दिशा में ऐसी उजली आभा फैल रही थी, मानो चांद अपनी पूरी रोशनी उसी स्थान पर उड़ेल रहा हो. मैं कुछ क्षणों तक समझ ही नहीं पाई कि यह क्या है.

फिर किसी ने धीरे से कहा – “उधर कैलाश है.”

मैं स्तब्ध रह गई. पर्वत दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन उसकी उपस्थिति स्पष्ट महसूस हो रही थी. ऐसा लग रहा था मानो अंधकार के बीच कोई दिव्य ज्योति स्वयं अपना परिचय दे रही हो. उस क्षण शब्द समाप्त हो गए. विचार भी थम गए. मन पूरी तरह शांत हो गया. मैं न जाने कितनी देर तक उसी दिशा में देखती रही. ऐसा लगा, जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने मेरे भीतर वर्षों से चल रही सारी हलचल को एक पल में शांत कर दिया हो.

लोकमान्यता है कि ब्रह्ममुहूर्त में भगवान शिव और माता पार्वती मानसरोवर के तट पर विचरण करते हैं. अनेक श्रद्धालु दावा करते हैं कि उन्हें यहां दिव्य प्रकाश या अलौकिक ऊर्जा का अनुभव हुआ है. मैं यह नहीं बता सकती कि मैंने क्या देखा. लेकिन इतना अवश्य कह सकती हूं कि उस रात मैंने जो महसूस किया, उसे तर्क या विज्ञान की भाषा में समझाना मेरे लिए संभव नहीं है. वह केवल एक अनुभव था. ऐसा अनुभव, जिसने भीतर तक छू लिया.

मानसरोवर के तट पर खड़े-खड़े मुझे पहली बार लगा कि वर्षों पहले मन में बोया गया सपना आज सच हो गया है. मैं सचमुच कैलाश की गोद में थी. और शायद पहली बार मुझे विश्वास हुआ कि लोग ठीक ही कहते हैं – कैलाश पर कोई नहीं जाता… कैलाश स्वयं बुलाते हैं. मानसरोवर की वह रात शायद मेरी ज़िंदगी की सबसे शांत रात थी. बाहर बर्फीली हवाएं चल रही थीं, लेकिन भीतर एक अद्भुत सुकून था. ऐसा लग रहा था, जैसे मन वर्षों से जिस उत्तर की तलाश में भटक रहा था, वह बिना किसी शब्द के मिल गया हो. अगली सुबह सूर्योदय से पहले ही आंख खुल गई.

कमरे से बाहर निकली तो सामने हिमालय की चोटियां सुनहरी रोशनी से धीरे-धीरे नहाने लगी थीं. ठंडी हवा चेहरे को चीरती हुई गुजर रही थी, लेकिन उस समय किसी को भी उसकी परवाह नहीं थी. सभी की निगाहें केवल एक दिशा में थीं… कैलाश की ओर. मानसरोवर से विदा लेकर हमारी यात्रा दारचेन की ओर बढ़ी. यही छोटा-सा क़स्बा कैलाश परिक्रमा का आधार शिविर माना जाता है. दुनिया के अलग-अलग देशों से आए श्रद्धालु यहीं एकत्र होते हैं. कोई हिंदू, कोई बौद्ध, कोई जैन, तो कोई बोन परंपरा का अनुयायी. भाषा अलग, वेशभूषा अलग, संस्कृति अलग—लेकिन सबकी मंज़िल एक ही थी.

