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खेती नहीं, जैविक खाद के कारोबार से बनीं आत्मनिर्भर, पलामू की रीना...


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खेती नहीं, जैविक खाद के कारोबार से बनीं आत्मनिर्भर, महिला ने लगाया हटकर दिमाग

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झारखंड के पलामू की रीना देवी जैविक खाद बनाकर स्वावलंबी बनी हैं. उद्यान विभाग के सहयोग से उन्होंने वर्मी कंपोस्ट यूनिट लगाई. वह ब्रह्मास्त्र और निर्मास्त्र जैसे उत्पाद तैयार करती हैं. बाजार से कम दाम में खाद बेचकर वह प्रति सीजन 25-30 हजार रुपये कमा रही हैं.

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पलामूः बदलते दौर में किसान रसायनीक के बजाए जैविक खेती की ओर बढ़ रहे है. जिसके लिए सरकार की ओर से किसानों को जैविक खेती के लिए लगातार प्रोत्साहित किया जा रहा है. इसका असर अब गांवों में भी देखने को मिल रहा है. पलामू जिले के चैनपुर प्रखंड के चेडाबार गांव की महिला किसान जैविक खाद तैयार कर आत्मनिर्भर बन रही हैं. उद्यान विभाग की ओर से उन्हें जैविक खाद तैयार करने के लिए यूनिट उपलब्ध कराया गया है.

पलामू जिले की महिला किसान रीना देवी पिछले करीब दो वर्षों से वर्मी कंपोस्ट तैयार कर रही हैं. उनके यूनिट में पांच बेड हैं, जिनमें केंचुआ खाद तैयार की जाती है. उन्होंने बताया कि शुरुआत में कृषि विज्ञान केंद्र से जैविक खाद तैयार करने का प्रशिक्षण भी लिया है. प्रशिक्षण के बाद उन्होंने नाडेप खाद तैयार करने की दिशा में भी काम शुरू किया. वर्तमान में वह वर्मी कंपोस्ट, केंचुआ खाद के साथ निर्मास्त्र और ब्रह्मास्त्र जैसे जैविक उत्पाद भी तैयार करती हैं. इन उत्पादों को वह किसानों को बाजार की तुलना में कम कीमत पर उपलब्ध कराती हैं.

उन्होंने कहा कि केंचुआ खाद तैयार होने में करीब 60 से 65 दिन का समय लगता है. वर्तमान में उनके पास चार बैग खाद तैयार है. एक यूनिट में करीब दो क्विंटल से अधिक केंचुआ खाद तैयार होती है. वह इसे करीब 20 रुपये प्रति किलो की दर से उपलब्ध कराती हैं, जबकि बाजार में इसकी कीमत 50 से 60 रुपये प्रति किलो तक मिल जाती है. इस तरह एक बार खाद तैयार होने पर उन्हें अच्छी आमदनी हो जाती है. उनका कहना है कि जैविक खाद के कारोबार से एक सीजन में करीब 25 से 30 हजार रुपये तक की कमाई हो जाती है.

आगे कहा कि वर्मी कंपोस्ट तैयार करने की प्रक्रिया भी काफी सरल है. सबसे नीचे सागवान के पत्ते और पेड़-पौधों के अपशिष्ट की परत बिछाई जाती है. इसके बाद मिट्टी और गोबर की परत डाली जाती है. इसी क्रम में पत्ते, मिट्टी और गोबर की करीब छह परतें तैयार की जाती हैं. इसके बाद इसमें केंचुए डाले जाते हैं. उचित नमी और देखभाल के साथ करीब 60 से 65 दिनों में जैविक खाद तैयार हो जाती है.

रीना देवी ने कहा कि जैविक खाद तैयार करने से किसानों को कम लागत में खेती के लिए बेहतर विकल्प मिल रहा है, वहीं इससे ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार और अतिरिक्त आमदनी का रास्ता भी खुल रहा है. सरकारी प्रशिक्षण और विभागीय सहयोग से उन्होंने इसे छोटे कारोबार का रूप दिया है. अब वह जैविक खाद तैयार कर किसानों तक पहुंचाने के साथ खुद भी अच्छी कमाई कर रही हैं.

About the Author

Prashun Singh

प्रसून सिंह को मीडिया में 7 साल काम करने का अनुभव है. खबरों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रोचक अंजाद में पेश करना खासियत है. दैनिक भास्कर अखबार में इंटर्नशिप के साथ करियर की शुरुआत हुई.

इसके बाद ETV Bharat (बिहार)…

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