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Mentha Farming Success Story: पश्चिम चंपारण के किसान परशुराम ने धान और गेहूं की पारंपरिक खेती छोड़कर मेंथा की खेती शुरू की. पिछले 17 वर्षों से वे मेंथा की खेती और मेंथा ऑयल निकालने का काम कर रहे हैं. जिससे उनकी किस्मत बदल गई है. वे अब एक सफल मेंथा ऑयल व्यवसायी हैं. अंतरराष्ट्रीय बाजार में उत्पाद बेचते हैं. सालाना 1500000 की कमाई करते हैं.
पश्चिम चम्पारण: पुदीने की खेती किसानों की किस्मत बदल सकती है’ ये दावा हम नहीं, बल्कि ज़िले के एक ऐसे किसान ने किया है, जो पिछले 17 वर्षों से मेंथा की खेती कर रहे हैं और उसकी हार्वेस्टिंग कर ऑयल निकालने का काम करते आ रहे हैं.जी हां, पश्चिम चम्पारण के मझौलिया प्रखंड स्थित रुलही गांव निवासी कृषक परशुराम डेढ़ दशक से भी अधिक समय से मेंथा की खेती कर रहे हैं.आश्चर्य की बात यह है कि किसी समय में वो धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों की खेती पर ही निर्भर रहा करते थें, जिससे उनकी कमाई सिर्फ गुजारे भर ही होती थी. लेकिन एक दिन अनन फानन में लिए गए फैसले ने उनके जीवन और आमदनी के रास्ते को पूरी तरह से बदल कर रख दिया. बताते चलें कि वो फैसला कुछ और नहीं, बल्कि मेंथा फार्मिंग का था.
2009 में शुरू की पुदीने की खेती
लोकल 18 से बात करते हुए परशुराम बताते हैं कि उन्होंने वर्ष 2009 में पुदीने की खेती की शुरुआत की थी. पहली बार उन्होंने इसे एक एकड़ में लगाया, जिससे तीन से चार महीने के अंदर ही क़रीब 40 क्विंटल तक मेंथा की पैदावार हुई. औषधीय गुणों से लैस होने की वजह से दुनिया की ज्यादातर फार्मा और कॉस्मेटिक कम्पनियां इसके तेल यानी मेंथा ऑयल की खरीदारी करती हैं.ऐसे में बाज़ार में हर वक्त पत्तियों की डिमांड बनी रहती है.
खुद निकालते हैं मेंथा ऑयल
स्थायी बाज़ार, लगातार मांग और उचित कीमत देख परशुराम ने इसके दायरे को बढ़ाया और 1000 हेक्टेयर में खेती की शुरुआत की.कुछ समय के बाद जब उनकी स्थिति में सुधार हुई, तब उन्होंने मेंथा से ऑयल निकालने की यूनिट डाल ली और पत्तियों से सीधे ऑयल के कारोबार पर उतर आएं.वर्तमान में वो एक सफल मेंथा ऑयल व्यवसायी है. उनका कहना है कि उनकी यूनिट में हर साल करीब 1000 लीटर मेंथा ऑयल की प्रोसेसिंग की जाती है. फिर उसे संघ के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय बाजार में 1200 से 1500 रुपए प्रति लीटर की दर से बेचा जाता है.
बरसात में शुरू कर सकते हैं फार्मिंग
मेंथा की खेती सिर्फ तीन से चार महीने की होती है. मुख्य रूप से इसे जनवरी से मार्च तक लगाया जाता है, लेकिन बरसात के दिनों में भी इसकी खेती की शुरूआत की जा सकती है.अच्छी उपज के लिए मिट्टी में 120-150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50-60 किग्रा फास्फोरस, 40 किग्रा पोटाश और 20 किग्रा सल्फर का उपयोग कृषि वैज्ञानिकों की सलाह के बाद प्रति हेक्टेयर की दर से जरूर करनी चाहिए.
कॉस्मेटिक से लेकर खाने पीने तक की वस्तुओं में इस्तेमाल
मजे की बात यह है कि थोड़ी बहुत देखभाल से ही प्रति एकड़ 40 से 50 क्विंटल मेंथा की पैदावार ली जा सकती है.चुकी इसकी तासीर औषधीय और ठंडी होती है, इसलिए कॉस्मेटिक प्रोडक्ट से लेकर फार्मा कंपनियां और खाने पीने तक की वस्तुओं में मेंथॉल का इस्तेमाल किया जाता है.
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अमित रंजन वर्तमान में News18 में बिहार, झारखंड और दिल्ली से जुड़ी खबरों के समन्वय और संपादन का कार्य देख रहे हैं. खोजी पत्रकारिता उनकी विशेष रुचि का क्षेत्र है. राजनीति, शिक्षा, खेल, क्राईम और मौसम जैसे विषयों …
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