कैलाश. दारचेन से आगे हमारा पहला पड़ाव था अष्टपद. समुद्र तल से लगभग सत्रह हज़ार फीट की ऊंचाई पर स्थित यह स्थान जैन धर्म के अनुयायियों के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है. मान्यता है कि प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव (आदिनाथ) ने यहीं निर्वाण प्राप्त किया था. इसलिए यह स्थान केवल हिंदुओं के लिए ही नहीं, बल्कि जैन परंपरा में भी समान श्रद्धा का केंद्र है. जब हम अष्टपद पहुंचे, तब मौसम पूरी तरह साफ़ नहीं था. चारों ओर बादलों का साम्राज्य था. वहां से दूर बहुत नंदी पर्वत स्पष्ट दिखाई दे रहा था, लेकिन कैलाश पूरी तरह बादलों की सफेद चादर में छिपा हुआ था. हम सबकी निगाहें उसी दिशा में टिकी थीं. कोई कैमरा तैयार किए खड़ा था, कोई हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहा था और कोई मौन होकर उस क्षण की प्रतीक्षा कर रहा था. ऐसा लग रहा था, जैसे प्रकृति स्वयं किसी दिव्य दृश्य के मंचन की तैयारी कर रही हो.

कुछ मिनट बीते. फिर अचानक तेज़ हवा चली. बादलों का एक बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे हटने लगा. और अगले ही पल… सामने कैलाश का दक्षिण मुख प्रकट हो गया. उस क्षण को शब्दों में बांधना मेरे लिए आज भी संभव नहीं है. सबसे पहले मेरी नज़र उस लंबवत प्राकृतिक रेखा पर पड़ी, जिसे श्रद्धालु भगवान शिव की मेरुदंड अर्थात रीढ़ का प्रतीक मानते हैं. फिर पर्वत की संरचना में उभरती वह आकृति दिखाई दी, जिसे लोग शिव के त्रिनेत्र के रूप में देखते हैं. कुछ ही क्षणों में पूरा स्वरूप जैसे धीरे-धीरे आंखों के सामने खुलने लगा. ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो स्वयं महादेव बादलों के परदे के पीछे से अपने भक्तों को दर्शन दे रहे हों.

मैं निःशब्द थी. भावुक थी. आंखें नम थीं. मेरे हाथ अपने आप जुड़ गए थे. उस क्षण न कोई इच्छा थी, न कोई प्रार्थना. सिर्फ़ एक गहरी कृतज्ञता थी कि इतने वर्षों की प्रतीक्षा के बाद यह दृश्य देखने का सौभाग्य मिला. वहां उपस्थित हर व्यक्ति की प्रतिक्रिया अलग-अगल थी. कोई रो रहा था. कोई मंत्र जप रहा था. कोई चुपचाप पर्वत को निहार रहा था. लेकिन सबके चेहरों पर एक ही भाव था… पूर्ण समर्पण. अष्टपद, नंदी पर्वत और कैलाश—इन तीनों को एक साथ देखना केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभव है. कुछ स्थानों पर प्रकृति केवल सुंदर लगती है, लेकिन यहां प्रकृति बोलती हुई महसूस होती है. कुछ देर बाद बादल फिर लौट आए. कैलाश एक बार फिर ओझल हो गया. मानो उसने केवल कुछ क्षणों के लिए अपना द्वार खोला था.

उस दिन पहली बार मुझे समझ में आया कि लोग क्यों कहते हैं… कैलाश अपने दर्शन स्वयं देता है. अगली सुबह वह दिन था, जिसका हर यात्री महीनों नहीं, बल्कि वर्षों से इंतज़ार करता है. कैलाश परिक्रमा का पहला दिन रोमांचक थी. सुबह-सुबह हम यमद्वार पहुंचे. समुद्र तल से लगभग 15-5 हज़ार फीट की ऊंचाई पर स्थित यह स्थान केवल एक प्रवेश द्वार नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक प्रतीक है. हिंदू मान्यता के अनुसार, भगवान शिव के धाम में प्रवेश करने से पहले प्रत्येक यात्री को यमद्वार से होकर गुज़रना पड़ता है. मृत्यु के देवता यमराज इस पवित्र क्षेत्र के रक्षक माने जाते हैं. लोकविश्वास यह भी कहता है कि इस द्वार से गुज़रने वाला व्यक्ति अपने अहंकार, भय और पुराने बोझ को पीछे छोड़ देता है.

