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इंदिरा गांधी की कैबिनेट के इकलौते जीवित सदस्य डॉ. कर्ण सिंह ने बांग्लादेश की आजादी के दौर को याद करते हुए अपनी यादें साझा की हैं. उन्होंने हाल की एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि जब उन्होंने टीवी पर कुछ लोगों को शेख मुजीब की प्रतिमा को हथौड़े से तोड़ते देखा तो उन्हें गहरा झटका लगा.
इंदिरा गांधी की कैबिनेट के इकलौते जीवित सदस्य डॉ. कर्ण सिंह ने बांग्लादेश की आजादी के दौर को याद करते हुए अपनी यादें साझा की हैं.
बांग्लादेश की आजादी और 1971 के युद्ध को याद करते हुए इंदिरा गांधी की कैबिनेट के इकलौते जीवित सदस्य डॉ. कर्ण सिंह ने उस दौर की अपनी यादें साझा की हैं. उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी शायद उस जबरदस्त खुशी को पूरी तरह महसूस नहीं कर सकती, जो बांग्लादेश के एक स्वतंत्र देश के रूप में उभरने पर पूरे भारत में थी. डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि अगर शेख मुजीबुर रहमान नहीं होते तो शायद बांग्लादेश का अस्तित्व ही नहीं होता. उन्होंने हाल की एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि जब उन्होंने टीवी पर कुछ लोगों को शेख मुजीब की प्रतिमा को हथौड़े से तोड़ते देखा तो उन्हें गहरा झटका लगा. उन्होंने इसकी तुलना भारत में महात्मा गांधी की प्रतिमा तोड़े जाने से की.
उन्होंने 1971 के उस दौर को याद किया, जब पूर्वी पाकिस्तान में जनरल टिक्का खान की ज्यादतियों के बाद लाखों शरणार्थी भारत आने लगे थे. उनकी संख्या बढ़कर कई लाख तक पहुंच गई थी और देश को इंतजार था कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी कब हस्तक्षेप का फैसला लेंगी.
सही वक्त का इंतजार, फिर एक साथ वार
डॉ. कर्ण सिंह के मुताबिक, तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल सैम मानेकशॉ की सलाह पर इंदिरा गांधी ने सही समय का इंतजार किया. जब परिस्थितियां अनुकूल हुईं तो भारतीय सेना और मुक्ति बाहिनी ने शानदार तरीके से युद्ध लड़ा. महज 15 दिनों के भीतर निर्णायक जीत हासिल हुई और 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तानी सेना के जनरल नियाजी ने जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के सामने आत्मसमर्पण किया. तब भारतीय सेना के सामने करीब 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने हथियार डाल दिए.
जब दौड़ते हुए लोकसभा में आईं इंदिरा गांधी
डॉ. कर्ण सिंह ने लोकसभा का वह ऐतिहासिक पल भी याद किया, जब बांग्लादेश की आजादी का ऐलान हुआ था. उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी आमतौर पर अपने भावनाओं को सार्वजनिक रूप से व्यक्त नहीं करती थीं. लेकिन उस दिन वह लगभग दौड़ते हुए सदन में आईं और स्पीकर से कहा कि उन्हें एक महत्वपूर्ण घोषणा करनी है. इसके बाद सदन में सन्नाटा छा गया. इंदिरा गांधी ने घोषणा की कि भारतीय सेना और मुक्ति बाहिनी विजयी हो चुकी हैं और ढाका अब एक आज़ाद देश की आज़ाद राजधानी है.
शेख हसीना को शरण पर क्या बोले कर्ण सिंह?
डॉ. कर्ण सिंह के अनुसार, यह सुनते ही लोकसभा खुशी से गूंज उठी और पूरे देश में जश्न का माहौल था. उनके लिए यह सिर्फ एक सैन्य जीत नहीं, बल्कि इतिहास का वह क्षण था, जब एक नए राष्ट्र बांग्लादेश का जन्म हुआ. डॉ. कर्ण सिंह ने अपने बयान में मौजूदा परिस्थितियों पर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि भारत ने बांग्लादेश की मुक्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और दोनों देशों के लोगों को उस इतिहास को याद रखना चाहिए.
शेख हसीना के भारत में रहने के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि वह शेख मुजीब की जीवित बेटी हैं और भारत की परंपरा हमेशा से शरण और संरक्षण देने की रही है. अगर वह अपनी जान को खतरे के बावजूद वापस लौटने का फैसला करती हैं तो यह उनका अपना निर्णय होगा.
डॉ. कर्ण सिंह ने कहा कि बांग्लादेश की सरकार और वहां के लोगों को अपने देश के निर्माण में भारत की भूमिका को याद रखना चाहिए, क्योंकि 1971 की वह जीत सिर्फ युद्ध के मैदान में हासिल की गई जीत नहीं थी, बल्कि दक्षिण एशिया के इतिहास को बदल देने वाला एक ऐतिहासिक मोड़ था.
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साद बिन उमर मीडिया इंडस्ट्री में 15 साल से अधिक के अनुभव वाले सीनियर पत्रकार हैं. वह अभी News18 Hindi (hindi.news18.com) से जुड़े हैं, जहां वे होम पेज डेस्क पर काम करते हैं.
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