रांची. कभी जिंदगी का रास्ता बंदूक और नक्सली गतिविधियों के साये से होकर गुजरता था, लेकिन अब एक नई सुबह ने दस्तक दी है. हाथों में हथियार की जगह जीवनसाथी का हाथ है और बीते कल की जगह साथ मिलकर भविष्य बनाने की उम्मीद. झारखंड के हजारीबाग ओपन जेल में हुई एक शादी की कहानी कुछ ऐसी ही है, जहां पूर्व नक्सली कमांडर सुरेश सिंह मुंडा ने सोमवारी हेमराम के साथ सात फेरे लेकर नई जिंदगी की शुरुआत की.
इस शादी की सबसे खास तस्वीर यह रही कि पुलिस और जिला प्रशासन के अधिकारी बाराती बनकर पहुंचे. जिन अधिकारियों की जिम्मेदारी कभी नक्सलवाद के खिलाफ अभियान चलाने की थी, वे इस मौके पर एक नए रिश्ते की शुरुआत के गवाह बने. यह सिर्फ दो लोगों के विवाह का आयोजन नहीं था, बल्कि हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने की कोशिश की एक तस्वीर भी थी.
बंदूक की दुनिया से रिश्तों की नई शुरुआत
रांची जिले के बुंडू थाना क्षेत्र के बारूहातू गांव के रहने वाले सुरेश सिंह मुंडा का अतीत नक्सली गतिविधियों से जुड़ा रहा है. वहीं, उनकी जीवनसंगिनी बनीं सोमवारी हेमराम तमाड़ के अराहंगा गांव की रहने वाली हैं. सरेंडर के बाद दोनों अब अपने जीवन को एक नई दिशा देने की ओर बढ़ रहे हैं. जिंदगी में कुछ फैसले ऐसे होते हैं, जो बीते कल से आगे निकलने की उम्मीद जगाते हैं. सुरेश और सोमवारी की शादी भी इसी बदलाव की कहानी कहती है. यह नई शुरुआत कितनी सफल होगी, यह वक्त बताएगा, लेकिन इस पहल ने उनके सामने सामान्य जीवन जीने की एक नई संभावना जरूर रखी है.
जब पुलिस और प्रशासन बना बाराती
इस शादी को खास बनाने में झारखंड पुलिस और जिला प्रशासन की भूमिका अहम रही. डीजीपी तदाशा मिश्रा के निर्देश पर शादी को लेकर पहल की गई. समारोह में हजारीबाग पुलिस और जिला प्रशासन के अधिकारी शामिल हुए और बाराती बनकर नवदंपती के इस खास दिन का हिस्सा बने. हजारीबाग के जिला विवाह पदाधिकारी राजेश एक्का ने विवाह का पंजीकरण कराया. प्रशासन की इस भागीदारी ने आयोजन को एक अलग पहचान दी. यह संदेश भी सामने आया कि सरेंडर करने वालों को केवल सुरक्षा और कानून के दायरे में देखना ही नहीं, बल्कि उनके पुनर्वास और सामाजिक जीवन में वापसी के रास्ते भी तलाशना जरूरी है.
नई जिंदगी, नई उम्मीद
नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई केवल हथियारों और अभियानों तक सीमित नहीं है. सरेंडर करने वालों को समाज की मुख्यधारा में लौटने का अवसर देना भी इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा है. जब कोई व्यक्ति हिंसा का रास्ता छोड़ता है, तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती सामान्य जीवन में लौटना, रिश्ते बनाना और समाज के बीच अपनी जगह तैयार करना होती है.
शादी के जरिए दिया बड़ा संदेश
सुरेश सिंह मुंडा और सोमवारी हेमराम की शादी इसी चुनौती के बीच उम्मीद की एक तस्वीर बनकर सामने आई है. पुलिस और प्रशासन की पहल ने इस नई शुरुआत को सहारा दिया है. अब उम्मीद है कि यह जोड़ा अपने अतीत से आगे बढ़कर परिवार और समाज के बीच एक सामान्य जिंदगी बिता सकेगा. हजारीबाग ओपन जेल में हुई इस शादी की कहानी का संदेश साफ है- अतीत चाहे जैसा रहा हो, बदलाव की कोशिश से भविष्य के लिए नई राह निकल सकती है. बंदूक से दूर और रिश्तों के करीब आने का यह कदम झारखंड में नक्सलियों के पुनर्वास की चर्चा को एक मानवीय पहलू देता है.