तिब्बती परंपरा में भी यह स्थान अत्यंत पवित्र है. रंग-बिरंगे प्रार्थना ध्वज हवा में लहरा रहे थे. नीला आकाश का प्रतीक… सफेद वायु का प्रतीक… लाल अग्नि का प्रतीक… हरा जल का प्रतीक… और पीला पृथ्वी का प्रतीक. तेज़ हवा जब इन ध्वजों को एक साथ झकझोरती, तो ऐसा लगता मानो पूरा वातावरण प्रार्थना में डूब गया हो. मैंने यमद्वार के सामने कुछ क्षण आंखें बंद कीं. न जाने क्यों, उस समय कोई विशेष प्रार्थना मन में नहीं आई. मैंने केवल इतना कहा – “महादेव… अब आगे आप ही साथ चलिए.”

और फिर शुरू हुई कैलाश परिक्रमा. पहले दिन लगभग तेरह किलोमीटर की पदयात्रा करनी होती है. तकनीकी दृष्टि से यह सबसे कठिन चरण नहीं माना जाता, लेकिन ऊंचाई, ठंडी हवा, तेज़ धूप और कम ऑक्सीजन शरीर की पूरी ऊर्जा को चुनौती देने लगते हैं. हर कुछ क़दम पर सांसों की गति बदल जाती है. रुककर पानी पीना पड़ता. फिर कुछ देर चलना. फिर रुकना. लेकिन आश्चर्य यह था कि थकान के बीच भी भीतर कहीं एक अनजानी शक्ति लगातार आगे बढ़ने का साहस दे रही थी. रास्ते में बार-बार कैलाश का पश्चिम मुख दिखाई देता. कभी बादलों के बीच से… कभी बिल्कुल साफ़… और कभी केवल कुछ क्षणों के लिए. ऐसा लगता, जैसे भगवान शिव स्वयं हर थोड़ी दूर पर खड़े होकर यात्रियों को आगे बढ़ने का संकेत दे रहे हों.

रास्ते में छोटे-छोटे तंबू भी लगे हुए थे. वहां चाय, सूप और हल्का भोजन मिल जाता था. दुनिया की सबसे कठिन यात्राओं में भी मनुष्य की सेवा भावना कैसे जीवित रहती है, यह देखकर मन श्रद्धा से भर उठता था. लगभग पूरे दिन की पदयात्रा के बाद हम दिरापुक पहुंचे. यहीं पहली रात रुकना था. होटल के कमरे में पहुंची. खिड़की खोली तो… तो अगले ही क्षण मैं स्तब्ध रह गई. सामने कैलाश का उत्तरमुख पूरी भव्यता के साथ खड़ा था. इतना निकट… इतना विराट… इतना शांत… मानो सदियों से वहीं खड़ा होकर पूरी सृष्टि को मौन का अर्थ समझा रहा हो. मैं बहुत देर तक खिड़की के पास खड़ी रही. फिर भी मन नहीं माना. कमरे से बाहर निकलकर चढ़ती हुई लगभग दो सौ मीटर ऊपर उस स्थान तक गई, जहां से कैलाश और भी निकट दिखाई देता था. वहां पहुंचते ही समय जैसे थम गया. मेरी आंखों से आंसू बह निकले. पलकें झपकाने का भी मन नहीं कर रहा था. बस एकटक उसी दिव्य शिखर को देखती रही.

उसी समय कुछ तिब्बती श्रद्धालु भी वहां आए. वे लगातार दंडवत प्रणाम करते हुए आगे बढ़ रहे थे. उनकी भाषा मैं नहीं समझती थी. वे मेरी भाषा नहीं समझते थे. लेकिन उस क्षण हमारी आस्था एक ही भाषा बोल रही थी. तभी मुझे पहली बार यह गहराई से महसूस हुआ कि कैलाश किसी एक धर्म का नहीं है. हिंदू इसे भगवान शिव और माता पार्वती का शाश्वत धाम मानते हैं. बौद्ध इसे ब्रह्मांडीय मंडल का केंद्र मानते हैं. जैन परंपरा इसे भगवान आदिनाथ के निर्वाण से जोड़ती है. बोन धर्म इसे अपनी देवी का निवास मानता है.

