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UP CM के गजब किस्से: रक्षाबंधन आने वाला है. घरों से लेकर बाजारों तक त्योहार की खुशबू महसूस होने लगी है. बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बांधने के लिए तैयारियां कर रही हैं. कोई राखी खरीद रहा है तो कोई भाई के लिए मिठाई और उपहार खरीदने की सोच रहा है, खरीद रहा है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ की कलाई पर भी हर साल राखी सजती है? क्या उनकी सगी बहन शशि भाई को राखी बांधने खुद आती हैं? आखिर योगी की कलाई पर आखिरी बार कब बंधी थी राखी? और इस रिश्ते की कहानी क्या है? ‘UP CM के गजब किस्से’ के इस पार्ट में जानिए योगी और उनकी बहन से जुड़ी पूरी कहानी.
CM योगी के परिवार का कड़वा सच: देश के सबसे बड़े सूबे के मुखिया की बहन ऐसे जीती है आम जिंदगी!
देश में रक्षाबंधन के लिए बाजारों में राखियों की दुकानें सज चुकी हैं. बहनें अपने भाइयों के लिए पसंद की राखी खरीद रही हैं. कहीं भाई अपनी बहन को लेने पहुंच रहे हैं तो कहीं बहनें अपने भाई के लिए राखी पोस्ट कर रही हैं. तो कहीं बहन मायके जाने की तैयारी कर रही है. ऐसे में आज हम आपको ‘UP CM के गजब किस्से’ के इस पार्ट में बताएंगे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के रक्षाबंधन की कहानी. क्या योगी हर साल अपनी सगी बहन से राखी बंधवाते हैं? क्या उनकी बहन राखी बांधने खुद आती हैं? या फिर भाई की कलाई तक राखी किसी और तरीके से पहुंचती है? इन सवालों का जवाब उनकी बहन शशि की कहानी में छिपा है. जानते हैं पूरी बात.
मुख्यमंत्री योगी ने कब बंधवाई थी राखी?
राखी की बात आई तो छलक पड़े आंसू
मीडिया में छपी खबर के मुताबिक, दैनिक भास्कर से बातचीत में योगी की बहन शशि ने राखी को लेकर अपनी बात रखी थी. उन्होंने बताया था कि वह हर साल अपने भाई के लिए राखी भेजती हैं. लेकिन अपने हाथों से आखिरी बार कब राखी बांधी थी, यह उन्हें याद नहीं है. शशि ने कहा था कि वह नहीं जानतीं कि अब अपने हाथों से महाराज को राखी कब बांध पाएंगी. भाई के साथ बिताया हर पल उन्हें याद आता है. यह कहते-कहते उनकी आंखें भर आईं. वह उठकर दुकान के एक कोने में चली गईं और रोने लगीं. राखी का यह किस्सा इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें सिर्फ एक त्योहार नहीं है. इसमें उस भाई की याद है, जिसके साथ बचपन बीता. फिर वही भाई संन्यास लेकर परिवार से दूर चला गया.
बहन की डोली योगी ने खुद उठाई थी
शशि ने अपनी शादी की याद भी बताई थी. उनकी शादी 5 मार्च 1991 को हुई थी. उस दिन भाई योगी ने शादी की कई रस्में खुद निभाई थीं. फेरों के समय खील-बताशे डालने से लेकर दूसरी रस्मों तक वह मौजूद रहे. सबसे भावुक बात उन्होंने डोली को लेकर बताई थी. शशि के मुताबिक, उनकी डोली भी योगी ने खुद उठाई थी. शादी के बाद भी भाई बहन के घर आते-जाते रहे. जब योगी ऋषिकेश में पढ़ाई कर रहे थे, तब वह दिल्ली से पैदल भी बहन के गांव तक आया करते थे. उस समय गांव तक सड़क नहीं बनी थी. शशि की छोटी बेटी से भी उन्हें काफी लगाव था. वह उसे देखने के लिए बहन के घर आया करते थे.
पहाड़ में आज भी चाय बेचती हैं शशि
योगी आदित्यनाथ की बहन शशि उत्तराखंड के कोठार गांव में रहती हैं. गांव से करीब ढाई किलोमीटर दूर पहाड़ पर पार्वती मंदिर के पास उनकी चाय-नाश्ते, प्रसाद और शिकंजी की दुकान है. शशि ने बताया था कि पहाड़ में खेती से घर चलाना मुश्किल हो रहा था. थोड़ी खेती होती थी तो कई बार जानवर उसे नुकसान पहुंचा देते थे. गाय-भैंस पालने से भी परिवार का खर्च पूरा नहीं हो रहा था. इसके बाद उन्होंने 2010 में एक छोटी झोपड़ी में चाय-नाश्ते और प्रसाद की दुकान शुरू की. कोरोना लॉकडाउन के दौरान उन्होंने दुकान में खुद टीन लगाई. बाद में दुकान बेहतर हो गई. अब बारिश में पानी अंदर नहीं आता. दुकान में उन्होंने अपने भाई योगी की तस्वीर भी लगा रखी है.
भाई को टीवी पर देखकर भावुक हुई थीं शशि
एक टीवी इंटरव्यू के दौरान बहन की तस्वीर देखकर योगी भावुक हो गए थे. उनकी आंखों में आंसू आ गए थे और वह कुछ देर बोल नहीं पाए थे. जब शशि से इस बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा था कि महाराज जी को इतना भावुक नहीं होना चाहिए. उनके लिए दुकान पर काम करना रोज की जिंदगी का हिस्सा है. उन्होंने कहा था कि छोटे गांव का जीवन ऐसा ही होता है. बिना काम किए कोई कैसे खाएगा. यह बात कहते हुए शशि की आंखों में भी आंसू आ गए थे.यानी भाई को अपनी हालत देखकर दुखी होने की जरूरत नहीं है. शशि अपने जीवन को संघर्ष की बजाय सामान्य ग्रामीण जिंदगी के तौर पर देखती हैं.
त्योहारों पर होती है परिवार से बात
योगी के जीजा पूरन सिंह पायल ने भी मुलाकातों को लेकर जानकारी दी थी. उस समय उनके मुताबिक, 2019 में ऋषिकेश में योगी से मुलाकात हुई थी. यह मुलाकात करीब 10 मिनट की रही. इसके बाद परिवार की मुलाकातें बहुत कम हो गईं. शशि से त्योहारों पर फोन के जरिए बातचीत हो जाती थी. बातचीत भी अक्सर निजी तौर पर सीधे नहीं, बल्कि पीए के माध्यम से होती थी.