जमशेदपुर. दीपावली पर हर घर को रोशन करने वाले मिट्टी के दीयों के पीछे कुम्हार परिवारों की महीनों की मेहनत होती है. जमशेदपुर के साकची स्थित बाराद्वारी कुम्हारपाड़ा में हेमंत कुमार इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. रेडियो पर पुराने गीत सुनते हुए वे मिट्टी को दीये और खिलौनों का आकार देते हैं. हेमंत बताते हैं कि उनके दादा और पिता भी इसी काम से जुड़े थे और अब वे करीब 45 वर्षों से वे इस विरासत को संभाल रहे हैं. हालांकि, अब उन्हें चिंता है कि मिट्टी की बढ़ती कीमत, सरकारी सुविधाओं का अभाव और मेहनत के अनुरूप कमाई नहीं होने के कारण उनके बाद परिवार की अगली पीढ़ी इस काम को जारी नहीं रखेगी.
रेडियो की धुन पर मिट्टी को आकार देते हैं हेमंत कुमार
हालांकि, हेमंत कुमार अभी भी अनवरत इस पेशे से जुड़े हुए हैं क्योंकि इनके लिए कुम्हारी सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि उनके परिवार की पहचान और पूर्वजों की विरासत है. दादा से पिता और पिता से उन्हें मिली इस कला को वे आज भी पूरे मन से निभा रहे हैं. दीपावली के लिए मिट्टी के दीये और खिलौने तैयार करने में उनका पूरा परिवार जुटा है. रेडियो के पुराने गीतों के बीच मिट्टी को आकार देते हेमंत कहते हैं कि उनकी चौथी पीढ़ी अब इस काम को आगे बढ़ाने में रुचि नहीं रखती. युवा निजी क्षेत्र में अपना भविष्य तलाश रहे हैं. उन्हें डर है कि आने वाले समय में मिट्टी के दीये बनाने की यह परंपरा उनके परिवार तक ही सिमटकर रह जाएगी.
मिट्टी महंगी, मेहनत ज्यादा और मुनाफा कम
कुम्हार परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती कच्चे माल की बढ़ती कीमत है. पहले जहां आसानी से मिट्टी उपलब्ध हो जाती थी, वहीं अब इसके लिए अधिक पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं. मिट्टी के अलावा कोयला और लकड़ी भी महंगे हो गए हैं. दीये बनाने, सुखाने और पकाने में काफी समय और मेहनत लगती है. इसके बावजूद बाजार में उन्हें अपनी मेहनत के अनुरूप कीमत नहीं मिल पाती. संजय कुमार बताते हैं कि इस बार मिट्टी की कीमत करीब तीन गुना तक बढ़ गई है. ऐसे में बारिश और बादल उनकी परेशानी और बढ़ा रहे हैं.
बारिश ने बढ़ाई दीपावली की तैयारी में मुश्किल
दीपावली नजदीक आने के साथ कुम्हार परिवार दिन-रात दीये और खिलौने बनाने में जुटे हैं. लेकिन लगातार बारिश और बादल छाए रहने से कच्चे दीयों को सुखाना मुश्किल हो रहा है. धूप नहीं निकलने पर दीये ठीक से सूख नहीं पाते और उन्हें पकाने की प्रक्रिया भी प्रभावित होती है. इससे तैयार सामान खराब होने और आर्थिक नुकसान का खतरा बना हुआ है.
महिलाओं के हाथों से सजती है मिट्टी की विरासत
कुम्हार परिवार की महिलाएं भी इस परंपरा को बचाने में अहम भूमिका निभा रही हैं. बचपन से अपनी मां और बाद में सास को मिट्टी के दीये और खिलौनों पर रंग भरते देखने वाली महिलाएं आज खुद इस काम को कर रही हैं. पर्मिला देवी बताती हैं कि वे दिन-रात मेहनत कर दीयों और खिलौनों को खूबसूरत बनाती हैं, ताकि दीपावली पर लोगों के घरों तक पहुंच सकें. हालांकि, उन्हें भी चिंता है कि आने वाली पीढ़ी इस मेहनत वाले काम को अपनाना नहीं चाहती.
चौथी पीढ़ी क्यों नहीं संभालना चाहती विरासत?
कुम्हार परिवारों के युवा अपनी परंपरा और संस्कृति को बचाना तो चाहते हैं, लेकिन बदलते समय में इस पेशे की चुनौतियां उनके सामने हैं. पढ़ाई, रोजगार और निजी क्षेत्र में बेहतर भविष्य की उम्मीद उन्हें पुश्तैनी काम से दूर कर रही है. सोनी प्रजापति बताती हैं कि उनके परिवार में भी इस साल मिट्टी के बर्तन बनाने का काम आखिरी बार हो सकता है. उनका कहना है कि मिट्टी उपलब्ध कराने, बर्तन पकाने के लिए जगह और दूसरी जरूरी सुविधाओं की कमी है. इतनी मेहनत और समय देने के बाद भी युवा इस पेशे को अपना भविष्य नहीं मान पा रहे हैं.
क्या कुम्हारी कला इतिहास बन जाएगी?
बता दें कि जमशेदपुर में करीब 70 से 80 कुम्हार परिवार मिट्टी के दीये, खिलौने और दूसरे बर्तन बनाकर अपनी आजीविका चलाते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी दीपावली पर मिट्टी के दीये जलाने और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने की अपील करते रहे हैं. लेकिन जमीनी स्तर पर कुम्हार परिवारों को मिट्टी, ईंधन, निर्माण और बाजार से जुड़ी सुविधाओं की जरूरत है. हेमंत कुमार के रेडियो की धुन पर घूमता चाक आज भी मिट्टी को खूबसूरत आकार दे रहा है, लेकिन सवाल है कि क्या आने वाली पीढ़ी इस चाक को इसी तरह घुमाती रहेगी या कुम्हारी कला केवल यादों और इतिहास का हिस्सा बनकर रह जाएगी.