आस्था के मार्ग अलग हो सकते हैं… लेकिन कैलाश सबको समान रूप से अपनी शरण देता है. शाम ढलने लगी. सूर्य धीरे-धीरे पश्चिम की ओर झुक रहा था. अचानक उसकी अंतिम सुनहरी किरणें कैलाश के शिखर पर पड़ीं. कुछ ही क्षणों में पूरा पर्वत स्वर्णिम आभा से चमक उठा. ऐसा लग रहा था, मानो स्वयं सूर्यदेव भगवान शिव का अभिषेक कर रहे हों. मैं उस दृश्य को कैमरे में कैद करने की कोशिश कर रही थी. लेकिन अगले ही पल कैमरा नीचे रख दिया. कुछ दृश्य केवल आंखों से नहीं… आत्मा से देखे जाते हैं. और कैलाश का वह स्वर्णिम रूप उन्हीं दुर्लभ क्षणों में से एक था.

कैलाश परिक्रमा का दूसरा दिन… हर यात्री जानता है कि यही पूरी यात्रा की सबसे कठिन परीक्षा है. पहले दिन शरीर थकता है, लेकिन दूसरे दिन शरीर के साथ-साथ मन की भी परीक्षा होती है. यही वह दिन है जब कई लोग परिक्रमा अधूरी छोड़ देते हैं. ऊंचाई, कम ऑक्सीजन, जमा देने वाली ठंड, तेज़ हवाएं और लगातार चढ़ाई, सब मिलकर यात्री की इच्छाशक्ति को चुनौती देते हैं. सुबह अभी पूरी तरह उजाला भी नहीं हुआ था कि हम दिरापुक से निकल पड़े. आकाश बिल्कुल साफ़ था. कैलाश का उत्तरमुख अंतिम बार सामने खड़ा था. मैंने कुछ क्षण उसे निहारते हुए मन-ही-मन प्रणाम किया. ऐसा लगा जैसे महादेव स्वयं कह रहे हों- “अब आगे की परीक्षा तुम्हें अपने विश्वास के बल पर पार करनी होगी.”

धीरे-धीरे चढ़ाई शुरू हुई. शुरुआत में रास्ता सामान्य लगा, लेकिन कुछ ही किलोमीटर बाद हर क़दम भारी होने लगा. ऊंचाई लगातार बढ़ रही थी. सांसें तेज़ चलने लगीं. दिल की धड़कन सामान्य से कहीं अधिक तेज़ महसूस हो रही थी. मैं दो क़दम चलती… फिर रुक जाती… कुछ गहरी सांसें लेती… फिर आगे बढ़ती. उस ऊंचाई पर मनुष्य को पहली बार अपनी सीमाओं का वास्तविक अहसास होता है. वहां न धन काम आता है, न पद, न प्रतिष्ठा. केवल आपकी इच्छाशक्ति और भीतर का विश्वास आपका सहारा बनते हैं.

दिरापुक से डोलमा-ला तक लगभग छह किलोमीटर की चढ़ाई है, लेकिन वह छह किलोमीटर जीवन के सबसे लंबे और कठिन छह किलोमीटर लगते हैं. जैसे-जैसे हम ऊपर बढ़ रहे थे, हवा और अधिक ठंडी होती जा रही थी. ऑक्सीजन और कम होती जा रही थी. बोलने का मन भी नहीं करता था. मेरे साथ के भी सभी यात्री लगभग मौन थे. सिर्फ़ क़दमों की आवाज़ सुनाई देती थी और बीच-बीच में हवा की तीखी सनसनाहट.

कई बार लगा कि कुछ देर और बैठ जाऊं. लेकिन उसी क्षण भीतर से आवाज़ आती-“इतनी दूर आकर अब रुकना नहीं है.” शायद यही कैलाश की ऊर्जा थी. शायद यही विश्वास था. या शायद दोनों का अद्भुत संगम. क़रीब साढ़े अठारह हज़ार फीट की ऊंचाई पर स्थित डोलमा-ला दर्रा दिखाई दिया. वह क्षण किसी विजय से कम नहीं था. जैसे ही वहां पहुंची, आंखें अनायास बंद हो गईं. न कोई उत्साह का शोर… न कोई विजय का प्रदर्शन… सिर्फ़ भीतर से उठती हुई गहरी कृतज्ञता. तिब्बती परंपरा में यह स्थान देवी डोलमा अर्थात तारा देवी को समर्पित है. हिंदू श्रद्धालु इसे जीवन के पुनर्जन्म का प्रतीक मानते हैं.

