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Bui Plant Rajasthan: बॉटनी विभाग की प्रोफेसर डॉ. सुमनलता त्रिपाठी ने बताया कि इन दिनों बुई के पौधे पर सफेद रंग की रूई दिखाई देती है. इसे जंगली रूई के नाम से भी जाना जाता है. इसकी कई प्रजातियां पाई जाती हैं और यह मुख्य रूप से अर्धशुष्क क्षेत्रों में उगता है. इस पौधे के अलग-अलग हिस्सों का पारंपरिक रूप से उपयोग किया जाता रहा है.
बीकानेर. थार रेगिस्तान में प्रकृति ने ऐसे कई अनमोल पौधे दिए हैं, जिनसे कभी ग्रामीण जीवन की जरूरतें पूरी होती थीं. समय के साथ भले ही लोगों ने इनका इस्तेमाल कम कर दिया हो, लेकिन आज भी इन पौधों का पारंपरिक महत्व बरकरार है. ऐसा ही एक पौधा है बुई, जिसे जंगली रूई के नाम से भी जाना जाता है. इस पौधे की खासियत है कि इससे केवल रूई ही नहीं, बल्कि बीज भी मिलते हैं. एक समय था जब ग्रामीण लोग इसके बीजों को गेहूं के आटे में मिलाकर रोटियां बनाते थे. वहीं, इसकी रूई से रजाई, गद्दे और तकिए तैयार किए जाते थे. खेतों और रेतीले धोरों में अपने आप उगने वाला यह पौधा आज भी पशुओं के लिए उपयोगी है. खासकर ऊंट इसकी रूई खाना पसंद करते हैं.
बॉटनी विभाग की प्रोफेसर डॉ. सुमनलता त्रिपाठी ने बताया कि इन दिनों बुई के पौधे पर सफेद रंग की रूई दिखाई देती है. इसे जंगली रूई के नाम से भी जाना जाता है. इसकी कई प्रजातियां पाई जाती हैं और यह मुख्य रूप से अर्धशुष्क क्षेत्रों में उगता है. इस पौधे के अलग-अलग हिस्सों का पारंपरिक रूप से उपयोग किया जाता रहा है. इसके फूलों का रस भी प्राणियों के घावों पर लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था. पौधे के ऊपरी हिस्से में निकलने वाली रूई को इकट्ठा कर बिस्तर, तकिए और रजाई बनाने में काम लिया जाता था. इसके बीज और अन्य हिस्से भी उपयोगी माने जाते हैं.
रोटियां बनाने का चलन लगभग खत्म हो गया
उन्होंने बताया कि बुई का पौधा ग्रामीण जीवन में भोजन का भी हिस्सा रहा है. पहले जब खाद्य संसाधन सीमित होते थे, तब लोग इसके बीजों को इकट्ठा करते थे. इन बीजों को गेहूं के आटे में मिलाकर आटा तैयार किया जाता था और फिर उसकी रोटियां सेंकी जाती थीं. इस तरह रेगिस्तान में प्राकृतिक रूप से उगने वाला यह पौधा लोगों के भोजन में भी अपनी जगह रखता था. हालांकि, अब इसकी रोटियां बनाने का चलन लगभग खत्म हो गया है. इसकी वजह बीज इकट्ठा करने और उन्हें उपयोग के लायक बनाने में लगने वाली मेहनत है.
पारंपरिक उपयोग ग्रामीण जीवन की एक खास पहचान रहा
वे बताती हैं कि बुई के पौधे की एक और खासियत इसमें निकलने वाली सफेद रूई है. पहले ग्रामीण लोग इस रूई को इकट्ठा करके घरों में रखते थे. इसी से रजाई, गद्दे और तकिए तैयार किए जाते थे. उस समय बाजार से रूई खरीदने के बजाय लोग स्थानीय स्तर पर उपलब्ध इस प्राकृतिक संसाधन का इस्तेमाल करते थे. आज भले ही बाजार में कई तरह के बिस्तर उपलब्ध हैं, लेकिन बुई की रूई का पारंपरिक उपयोग ग्रामीण जीवन की एक खास पहचान रहा है.
बुई की पत्तियां और रूई पशुओं के भी काम आती
डॉ सुमनलता ने बताया कि बुई की पत्तियां और रूई पशुओं के भी काम आती हैं. खासतौर पर ऊंट इस पौधे की रूई खाना पसंद करते हैं. रेगिस्तानी इलाकों में पशुपालन करने वाले लोगों के लिए ऐसे प्राकृतिक पौधे काफी उपयोगी रहे हैं. बारिश होने के बाद खेतों और धोरों में यह पौधा अपने आप उग आता है. इसकी खासियत यह भी है कि इसके बीज जमीन में बने रहते हैं और अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर दोबारा पौधे उगने लगते हैं.
कई घरेलू और खेती से जुड़े कामों में भी किया जाता रहा
उन्होंने बताया कि ग्रामीण इलाकों में बुई के पौधे का इस्तेमाल कई घरेलू और खेती से जुड़े कामों में भी किया जाता रहा है. किसानों के पैरों में गंदा पानी लगने या सूजन होने पर पहले इसकी पत्तियों से सेंक किया जाता था. वहीं, इसका तना काफी मजबूत होता है. रेतीली जमीन में वाहन के टायर फंस जाने पर लोग इसके तने को टायर के नीचे लगाकर वाहन को बाहर निकालने का प्रयास करते हैं.
रेतीले इलाकों में बुई की मौजूदगी लंबे समय से बनी हुई
त्रिपाठी ने बताया कि बुई का पौधा बारिश होने के बाद खेतों और धोरों में उगता है. इसकी पत्तियां निकलने के कुछ समय बाद फूल आते हैं और फिर उनमें बीज विकसित होते हैं. यह पौधा ज्यादा सर्दी सहन नहीं कर पाता और अत्यधिक ठंड पड़ने पर खराब हो सकता है. हालांकि, इसके बीज जमीन में बने रहने के कारण अनुकूल मौसम मिलने पर नए पौधे उग आते हैं. यही वजह है कि थार के रेतीले इलाकों में बुई की मौजूदगी लंबे समय से बनी हुई है.
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मेरा नाम जागृति दुबे है. मीडिया और डिजिटल पत्रकारिता की दुनिया में पिछले 6 वर्षों से सक्रिय हूं. पत्रकारिता के प्रति अपने जुनून को मैंने वर्ष 2019 में GBN 24 न्यूज़ चैनल से इंटर्नशिप के साथ शुरुआत देकर एक पेशेव…