भारतन्यूज़ – टॉप हेडर
News Menu Bar

Central Sanskrit University Thailand: विदेश में बढ़ेगी संस्कृत की गूंज, थाईलैंड में...


Sanskrit University Thailand: भारत की प्राचीन भाषा संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा अब दक्षिण-पूर्व एशिया में नई पहचान बनाने जा रही है.थाईलैंड की प्रतिष्ठित सिल्पकॉर्न यूनिवर्सिटी में जल्द ही केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय (Central Sanskrit University)का विदेशी अध्ययन केंद्र शुरू होगा.इसके लिए सोमवार को बैंकॉक स्थित सिल्पकॉर्न यूनिवर्सिटी के वांग था फ्रा परिसर में दोनों विश्वविद्यालयों के बीच एक ऐतिहासिक समझौता ज्ञापन (MoU)पर हस्ताक्षर किए गए.इस समझौते को भारत और थाईलैंड के बीच शिक्षा, संस्कृति और सदियों पुराने सभ्यतागत रिश्तों को नई मजबूती देने वाला बड़ा कदम माना जा रहा है.

भारत के राजदूत भी रहे मौजूद

इस ऐतिहासिक अवसर पर थाईलैंड में भारत के राजदूत पुनीत अग्रवाल भी मौजूद रहे. उन्होंने दोनों विश्वविद्यालयों को बधाई देते हुए कहा कि यह समझौता भारत और थाईलैंड के बीच शिक्षा और साझा सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगा.उन्होंने भरोसा दिलाया कि भारतीय दूतावास इस साझेदारी को हरसंभव सहयोग देगा.

संस्कृत अध्ययन केंद्र बनेगा विदेशी अध्ययन केंद्र

समझौते के तहत सिल्पकॉर्न यूनिवर्सिटी में पहले से मौजूद संस्कृत अध्ययन केंद्र (Sanskrit Studies Centre)को अब केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के विदेशी अध्ययन केंद्र के रूप में विकसित किया जाएगा.गौरतलब है कि इस संस्कृत अध्ययन केंद्र की स्थापना पूर्व विदेश मंत्री स्वर्गीय सुषमा स्वराज के कार्यकाल में की गई थी. अब इसे और मजबूत बनाते हुए विदेशों में संस्कृत, भारतीय संस्कृति और भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रचार-प्रसार का प्रमुख केंद्र बनाया जाएगा.

भारत-थाईलैंड के पुराने रिश्तों को मिलेगी नई ताकत

भारत और थाईलैंड के बीच संबंध सिर्फ कूटनीतिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक भी रहे हैं.दोनों देशों के रिश्ते संस्कृत, पालि भाषा और बौद्ध परंपरा से जुड़े रहे हैं.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी थाईलैंड यात्रा के दौरान कहा था कि भारत और थाईलैंड सिर्फ राजनयिक साझेदार नहीं, बल्कि आध्यात्मिक पड़ोसी हैं.यह नया समझौता इसी साझा विरासत को और मजबूत बनाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है.

छात्रों और शिक्षकों को मिलेगा बड़ा मौका

इस समझौते के बाद दोनों विश्वविद्यालयों के बीच कई नए शैक्षणिक कार्यक्रम शुरू किए जाएंगे.
इसके तहत शिक्षकों का आदान-प्रदान (Faculty Exchange)/छात्रों का एक्सचेंज प्रोग्राम/संयुक्त शोध परियोजनाएं/संयुक्त डिग्री कार्यक्रम/ऑनलाइन कोर्स/रिसर्च और प्रकाशन जैसी कई गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाएगा.इससे दोनों देशों के छात्रों और शोधार्थियों को एक-दूसरे से सीखने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने का मौका मिलेगा.

इन विषयों पर होगा संयुक्त अध्ययन और रिसर्च

दोनों विश्वविद्यालय मिलकर कई महत्वपूर्ण विषयों पर शोध और अकादमिक गतिविधियां चलाएंगे.
इनमें संस्कृत/पालि/हिन्दी/भारतीय ज्ञान प्रणाली/रामायण अध्ययन/बौद्ध अध्ययन/संस्कृत अभिलेख विज्ञान/योग/वास्तुशास्त्र/ज्योतिष/ब्राह्मी लिपि/भारतीय दर्शन शामिल हैं.इन विषयों पर संयुक्त रिसर्च, सेमिनार और प्रकाशनों को भी बढ़ावा दिया जाएगा.

पुरानी पांडुलिपियों को मिलेगा डिजिटल रूप

समझौते के तहत सिर्फ पढ़ाई और शोध ही नहीं, बल्कि संस्कृत, पालि और प्राकृत भाषाओं की दुर्लभ पांडुलिपियों को भी डिजिटल रूप में सुरक्षित किया जाएगा.इसके अलावा ई-रिसोर्स तैयार किए जाएंगे और आधुनिक डिजिटल संस्कृत इकोसिस्टम विकसित करने पर भी काम होगा ताकि दुनिया भर के विद्यार्थी ऑनलाइन इन संसाधनों का लाभ उठा सकें.

भारतीय दूतावास करेगा पूरा सहयोग

थाईलैंड स्थित भारतीय दूतावास ने भी इस परियोजना को पूरा सहयोग देने का भरोसा दिया है.
दूतावास की ओर से संकाय सहयोग/छात्रवृत्ति/संस्कृत पुस्तकों की उपलब्धता/भारत अध्ययन केंद्र/संस्कृत संसाधन केंद्र जैसी योजनाओं में सहयोग दिया जाएगा.

दक्षिण-पूर्व एशिया में संस्कृत का नया केंद्र बनेगा

केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने कहा कि यह सिर्फ दो विश्वविद्यालयों के बीच हुआ समझौता नहीं है बल्कि भारत और थाईलैंड के बीच ज्ञान, संस्कृति और आध्यात्मिक विरासत को जोड़ने वाला मजबूत पुल है.उन्होंने कहा कि सिल्पकॉर्न यूनिवर्सिटी में बनने वाला यह विदेशी अध्ययन केंद्र दक्षिण-पूर्व एशिया में संस्कृत, पालि और भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रचार-प्रसार का प्रमुख केंद्र बनेगा.

शुरू होंगे संस्कृत पाठ्यक्रम

प्रो. वरखेड़ी ने बताया कि इस पहल के बाद थाईलैंड के अन्य विश्वविद्यालयों में भी संस्कृत पढ़ाने की दिशा में काम किया जाएगा.इसके अलावा संयुक्त रिसर्च प्रोजेक्ट, प्रशिक्षण कार्यक्रम, संगोष्ठियां और कई नए शैक्षणिक सहयोग शुरू होंगे.

भारत की ज्ञान परंपरा को मिलेगी वैश्विक पहचान

विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत और थाईलैंड के बीच शिक्षा और संस्कृति के रिश्तों को और मजबूत करेगा. साथ ही भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कृत भाषा और प्राचीन भारतीय दर्शन को दुनिया तक पहुंचाने में भी बड़ी भूमिका निभाएगा.यह पहल आने वाले समय में भारत की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है.



Source link

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top