उद्धव ठाकरे गुट और एकनाथ शिंदे गुट के बीच शिवसेना के नाम और ‘तीर-कमान’ चुनाव निशान को लेकर चल रही कानूनी लड़ाई पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. चीफ जस्टिस सूर्यकांत के नेतृत्व वाली बेंच के सामने उद्धव ठाकरे गुट की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देते हुए लंबी दलीलें रखीं, वहीं सीजेआई सूर्यकांत के एक सवाल ने अदालत का माहौल अचानक हल्का कर दिया.
दरअसल सीजेआई सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान पुराने एक मामले का जिक्र करते हुए कपिल सिब्बल से पूछा- ‘कौन जीता, पिता या बेटा?’ इस पर कपिल सिब्बल ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, ‘बेटे की जीत हुई. मैंने बेटे की पैरवी की थी.’ सिब्बल के इस जवाब पर कोर्ट में हल्का-फुल्का माहौल बन गया और ठहाके सुनाई दिए.
शिवसेना विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
सुप्रीम कोर्ट के सामने इस समय मूल सवाल यह है कि पार्टी में विभाजन के बाद ‘असली शिवसेना’ कौन है और पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर किस गुट का अधिकार है. निर्वाचन आयोग ने एकनाथ शिंदे गुट को असली शिवसेना मानते हुए पार्टी का नाम और ‘तीर-कमान’ चुनाव निशान उसके पक्ष में कर दिया था. वहीं उद्धव ठाकरे गुट ने आयोग के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.
बुधवार की सुनवाई में कपिल सिब्बल ने मुख्य रूप से यह तर्क दिया कि निर्वाचन आयोग ने पार्टी के संविधान और संगठनात्मक ढांचे से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेजों को सही तरीके से नहीं देखा. सिब्बल ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 29ए का हवाला देते हुए कहा कि पार्टी के नाम, मुख्य कार्यालय, पदाधिकारियों या पते में बदलाव होने पर निर्वाचन आयोग को इसकी जानकारी देना जरूरी है. उनके मुताबिक, उद्धव ठाकरे गुट ने नियमों के मुताबिक आयोग को जरूरी जानकारी उपलब्ध कराई थी.
सिब्बल ने दावा किया कि आयोग के पास पार्टी का 2018 का संविधान भी मौजूद था, लेकिन इसके बावजूद उसे नजरअंदाज किया गया. उन्होंने कहा कि दस्तावेज पर निर्वाचन आयोग की मुहर तक लगी हुई थी. अगर आयोग को लगता था कि दस्तावेज बाद में तैयार किया गया है, तो उसे उसी समय कार्रवाई करनी चाहिए थी. उनका आरोप था कि आयोग ने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को समझने के बजाय पहले से तय निष्कर्ष के आधार पर दस्तावेजों को देखा.
‘पक्ष प्रमुख’ को लेकर भी उठाया सवाल
सिब्बल ने दलील दी कि शिवसेना के संविधान के मुताबिक ‘पक्ष प्रमुख’ का पद चुनाव के जरिए तय होता है. उन्होंने कहा कि पार्टी की सर्वोच्च इकाई राष्ट्रीय कार्यकारिणी है और संगठन में अलग-अलग पदों की भूमिका संविधान में स्पष्ट रूप से निर्धारित है. उन्होंने यह भी बताया कि 2018 की पार्टी की सामान्य सभा में 12 उप-नेताओं को मनोनीत किया गया था, जबकि 21 उप-नेता निर्वाचित हुए थे. सिब्बल के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज निर्वाचन आयोग के पास उपलब्ध थे.
शिंदे गुट की ओर से इन दस्तावेजों की प्रामाणिकता पर सवाल उठाए जाने का जिक्र करते हुए सिब्बल ने कहा कि अगर दस्तावेज बाद में तैयार किए गए होते तो निर्वाचन आयोग की जिम्मेदारी थी कि वह उस पर कार्रवाई करता.
जस्टिस बागची ने पूछे अहम सवाल
इस मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने भी कई अहम सवाल उठाए. उन्होंने पूछा कि पार्टी में नेताओं की संख्या में बदलाव हुआ था तो क्या निर्वाचित सदस्यों की जानकारी आयोग को नहीं दी गई थी? सिब्बल ने जवाब दिया कि संगठन से जुड़े निर्वाचित और मनोनीत दोनों सदस्यों की जानकारी आयोग को दी गई थी.
जस्टिस बागची ने शिंदे गुट के उस तर्क का भी जिक्र किया कि संबंधित दस्तावेज बाद में तैयार किए गए थे. इस पर सिब्बल ने फिर दस्तावेज पर लगी निर्वाचन आयोग की मुहर का हवाला दिया.
