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Bihar Success Story: देवघर के अमित कुमार ने दो सरकारी नौकरियां छोड़कर विदेशी तकनीक से मछली पालन शुरू किया है. उन्होंने आरएएस तकनीक और सीमेंट टैंक के जरिए बिना तालाब के इंडोर फिशरीज की शुरुआत की. इस प्रयास से उन्हें सालाना 70 से 80 लाख रुपये का टर्नओवर मिल रहा है.
देवघरः आज के समय में युवा सरकारी नौकरी पाने के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं. कोई सालों तक परीक्षा की तैयारी करता है, तो कोई नौकरी के लिए एक शहर से दूसरे शहर भटकता है. लेकिन देवघर के एक युवा ने सरकारी नौकरी मिलने के बाद भी कुछ अलग करने की ठानी. उन्होंने नौकरी की सुरक्षा छोड़कर ऐसा काम शुरू किया, जिसके बारे में बहुत कम लोग सोचते हैं. आज यही युवा बिना तालाब के मछली पालन कर रहे हैं और सालाना लाखों रुपये का कारोबार खड़ा कर चुके हैं. हम बात कर रहे हैं देवघर जिले के जसीडीह थाना क्षेत्र के बसमंडीह गांव के रहने वाले अमित कुमार की. जिन्होंने अपनी मेहनत और नई तकनीक के दम पर मछली पालन को रोजगार का जरिया बनाया है.
विदेशी तकनीक के साथ शुरू की फिश फार्मिंग
अमित कुमार का यह सफर अचानक शुरू नहीं हुआ. उन्होंने वर्ष 2007 में रोजगार सेवक की नौकरी शुरू की थी. इसके बाद वर्ष 2011 में झारखंड सचिवालय में नौकरी मिली, तो उन्होंने रोजगार सेवक की नौकरी छोड़ दी. लेकिन सचिवालय की नौकरी में भी उनका मन नहीं लगा. आखिरकार उन्होंने नौकरी छोड़कर खेती-किसानी और कृषि के क्षेत्र में कुछ नया करने का फैसला किया. इसके बाद वर्ष 2011 से 2018 तक अमित ने देश के अलग-अलग शहरों में जाकर प्रशिक्षण लिया. मथुरा, बाराबंकी, मुंबई, कोलकाता और हैदराबाद जैसे शहरों में उन्होंने कई तरह की तकनीकों को समझा और अपने लिए रोजगार का रास्ता तलाशते रहे. आखिरकार वर्ष 2018 में उन्होंने इंडोर फिशरीज प्रोजेक्ट के जरिए मछली पालन शुरू किया.
क्या है अमित की मछली पालन की तकनीक?
इस तकनीक की सबसे खास बात यह है कि मछली पालने के लिए बड़े तालाब या बहुत ज्यादा जमीन की जरूरत नहीं पड़ती. सीमेंट के टैंक बनाए जाते हैं और उन्हें शेड के अंदर रखा जाता है. इसी में मछलियों को पाला जाता है. इस तरीके को इंडोर फिशरीज कहा जाता है. इसमें पानी की गुणवत्ता का ध्यान रखना पड़ता है और मछलियों को समय पर भोजन देना होता है. अमित इसी तकनीक के तहत रिसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम यानी आरएएस आधारित मछली पालन कर रहे हैं. इस व्यवस्था में पानी का प्रबंधन सही तरीके से किया जाता है. जिससे कम जगह में भी बड़ी संख्या में मछलियां पाली जा सकती हैं.
50 लाख की लागत से शुरू की फिश फार्मिंग
अमित ने इस प्रोजेक्ट की शुरुआत करीब 50 लाख रुपये की लागत से की. इसमें उन्हें सरकार की ओर से 20 लाख रुपये का अनुदान मिला, जबकि 30 लाख रुपये उन्हें खुद लगाने पड़े. अमित के मुताबिक उनके प्लांट में एक समय में करीब 50 हजार मछलियां पालने की क्षमता है. मछलियों को बाजार में बेचने लायक आकार तक पहुंचने में लगभग छह महीने लगते हैं. इस दौरान पानी की सफाई, उसकी गुणवत्ता और मछलियों के भोजन पर खास ध्यान देना पड़ता है. अमित बताते हैं कि इस प्रोजेक्ट से सालाना करीब 70 से 80 लाख रुपये का टर्नओवर होता है. हालांकि, टर्नओवर और वास्तविक मुनाफा अलग-अलग होते हैं, क्योंकि इसमें चारा, बिजली, रखरखाव और दूसरे खर्च भी शामिल हैं. इनका प्लांट 4 एकड़ में फैला हुआ है.
सही तकनीक, मेहनत और हुनर भी बन सकता रोजगार का जरिया
एक समय सरकारी नौकरी करने वाले अमित आज अपने प्लांट के जरिए दूसरे युवाओं को भी स्वरोजगार का रास्ता दिखा रहे हैं. उनके काम को देखने और इस तकनीक को समझने के लिए लोग भी पहुंचते हैं. अमित की कोशिश है कि युवा सिर्फ नौकरी की तलाश तक सीमित न रहें, बल्कि अपने हुनर और मेहनत से रोजगार देने वाले भी बनें. देवघर में इंडोर फिशरीज के जरिए उन्होंने यह दिखाया है कि पारंपरिक तरीके से अलग सोचकर भी मछली पालन में अवसर तलाशे जा सकते हैं.
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प्रसून सिंह को मीडिया में 7 साल काम करने का अनुभव है. खबरों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर रोचक अंजाद में पेश करना खासियत है. दैनिक भास्कर अखबार में इंटर्नशिप के साथ करियर की शुरुआत हुई.
इसके बाद ETV Bharat (बिहार)…