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Supreme Court News: तमिलनाडु की विजय सरकार को शुक्रवार 14 अगस्तम 2026 को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी रहात मिली है. सुप्रीम कोर्ट की 2 जजों की बेंच ने हाईकोर्ट के उस आदेश पर फौरी तौर पर रोक लगा दी है, जिसमें तमिलनाडु सरकार की ओर से करुर भगदड़ में मारे गए लोगों के परिजनों को नौकरी देने की घोषणा को अमान्य करार दिया गया था.
सुप्रीम कोर्ट में थलापति विजय की सरकार से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान दिलचस्प वाकया हुआ.
Supreme Court News: तमिलनाडु की थलापति विजय सरकार के लिए शुक्रवार का दिन काफी अहम रहा. प्रदेश सरकार को करुर भगदड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है. सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के करूर में सितंबर 2025 में हुई भगदड़ में मारे गए 41 लोगों के परिजनों को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नौकरी देने के राज्य सरकार के फैसले को रद्द करने वाले मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी. शीर्ष अदालत ने तमिलनाडु सरकार और अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट के फैसले को फिलहाल प्रभावी होने से रोक दिया और मामले में नोटिस जारी किया. सुप्रीम कोर्ट में विजय सरकार की ओर से सीनियर एडवोकेट अभिषेक मनु सिंघवी पैरवी कर रहे थे. सुनवाई के दौरान कुछ ऐसा हुआ कि जज को कहना पड़ा कि यहां राजनीति न लाएं.
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलें सुनीं. सिंघवी ने सवाल उठाया कि यदि सरकार भगदड़ से प्रभावित परिवारों को राहत देने के लिए अनुकंपा नियुक्ति का फैसला करती है, तो इसमें आपत्ति का आधार क्या है. उन्होंने कहा कि रोजगार से जुड़े इस फैसले के खिलाफ जनहित याचिका (पीआईएल) दायर करने का आधार ही सवालों के घेरे में है. सुनवाई के दौरान पीठ ने भी राज्य सरकार को पीड़ित परिवारों को रोजगार देने से रोकने के औचित्य पर सवाल उठाया. जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि भगदड़ में लोगों की मौत हुई और यदि सरकार ने प्रभावित परिवारों को राहत देने के लिए आर्थिक सहायता या रोजगार देने का निर्णय लिया है, तो इस पर सवाल क्यों उठाया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि यदि किसी परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य हादसे में मारा गया हो, तो क्या सरकार उसके बेटे या बेटी को रोजगार देने पर विचार नहीं कर सकती?
‘यहां राजनीति मत लाइए’
मामले में राज्य सरकार के फैसले का विरोध कर रहे एक वकील ने दलील दी कि सरकार को इस तरह सरकारी नौकरियां बांटने का विवेकाधिकार नहीं दिया जा सकता. उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जिस राजनीतिक दल पर भगदड़ के लिए कथित तौर पर जिम्मेदारी होने का आरोप है, वही पार्टी वर्तमान में राज्य में सत्ता में है. ऐसे में पीड़ित परिवारों को सरकारी नौकरी देने के फैसले में हितों के टकराव की आशंका है. इस पर पीठ ने वकील से पूछा कि वह किस राजनीतिक दल की ओर से पेश हो रहे हैं. वकील के यह बताने पर कि वह एक राजनीतिक पार्टी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, जस्टिस के विनोद चंद्रन ने कहा, ‘यहां राजनीति मत लाइए.’
मद्रास हाईकोर्ट का क्या था फैसला
मद्रास हाईकोर्ट ने इससे पहले राज्य सरकार के उस फैसले को रद्द कर दिया था, जिसके तहत करुर भगदड़ में जान गंवाने वाले 41 लोगों के परिवारों के सदस्यों को अनुकंपा के आधार पर सरकारी नियुक्ति देने का निर्णय लिया गया था. सुप्रीम कोर्ट के शुक्रवार के आदेश के बाद फिलहाल हाईकोर्ट के फैसले पर रोक रहेगी और राज्य सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर आगे सुनवाई होगी. करुर में सितंबर 2025 में हुई इस भगदड़ में 41 लोगों की मौत हुई थी. हादसे के बाद पीड़ित परिवारों के लिए मुआवजे और पुनर्वास सहित विभिन्न राहत उपायों की घोषणा की गई थी. सरकारी नौकरी देने का निर्णय भी इन्हीं राहत उपायों का हिस्सा था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है.
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बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली से प्रारंभिक के साथ उच्च शिक्षा हासिल की. झांसी से ग्रैजुएशन करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में PG डिप्लोमा किया. Hindustan Times ग्रुप से प्रोफेशनल कॅरियर की शु…
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