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Palamu Bauliya Well: पलामू के पाटन प्रखंड के जांघासी गांव में स्थित 380 साल पुराना बौलिया कुआं चेरो राजवंश की ऐतिहासिक धरोहर है. अपनी अनूठी वास्तुकला और धार्मिक महत्व के कारण यह लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है. करीब पांच लाख रुपये की लागत से इसके जीर्णोद्धार और सौंदर्यीकरण की योजना बनाई गई है. इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की तैयारी भी शुरू हो गई है.
पलामू: ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण किसी भी क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान को जीवंत बनाए रखने का महत्वपूर्ण माध्यम होता है. पलामू जिले के पाटन प्रखंड के जांघासी गांव में स्थित करीब 380 वर्ष पुराना बौलिया कुआं आज भी चेरो राजवंश के गौरवशाली इतिहास की गवाही दे रहा है. अपनी अनोखी वास्तुकला, ऐतिहासिक महत्व और धार्मिक आस्था के कारण यह कुआं क्षेत्र की अमूल्य धरोहर माना जाता है. अब इसके जीर्णोद्धार की पहल शुरू हो गई है. इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की भी तैयारी की जा रही है.
बौलिया कुएं का निर्माण
इतिहासकारों और स्थानीय जनश्रुतियों के अनुसार, इस बौलिया कुएं का निर्माण विक्रम संवत 1701 (1644 ईस्वी) में चेरो राजवंश के राजा प्रताप राय प्रथम (1628-1658 ईस्वी) के शासनकाल में कराया गया था. बताया जाता है कि राजकीय भ्रमण के दौरान यात्रियों और ग्रामीणों की सुविधा को ध्यान में रखकर इसका निर्माण कराया गया था. स्थानीय मान्यता है कि यह कुआं केवल एक ही दिन में बनकर तैयार हो गया था. हालांकि यह एक लोककथा है, लेकिन आज भी ग्रामीण इसे श्रद्धा और गर्व के साथ सुनाते हैं.
अनूठी वास्तुकला इसकी विशेषता
ग्रामीणों का कहना है कि इस कुएं की सबसे बड़ी विशेषता इसकी अनूठी वास्तुकला है. यह साधारण कुआं नहीं है. इसमें एक ही संरचना के भीतर दो समानांतर कुएं बनाए गए हैं. नीचे तक जाने के लिए पत्थरों की मजबूत सीढ़ियां बनाई गई हैं. इसकी दीवारों पर उत्कृष्ट शिल्पकला देखने को मिलती है. गर्मी के दिनों में भी कुएं के भीतर का तापमान काफी ठंडा रहता है. पहले यह यात्रियों के विश्राम स्थल के रूप में भी उपयोग किया जाता था. ग्रामीण बताते हैं कि इसके पानी में कभी कीड़े नहीं पड़ते थे. पानी हमेशा स्वच्छ और ठंडा रहता था.
यह कुआं आस्था का प्रमुख केंद्र
मुखिया पति मुकेश सिंह ने बताया कि कुएं के मध्य भाग में ब्राह्मी और नागरी लिपि में अभिलेख अंकित हैं. ये अभिलेख इसके ऐतिहासिक महत्व की पुष्टि करते हैं. माना जाता है कि इसका निर्माण जनकल्याण और धर्मार्थ उद्देश्य से कराया गया था. आज भी गांव और आसपास के लोग छठ पूजा, विवाह, यज्ञ, पूजा-पाठ और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में इसी कुएं का जल उपयोग करते हैं. इस कारण यह कुआं केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि लोगों की आस्था का भी प्रमुख केंद्र बना हुआ है.
प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल
मुखिया पति मुकेश सिंह ने बताया कि इस ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण के लिए 15वें वित्त आयोग की मद से करीब तीन लाख रुपये उपलब्ध कराए गए हैं. वहीं, तत्कालीन प्रखंड विकास पदाधिकारी डॉ. अमित कुमार झा ने विकास मद से करीब 1.60 लाख रुपये स्वीकृत किए थे. लगभग पांच लाख रुपये की लागत से कुएं का जीर्णोद्धार कराया जाएगा. योजना के तहत परिसर का सौंदर्यीकरण किया जाएगा. सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की जाएगी. पर्यटकों के लिए आवश्यक सुविधाएं भी विकसित की जाएंगी. उद्देश्य है कि आने वाले समय में यह स्थल पलामू के प्रमुख पर्यटन स्थलों में शामिल हो सके.
इतिहास से जोड़ने का माध्यम
ग्रामीणों का मानना है कि यदि इस ऐतिहासिक बौलिया कुएं का बेहतर संरक्षण और व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाए, तो यह पलामू के समृद्ध इतिहास को नई पहचान दिला सकता है. इससे पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा. स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे. सदियों पुरानी यह धरोहर आने वाली पीढ़ियों को अपने गौरवशाली इतिहास से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है.
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न्यूज़18इंडिया में कार्यरत हैं. आजतक से रिपोर्टर के तौर पर करियर की शुरुआत फिर सहारा समय, ज़ी मीडिया, न्यूज नेशन और टाइम्स इंटरनेट होते हुए नेटवर्क 18 से जुड़ी. टीवी और डिजिटल न्यूज़ दोनों विधाओं में काम करने क…
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