मान्यता है कि डोलमा-ला पार करते समय मनुष्य अपने पुराने अहंकार, दुख और पापों को पीछे छोड़ देता है और एक नए जीवन की ओर बढ़ता है. वहां लहराते असंख्य प्रार्थना-ध्वज इस विश्वास के मौन साक्षी हैं. कुछ क्षण वहां रुककर मैंने चारों ओर नज़र दौड़ाई. सामने बर्फ़ से ढकी चोटियां थीं. नीचे दूर-दूर तक फैली घाटियां थीं. और ऊपर अनंत आकाश…

उस क्षण ऐसा लगा जैसे पृथ्वी और आकाश के बीच खड़े होकर जीवन को एक नए दृष्टिकोण से देख रही हूं. लेकिन यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई थी. अब शुरू हुई उतराई. अक्सर लोग सोचते हैं कि चढ़ाई कठिन होती है, जबकि डोलमा-ला से नीचे उतरना भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है. पत्थरों से भरा रास्ता… फ़िसलन… थका हुआ शरीर… और लगातार संतुलन बनाए रखने की कोशिश. कुछ दूर उतरने के बाद अचानक नीचे एक पन्ने की तरह हरे रंग का जल दिखाई दिया. वह था- गौरीकुंड.

हिंदू मान्यताओं के अनुसार, यही वह स्थान है जहां माता पार्वती ने तप किया था और यहीं भगवान गणेश की कथा से जुड़ी अनेक स्मृतियां लोकविश्वास में जीवित हैं. ऊंचाई से देखने पर गौरीकुंड किसी रत्न की तरह चमक रहा था. चारों ओर बर्फ़िले पर्वत. उनके बीचोंबीच एकदम शांत और एकदम निर्मल जल. प्रकृति ने जैसे स्वयं उस स्थान को मंदिर का स्वरूप दे दिया हो. मैं बहुत देर तक उसे निहारती रही. बस एकटक देखती रही… देखती रही. मन में कोई शब्द नहीं थे. था तो सिर्फ़ और सिर्फ़ मौन.

डोलमा-ला से लगभग चार किलोमीटर नीचे उतरने के बाद दूसरी दिन की कठिन परिक्रमा पूरी हुई. अब शरीर लगभग जवाब दे चुका था. पैरों में तेज़ दर्द था. चेहरे पर थकान साफ़ प्रबिंबित हो रही थी. लेकिन मन… मन पहले से कहीं अधिक हल्का था. चंचल था. रात हम सभी लोगों ने जुथुलपुक में बिताई. उस रात गहरी नींद आई. शायद इसलिए कि सबसे कठिन परीक्षा अब पीछे छूट चुकी थी.

अगली सुबह परिक्रमा का अंतिम दिन था. सिर्फ़ साढ़े छह किलोमीटर का रास्ता. अब रास्ता अपेक्षाकृत आसान था. हालांकि इस चरण में कैलाश के दर्शन नहीं होते, लेकिन ऐसा महसूस होता है कि वह हर क़दम पर आपके साथ चल रहा है. तीसरे दिन चलते हुए बार-बार पीछे मुड़कर देखने का मन करता था. मन मानने को तैयार ही नहीं था कि यह दिव्य यात्रा अब समाप्त होने वाली है.

कुछ घंटों बाद हमारी पदयात्रा पूरी हुई. हम बस से वापस दारचेन पहुंच गए. औपचारिक रूप से कैलाश परिक्रमा समाप्त हो चुकी थी. लेकिन मेरे भीतर एक नई यात्रा शुरू हो चुकी थी. यात्रा से पहले मैं अक्सर सोचती थी कि कैलाश जाकर मुझे क्या मिलेगा? क्या कोई चमत्कार दिखाई देगा? क्या कोई दिव्य अनुभव होगा?

