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भारतीय कृषि परंपरा में “आवत आद्रा, जायत हस्त न बरसे तो दोनों गए पाहुन और गृहस्थ” कहावत का विशेष महत्व है. पर्यावरणविद डॉ. कौशल किशोर जायसवाल के अनुसार, आर्द्रा नक्षत्र की बारिश धान की बुआई और रोपाई के लिए, जबकि हस्त (हथिया) नक्षत्र की वर्षा फसल में दाना बनने के लिए बेहद जरूरी मानी जाती है. इन दोनों नक्षत्रों में पर्याप्त बारिश नहीं होने पर उत्पादन घट सकता है. पलामू जैसे कम वर्षा वाले क्षेत्रों में यह कहावत आज भी प्रासंगिक है. विशेषज्ञ किसानों को जल संरक्षण, फसल विविधीकरण और कम अवधि वाली फसलें अपनाने की सलाह देते हैं.
पलामू : भारतीय संस्कृति में कृषि परंपरा में मौसम और नक्षत्रों का विशेष महत्व रहा है. पुराने काल से किसानों ने वर्षों के अनुभव के आधार पर कई ऐसी कहावतें गढ़ी हैं, जो आज भी खेती-किसानी का मार्गदर्शन करती हैं. इन्हीं में से एक प्रसिद्ध कहावत है— “आवत आद्रा, जायत हस्त न बरसे तो दोनों गए पाहुन और गृहस्थ.” यह कहावत विशेष रूप से वर्षा आधारित खेती करने वाले किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है.
आर्द्रा और हस्त नक्षत्र का महत्व
पर्यावरणविद डॉक्टर कौशल किशोर जायसवाल ने बताया कि आर्द्रा नक्षत्र में अच्छी वर्षा होने से खरीफ फसलों, विशेषकर धान की बुआई और रोपाई के लिए पर्याप्त नमी मिलती है. वहीं हस्त (हथिया) नक्षत्र के दौरान होने वाली बारिश फसल में दाना बनने और उसकी बेहतर वृद्धि के लिए आवश्यक मानी जाती है. यदि इन दोनों नक्षत्रों में पर्याप्त वर्षा नहीं होती, तो फसल का उत्पादन प्रभावित होने की संभावना ज्यादा बढ़ जाती है.
पलामू में अधिक प्रासंगिक है कहावत
उन्होंने आगे कहा कि पलामू जिला कम वर्षा वाले क्षेत्रों में शामिल है. कई बार झारखंड के अन्य जिलों, जैसे रांची, कोडरमा में अच्छी बारिश होती है, लेकिन पलामू में पर्याप्त वर्षा नहीं हो पाती. ऐसे में धान सहित अन्य खरीफ फसलों की खेती प्रभावित होती है. यही कारण है कि यह कहावत आज भी किसानों के बीच प्रचलित है और मौसम की अनिश्चितता को दर्शाती है.
क्या है कहावत का अर्थ
उन्होंने बताया कि इस कहावत का अर्थ है कि यदि आर्द्रा और हस्त नक्षत्र में बारिश नहीं होगी, तो खेतों में फसल नहीं होगी. जब किसान के घर अनाज नहीं होगा, तो वह अपने परिवार का पालन-पोषण भी मुश्किल से कर पाएगा और घर आए मेहमान (पाहुन) का सत्कार भी नहीं कर सकेगा. इसलिए कहा गया कि ऐसी स्थिति में गृहस्थ और पाहुन दोनों ही संकट में पड़ जाएंगे.
विशेषज्ञों की सलाह
उन्होंने आगे कहा कि किसानों को बदलते मौसम को देखते हुए केवल वर्षा आधारित खेती पर निर्भर नहीं रहने की सलाह देते हैं. खेतों की मेड़ों पर आंवला, बेल, बेर और चीकू जैसे फलदार पौधे लगाने, जल संरक्षण करने तथा कम अवधि वाली फसलों को अपनाने से अतिरिक्त आय के साथ मौसम की अनिश्चितता से होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है.ऐसी पहल किसानों की आय बढ़ाने के साथ कृषि को अधिक टिकाऊ भी बना सकती है.
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8 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. क्राइम, खेल, …
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