‘विभाजन’ और चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र पर बहस
सुनवाई का एक अहम हिस्सा इस सवाल पर भी रहा कि पार्टी में हुए विभाजन को लेकर निर्वाचन आयोग किस हद तक निर्णय ले सकता है. जस्टिस बागची ने कहा कि पार्टी में विभाजन से जुड़े सवालों को संविधान की 10वीं अनुसूची के संदर्भ में भी देखना होगा. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या बाद में हुई घटनाओं को आयोग अपने फैसले में आधार बना सकता है.
सीजेआई सूर्यकांत ने भी सिब्बल की दलील पर टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर निर्वाचन आयोग के पास अधिकार क्षेत्र ही नहीं था, तो मामले की आगे की जांच का सवाल नहीं उठता. लेकिन अगर आयोग के पास अधिकार क्षेत्र था और उसने उसका गलत इस्तेमाल किया, तो यह अलग मुद्दा होगा.
सिब्बल का तर्क था कि आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल ही गलत तरीके से किया और जिस समय फैसला लिया गया, उस समय उसके सामने पर्याप्त दस्तावेज मौजूद नहीं थे.
‘शिंदे को पहले मुख्यमंत्री बनाकर बटोरा सपोर्ट’
सिब्बल ने शिंदे गुट के बढ़ते समर्थन का जिक्र करते हुए कहा कि किसी व्यक्ति के मुख्यमंत्री बनने के बाद स्वाभाविक रूप से कई लोग उसके साथ आ सकते हैं. लेकिन उनके मुताबिक, इस बाद की स्थिति को पहले हुए घटनाक्रम को सही ठहराने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. उन्होंने दावा किया कि शिंदे को पहले मुख्यमंत्री बनाया गया और बाद में उनके साथ आए विधायकों की संख्या को राजनीतिक समर्थन के तौर पर देखा गया.
सिब्बल ने यह भी कहा कि उद्धव ठाकरे को पार्टी के ‘पक्ष प्रमुख’ पद से हटाने का अधिकार बागी गुट के पास नहीं था. उनके मुताबिक, पार्टी के संविधान में पक्ष प्रमुख के चुनाव और संगठनात्मक अधिकारों की व्यवस्था स्पष्ट थी.
फिर आया ‘बाप-बेटे’ वाला वह सवाल
इसी कानूनी बहस के बीच सुप्रीम कोर्ट में कुछ देर के लिए माहौल हल्का हो गया. सिब्बल ने अपने तर्क में निर्वाचन आयोग के एक पुराने फैसले का उदाहरण दिया, जिसमें एक राजनीतिक दल में पिता और बेटे के बीच पार्टी पर नियंत्रण को लेकर विवाद हुआ था. इसी पर चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने मुस्कुराते हुए सवाल किया, ‘कौन जीता, पिता या बेटा?’ कपिल सिब्बल ने भी उसी हल्के अंदाज में जवाब दिया- ‘बेटे की जीत हुई. मैंने बेटे की पैरवी की थी.’
सिब्बल के इस जवाब के बाद कोर्ट में मौजूद लोगों के बीच हंसी का माहौल बन गया. गंभीर संवैधानिक और राजनीतिक बहस के बीच यह पल सुनवाई का सबसे दिलचस्प हिस्सा बन गया. हालांकि, इसके तुरंत बाद अदालत में फिर मूल कानूनी मुद्दों पर बहस शुरू हो गई.
गुरुवार को भी जारी रहेगी सुनवाई
शिवसेना के नाम और ‘तीर-कमान’ चुनाव निशान से जुड़े इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में दलीलें अभी पूरी नहीं हुई हैं. बुधवार की सुनवाई के बाद अदालत ने स्पष्ट किया कि मामले की सुनवाई गुरुवार को भी जारी रहेगी.
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने सिर्फ पार्टी के चुनाव निशान का सवाल नहीं है, बल्कि यह भी अहम है कि राजनीतिक दल के भीतर संगठन और विधायक दल के बीच अधिकारों को किस तरह देखा जाए और किसी विभाजन की स्थिति में निर्वाचन आयोग की भूमिका की सीमा क्या होगी. आने वाली सुनवाई में इन संवैधानिक और कानूनी सवालों पर बहस आगे बढ़ने की उम्मीद है.
उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे गुट के बीच शिवसेना के नाम और ‘तीर-कमान’ चुनाव निशान को लेकर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई. उद्धव गुट की ओर से कपिल सिब्बल ने निर्वाचन आयोग के फैसले और पार्टी के संविधान को लेकर दलीलें रखीं. सुनवाई के दौरान पुराने एक राजनीतिक विवाद का जिक्र आया तो CJI सूर्यकांत ने मुस्कुराते हुए पूछा- ‘कौन जीता, पिता या बेटा?’ इस पर सिब्बल ने जो जवाब दिया उस पर कोर्ट में हल्का माहौल बन गया. (IANS इनपुट के साथ)