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चाय-बिस्कुट, मोबाइल चार्जिंग और उम्मीद…रांची की सड़कों पर संघर्ष की ऐसी कहानी,...


रांची. आंदोलन सिर्फ नारों, पोस्टरों और भाषणों का नाम नहीं होता. उसके पीछे संघर्ष की एक ऐसी दुनिया होती है, जो अक्सर कैमरों से ओझल रह जाती है. दरअसल झारखंड की राजधानी रांची में चल रहे JPSC-JSSC अभ्यर्थियों के आंदोलन की भी एक ऐसी ही कहानी है. यहां हजारों युवाओं की लड़ाई सिर्फ परीक्षा और नियुक्ति की नहीं, बल्कि सीमित संसाधनों के बीच अपने सपनों को जिंदा रखने की भी है.

रांची प्रोटेस्ट में मोर्चे पर डटे अभ्यर्थियों की सुबह किसी राजनीतिक भाषण से नहीं, बल्कि चाय-बिस्कुट और मोबाइल चार्ज करने की जद्दोजहद से शुरू होती है. डिजिटल दौर में मोबाइल फोन आंदोलन का सबसे बड़ा हथियार बन गया है. सोशल मीडिया पर अपनी बात पहुंचाने से लेकर घरवालों से संपर्क बनाए रखने तक, हर काम इसी पर निर्भर है. लेकिन, चार्जिंग के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है.

मोबाइल चार्ज करने के लिए लग रही ‘लाइन’

आंदोलन स्थल पर बिजली की सीमित व्यवस्था है. अभ्यर्थी बताते हैं कि एक मोबाइल चार्ज होने के बाद ही दूसरे का नंबर आता है. कई बार दो-दो घंटे तक इंतजार करना पड़ता है. एक अभ्यर्थी ने बताया, “हम करीब दो घंटे लाइन में लगे रहे, तब जाकर मोबाइल चार्ज करने का मौका मिला. यहां कोई आसान व्यवस्था नहीं है, सब लोग एक-दूसरे से सहयोग लेकर काम चला रहे हैं.”

झारखंड ही नहीं, दूसरे राज्यों से भी मिल रहा साथ

आंदोलन को समर्थन देने के लिए सिर्फ झारखंड ही नहीं, बल्कि दूसरे राज्यों से भी लोग रांची पहुंच रहे हैं. मधुपुर-देवघर से आए एक युवा, जो UPSC की तैयारी भी कर रहे हैं, कहते हैं कि झारखंड में लगातार परीक्षाएं रद्द होने और भर्ती प्रक्रिया में देरी से युवाओं में भारी आक्रोश है. उनका कहना है, “सरकार से सिर्फ 500 मीटर दूर बैठे युवाओं की आवाज आखिर क्यों नहीं सुनी जा रही? हम यहां इसलिए आए हैं ताकि उनकी लड़ाई में अपना योगदान दे सकें.”

नौकरी भी, आंदोलन भी

आंदोलन स्थल पर सिर्फ प्रतियोगी छात्र ही नहीं, बल्कि नौकरीपेशा युवा भी अपना समय निकालकर पहुंच रहे हैं. रांची के एक मॉल में काम करने वाली ज्योति महतो बताती हैं कि उनकी ड्यूटी दोपहर में शुरू होती है, इसलिए वह सुबह जल्दी उठकर आंदोलन में सहयोग देने पहुंच जाती हैं. ज्योति कहती हैं, “हम चाहते हैं कि व्यवस्था में पारदर्शिता आए. इसलिए नौकरी के साथ-साथ यहां आकर अपना योगदान भी दे रहे हैं.”

सोशल मीडिया बना आंदोलन की ताकत

आंदोलन में कई डिजिटल क्रिएटर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर भी शामिल हैं. ये लोग लगातार वीडियो, लाइव और पोस्ट के जरिए आंदोलन की आवाज राज्यभर और देशभर तक पहुंचा रहे हैं. अभ्यर्थियों का कहना है कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस निर्णय नहीं होता, तब तक उनका संघर्ष जारी रहेगा.

सरकार की पहल, लेकिन गतिरोध बरकरार

एक ओर सरकार केवल छात्र प्रतिनिधियों से बातचीत की बात कह रही है, वहीं दूसरी ओर आंदोलनकारी अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं. ऐसे में रांची की सड़कों पर चल रहा यह आंदोलन अब सिर्फ भर्ती प्रक्रिया का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि युवाओं के धैर्य, संघर्ष और उम्मीद की मिसाल बनता जा रहा है.



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