आज पीछे मुड़कर देखती हूं तो लगता है कि कैलाश का सबसे बड़ा चमत्कार बाहर नहीं, भीतर घटित होता है. वह आपके विचारों को शांत कर देता है. जीवन की अनावश्यक भागदौड़ अचानक छोटी लगने लगती है. अहंकार का बोझ हल्का हो जाता है. मन वर्तमान में जीना सीखने लगता है. और शायद यही कैलाश का वास्तविक प्रसाद है. इस यात्रा से जुड़ा एक अनुभव मेरे मन में हमेशा के लिए अंकित हो गया.

यात्रा शुरू होने से पहले किसी ने मुझसे कहा था- “यदि आप पूरी श्रद्धा से रुद्राक्ष की माला पहनकर कैलाश की परिक्रमा करते हैं, तो कभी-कभी ऐसा होता है कि यात्रा के दौरान वह माला स्वयं कहीं छूट जाती है. लोग मानते हैं कि वह भगवान शिव को समर्पित हो जाती है.” उस समय मैंने इसे केवल एक लोकविश्वास समझकर सुन लिया था. मेरे गले में भी पूरी यात्रा के दौरान रुद्राक्ष की माला थी. दूसरे दिन डोलमा-ला पार करते समय भी वह मेरे गले में थी. लेकिन तीसरे दिन परिक्रमा समाप्त होने के बाद अचानक ध्यान गया… माला वहां नहीं थी. मैंने अपनी जेब मे हाथ डाली. बैग टटोला. कपड़े देखे. साथियों से पूछा. लेकिन वह कहीं नहीं मिली. एक क्षण के लिए आश्चर्य हुआ. फिर मन में एक अनोखी शांति उतर आई. मैंने उसे खोजने की कोशिश बंद कर दी. न जाने क्यों उस समय यही लगा… शायद वह माला खोई नहीं है. शायद वह वहीं रह गई है, जहां उसका रहना तय था. शायद वह महादेव के चरणों में समर्पित हो गई.

कैलाश से लौटकर लोग अक्सर पूछते हैं- “यात्रा कैसी रही?”

हर बार मैं मुस्कुरा देती हूं. क्योंकि इस प्रश्न का उत्तर शब्दों में देना संभव ही नहीं. कैलाश कोई पर्यटन स्थल नहीं है. वह मनुष्य के आत्मा की यात्रा है. वहां पहुंचकर आप पर्वत नहीं देखते… आप स्वयं को देखने लगते हैं. यदि जीवन में कभी अवसर मिले, तो यह यात्रा अवश्य कीजिए. संभव है कि आप वहां भगवान शिव को न देख पाएं… लेकिन इतना निश्चित है कि लौटते समय आप अपने भीतर एक नए, शांत और अधिक जागृत व्यक्ति को अवश्य पाएंगे. और शायद यही कैलाश का सबसे बड़ा आशीर्वाद है.

कैलाश से लौटे कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन सच कहूं तो मेरा एक हिस्सा आज भी वहीं, उस हिमाच्छादित शिखर की निस्तब्धता में ठहरा हुआ है. लोग पूछते हैं कि कैलाश यात्रा में ऐसा क्या है, जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. मैं हर बार मुस्कुरा देती हूँ, क्योंकि कैलाश को समझा नहीं जा सकता, केवल महसूस किया जा सकता है. वहां जाकर यह एहसास होता है कि जीवन की सबसे बड़ी यात्राएँ बाहर नहीं, भीतर पूरी होती हैं. कैलाश ने मुझे कोई चमत्कार नहीं दिखाया, बल्कि जीवन को देखने की दृष्टि बदल दी. लौटते समय मेरे कदम भले ही धरती पर थे, लेकिन मन अब भी शिव की उस दिव्य उपस्थिति में रमा हुआ था. शायद इसी कारण कहा जाता है कि कैलाश की परिक्रमा हम पूरी नहीं करते, बल्कि कैलाश हमारी अधूरी यात्रा को पूरा कर देता है.



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