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मशहूर लेखिका अरुंधति रॉय अपनी नई किताब ‘मेरी मां मेरी गैंगस्टर’ को लेकर सुर्खियों में हैं. उनकी ये किताब उनकी मां मैरी रॉय के साथ रिश्तों पर आधारित एक संस्मरण है. लेकिन इस किताब के रिलीज होते ही उनका पुराना कश्मीर विवाद फिर से चर्चा में आ गया है. लोग उनकी शानदार साहित्यिक उपलब्धियों के साथ-साथ उनके राजनीतिक बयानों और अलगाववादियों के समर्थन वाले रुख पर फिर से सवाल उठा रहे हैं. (File Photos : PTI)
अरुंधति रॉय दो छवियों की लेखिका हैं. एक छवि में वे बुकर पुरस्कार विजेता प्रखर लेखिका हैं. दूसरी छवि में वे कश्मीर के अलगाववादी नेताओं के साथ खड़ी नजर आती हैं. उनकी ये दोनों छवियां साथ-साथ चलती हैं. हाल ही में इन दोनों छवियों की चर्चा फिर से जोर पकड़ गई है. कारण है अरुंधति रॉय की किताब ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ का हिंदी अनुवाद ‘मेरी माँ मेरी गैंगस्टर’ नाम से छपा है. यह किताब 45 भाषाओं में अनूदित हो चुकी है. हिंदी संस्करण का लोकार्पण 18 जुलाई 2026 को पटना के अर्थशिला में हुआ. वहां लेखिका खुद मौजूद रहीं. इसके बाद बीते 3 अगस्त को राजधानी के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में बातचीत और बुक साइनिंग का कार्यक्रम हुआ. हॉल इतना भरा था कि खड़े होने की जगह मुश्किल से मिली.
यह किताब संस्मरण है. इसमें अरुंधति अपनी माँ मैरी रॉय के साथ के जटिल रिश्ते की बात करती हैं. प्रेम, टकराव, मातृत्व, स्त्री अस्मिता और सत्ता जैसे मुद्दे इसमें गुंथे हैं. किताब में वे 16 साल की उम्र में दिल्ली आने से लेकर माँ के अंतिम क्षणों तक की यादें साझा करती हैं.
अरुंधति रॉय की पहली छवि यहीं से बनती है. वे 1997 में अपने उपन्यास ‘द गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ के लिए बुकर पुरस्कार जीतीं. यह पुरस्कार भारतीय लेखिका के लिए बड़ा सम्मान था. उपन्यास ने दुनिया भर में नाम कमाया. उसके बाद उन्होंने ‘द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ लिखा. निबंधों के कई संग्रह भी छपे. वे नर्मदा बाँध, आदिवासी अधिकार, जाति और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर तीखे लेख लिखती रहीं. उनकी भाषा तीखी है. वे सत्ता की आलोचना करने से नहीं डरतीं. कई लोग उन्हें साहसी और स्वतंत्र लेखिका मानते हैं.
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लेकिन अरुंधति रॉय की दूसरी छवि भी देश ने देखी है. वह छवि कश्मीर से जुड़ी है. उन्होंने कई मौकों पर कहा कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग नहीं है. 21 अक्टूबर 2010 को दिल्ली में ‘आज़ादी-– द ओनली वे’ सेमिनार में उन्होंने कहा था, “कश्मीर कभी भारत का अभिन्न हिस्सा नहीं रहा. यह ऐतिहासिक तथ्य है. भारतीय सरकार ने भी संयुक्त राष्ट्र में इसे स्वीकार किया है.” उन्होंने आगे कहा कि भारत को भी कश्मीर से आज़ादी की ज़रूरत है, जैसे कश्मीर को भारत से. कुछ दिन बाद 24 अक्टूबर 2010 को श्रीनगर में भी उन्होंने यही बात दोहराई. द हिन्दू अखबार ने 25 अक्टूबर 2010 को इस बयान को प्रमुखता से छापा था. शीर्षक था – “Kashmir was never integral part of India: Arundhati”.
बाद में इन टिप्पणियों को लेकर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग उठी. कई लोग उन्हें देशद्रोही कहते हैं. वे कहते हैं कि लेखिका होने का मतलब देश की एकता के खिलाफ बोलना नहीं है. कश्मीर में हिंसा और अलगाववाद को समर्थन देना गलत है. सैयद अली शाह गिलानी जैसे नेता लंबे समय तक भारत विरोधी रुख अपनाए रहे. उनके साथ खड़े होना कई भारतीयों को असहज लगता है.
दोनों छवियां एक ही व्यक्ति की हैं. एक तरफ साहित्यिक उपलब्धि और मां-बेटी के रिश्ते की संवेदनशील कहानी. दूसरी तरफ राजनीतिक रुख जो देश की संप्रभुता पर सवाल उठाता है. बेशक, उन्हें अपनी राय रखने का हक है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार है. पर उनके आलोचक कहते हैं कि प्रसिद्ध व्यक्ति की जिम्मेदारी भी होती है. उनकी बातें युवाओं को प्रभावित कर सकती हैं.
अरुंधति रॉय की किताबों में भी कश्मीर का जिक्र आता है. ‘द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ में कश्मीरी किरदार हैं. उनके निबंधों में राज्य की नीतियों की आलोचना बार-बार मिलती है. वे खुद को सिर्फ लेखिका नहीं, बल्कि सक्रिय नागरिक मानती हैं. लेकिन आलोचक पूछते हैं कि क्या सक्रियता का मतलब अलगाववादियों के मंच पर खड़ा होना है?
अरुंधति रॉय का रुख लंबे समय से एक जैसा रहा है. अरुंधति रॉय के तेवर कांग्रेस के शासनकाल में भी लगभग वैसे ही थे जैसे अब भाजपा के दौर में हैं. नर्मदा बाँध, परमाणु नीति, कश्मीर और आदिवासी अधिकार जैसे मुद्दों पर उन्होंने पहले भी तीखी आवाज उठाई थी. 2008 और 2010 में उनके कश्मीर संबंधी बयानों की आलोचना कांग्रेस और भाजपा दोनों ने की थी. इसलिए यह कहना गलत होगा कि वे किसी एक सरकार या पार्टी के प्रति नरम हैं. उनका रुख लंबे समय से भारतीय राज्य की नीतियों के खिलाफ रहा है, चाहे सत्ता में कोई भी हो.
बहरहाल, उनकी किताब के हाल के हिंदी अनुवाद और उसके विमोचन ने इन दोनों छवियों को फिर सामने ला दिया है. पटना और दिल्ली के कार्यक्रमों में साहित्यिक चर्चा हुई. लेकिन सोशल मीडिया पर पुरानी तस्वीरें और भाषण भी घूमे. कुछ ने किताब की प्रशंसा की. कुछ ने राजनीतिक रुख की आलोचना की.
अरुंधति रॉय की सफलता निर्विवाद है. बुकर पुरस्कार, अंतरराष्ट्रीय मान्यता और अब नई किताब का व्यापक अनुवाद इसकी गवाही देते हैं. लेकिन कश्मीर पर उनका रुख कई भारतीयों के लिए स्वीकार्य नहीं है. साहित्य और राजनीति के इस मिश्रण ने उन्हें विवादित बना दिया है. अरुंधति रॉय एक श्रेष्ठ लेखिका हैं. उनकी किताबें पढ़ने लायक हैं. लेकिन उनके कुछ राजनीतिक कदम सवालों के घेरे में हैं. साहित्य की आजादी जरूरी है. देश की एकता भी. दोनों के बीच संतुलन बनाना कठिन है, लेकिन जरूरी है.