Last Updated:
देश की राजनीतिक फिजा में बीते कुछ महीनों से क्या बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है? पहले बीजेपी तय करती थी एजेंडा, अब विपक्ष के मुद्दों में घिर रही मोदी सरकार? कभी बीजेपी के एजेंडे पर चलता था विपक्ष, अब राहुल गांधी समेत विपक्षी दलों के मुद्दों पर घिर रही बीजेपी? देश के पॉलिटिकल गेम में बड़ा उलटफेर, क्या कोई बड़े बदलाव का संकेत है? पढ़ें बीते दो-तीन महीने में विपक्ष के नैरेटिव सेट करने के पॉलिटिक्स में कैसे बीजेपी फंसती जा रही है.
बीजेपी के लिए बदल गई सियासी पटकथा! पहले मुद्दे बनाती थी पार्टी, अब विपक्ष के मुद्दों पर देना पड़ रहा जवाब.
पिछले कुछ महीनों से भारतीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है. जहां पहले बीजेपी एजेंडा तय करती थी और विपक्षी दल उसके पीछे भागते थे, वहीं अब विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस और राहुल गांधी मुद्दे उठाते हैं और बीजेपी नेता उन पर प्रतिक्रिया देते नजर आते हैं. अयोध्या में चंदा चोरी का मामला, अखिलेश यादव ने इस मुद्दे को उठाया, जिसके बाद सीएम योगी आदित्यनाथ सहित कई बीजेपी नेताओं को इस पर सफाई देनी पड़ी. NEET पेपर लीक मामला, यह मुद्दा भी विपक्ष ने जोर-शोर से उठाया, जिससे सरकार पर काफी दबाव पड़ा. जंतर-मंतर पर छात्रों पर लाठीचार्ज और पैलेट गन का इस्तेमाल, इस घटना को लेकर भी विपक्ष ने सरकार को घेरा. इन घटनाओं से पता चलता है कि विपक्ष अब नैरेटिव सेट करने में सफल हो रहा है और सत्ता पक्ष को उसके पीछे दौड़ना पड़ रहा है.
राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो झारखंड में छात्र आंदोलन, नीट पेपर लीक, यूजीसी बिल और एफसीआरए संशोधनों जैसे बड़े मुद्दों की बात अब खुलकर होने लगी है. भारतीय राष्ट्रीय राजनीति में पिछले दो से तीन महीनों के दौरान शक्ति संतुलन और एजेंडा निर्धारण के मामले में एक बड़ा रणनीतिक बदलाव देखने को मिला है. लंबे समय से यह धारणा रही थी कि भारतीय जनता पार्टी और केंद्र सरकार राष्ट्रीय विमर्श का एजेंडा तय करती हैं और विपक्षी दल केवल उन पर प्रतिक्रिया देने तक सीमित रहते हैं. हालांकि, हालिया समय में स्थिति पूरी तरह बदलती नजर आई है. अब इंडिया गठबंधन और विपक्षी दल लगातार नए और संवेदनशील मुद्दों को उछालकर सरकार को बैकफुट पर धकेल रहे हैं, जिससे मंत्रियों और सत्तापक्ष के शीर्ष नेताओं को रक्षात्मक मुद्रा में आकर जवाब देना पड़ रहा है.
संसद से सड़क तक कौन-कौन मुद्दे छाए रहे
बीते कुछ दिनों में देश में कई बड़े मुद्दे उठे, जिन्होंने संसद से लेकर सड़कों तक भारी हलचल पैदा की. हालांकि, इनमें से कई मुद्दे जितनी तेजी से राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आए, उतनी ही तेजी से राजनीतिक सुर्खियों से गायब भी हो गए या नया मोड़ ले गए. छात्र आंदोलन और पेपर लीक विवाद जून- जुलाई में दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुआ और फिर धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे से खत्म हो गया. कॉकरोच आंदोलन के नाम से चर्चित इस युवा और छात्र आंदोलन ने मुंबई, दिल्ली और बिहार सहित देश के कई राज्यों में सरकार विरोधी माहौल तैयार किया. विपक्ष ने इस मुद्दे को संसद के भीतर और बाहर पुरजोर तरीके से उठाया. शुरुआत में सरकार ने इसे प्रशासनिक विफलता मानकर टालने की कोशिश की, लेकिन बढ़ते जनाक्रोश और विरोध के दबाव में शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा.
क्या विपक्ष का होमवर्क बीजेपी पर भारी पड़ा?
इसके बाद संसद का मानसून सत्र आगे बढ़ने और विभागीय बदलावों के बाद यह सड़क का आंदोलन धीमा पड़ गया और अब यह मामला अदालती प्रक्रियाओं और पुलिस जांच के दायरे में सिमट कर रह गया है. यूजीसी बिल 2026 जुड़े नए विधायी बदलावों और बिल के प्रस्तावों के सामने आने के बाद विपक्ष और छात्र संगठनों ने आरोप लगाया कि नए यूजीसी प्रावधानों से उच्च शिक्षा का केंद्रीयकरण होगा और स्वायत्तता प्रभावित होगी. देश भर के विश्वविद्यालयों में विरोध प्रदर्शनों के बाद सरकार ने स्पष्टीकरण जारी किए. विपक्षी सांसदों ने इस पर संसद में स्थगन प्रस्ताव दिए, परंतु मानसून सत्र के अन्य बहसों में उलझने के कारण यह मुद्दा भी मुख्यधारा की मीडिया सुर्खियों से धीरे-धीरे ओझल हो गया.
नैरेटिव सेट करना क्या विपक्ष की जीत है?
जुलाई अंत में संसद के मानसून सत्र के दौरान विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम में नए संशोधनों के पेश होने की आहट शुरू हुई. विपक्ष ने आरोप लगाया कि एफसीआरए नियमों में बदलाव का उद्देश्य नागरिक समाज, धार्मिक संस्थाओं और गैर-सरकारी संगठनों पर नियंत्रण बढ़ाना है. साथ ही संसद परिसर और प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस कार्रवाई को लेकर गृह मंत्री अमित शाह से सीधे जवाब की मांग की गई. कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों ने अपने सांसदों को तीन लाइन का ह्विप जारी कर सदन में मौजूदगी अनिवार्य कर दी. सरकार को बैकफुट पर आते हुए यह भरोसा देना पड़ा कि संशोधन में कोई रिट्रोस्पेक्टिव कड़े प्रावधान नहीं होंगे. आश्वासन मिलने और अन्य विधायी कार्यों के बीच यह तीखी बहस भी शांत हो गई.
इस प्रकार, पिछले दो-तीन महीनों में देश के राजनीतिक गलियारे में विपक्षी दल सरकार को घेरने के लिए रणनीतिक रूप से सटीक मुद्दे उठाने में सफल रहे हैं. हालांकि, किसी भी मुद्दे को एक सीमा से आगे लंबे समय तक बनाए रखना और उसे वोटों में बदलना विपक्ष के लिए अब भी एक बड़ी संगठनात्मक चुनौती बना हुआ है. लेकिन इतना तो तय है कि विपक्ष के गेंद पर सत्ता पक्ष का विकेट गिरते-गिरते बचा. कह सकते हैं कि देश में बीते कुछ महीनों से अचानक राजनीतिक फिजा बदल गई है. खासकर छात्रों के आंदोलन और उनके मुद्दे अब सरकारों के लिए अहम विषय बनकर उभरा है.