‘ईरान को न्यूक्लियर हासिल नहीं करने देंगे’, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप मिडटर्म हारने के बाद भी इसी जिद पर अड़े हैं. अब ईरान भी डट गया और एक बार फिर दोनों देशों के बीच भयानक जंग के हालात बन रहे हैं. हालांकि, इस बार अमेरिका आर या पार के मूड में है, इसी वजह से डिफेंस एक्सपर्ट्स को डर है कि ट्रंप ईरान पर न्यूक्लियर बम फोड़ सकते हैं. अगर वाशिंगटन बौखलाहट में इसफाहान के ‘पिकैक्स माउंटेन’ जैसे ठोस ग्रेनाइट चट्टानों के नीचे बने ईरान के परमाणु बंकरों पर परमाणु बम गिराता है, तो इसकी आंच भारत तक पहुंचेगी.
पश्चिम की हवाएं और भारत के ये 4 राज्य: कैसे पहुंचेगा खतरा?
पृथ्वी के वायुमंडल में मिड लैटिट्यूड पर 10 से 12 किलोमीटर की ऊंचाई पर तेजी से बहने वाली हवाएं चलती हैं, जिन्हें हम वैज्ञानिक भाषा में सब्ट्रॉपिकल वेस्टरली जेट स्ट्रीम कहते हैं. ये हवाएं हमेशा पश्चिम से पूर्व दिशा की ओर बहती हैं.
अगर मध्य ईरान के परमाणु संयंत्रों या सैन्य ठिकानों पर कोई न्यूक्लियर धमाका होता है, तो हवा में उठने वाला रेडियोएक्टिव गुबार इन्हीं पश्चिमी हवाओं के सहारे पूर्व की ओर आगे बढ़ेगा. ये गुबार ईरान की सीमाओं को लांघकर अफगानिस्तान और पाकिस्तान को पार करता हुआ सीधा भारत की उत्तर-पश्चिमी और पश्चिमी बॉर्डर में एंटर करेगा.
इस पैटर्न के कारण भारत के मुख्य रूप से 4 राज्य रेडिएशन और रेडियोएक्टिव धूल के प्रभावित एरिया में आ सकते हैं.
- गुजरात: पाकिस्तान के सिंध प्रांत से जुड़ी लंबी जमीनी सीमा और अरब सागर से उठने वाली समुद्री हवाओं के चलते गुजरात इस वायुमंडलीय बदलाव के सीधे रास्ते में पड़ता है.
- राजस्थान: थार रेगिस्तान के रास्ते पाकिस्तान से सीधी सीमा साझा करने के कारण पश्चिमी हवाओं के साथ बहकर आने वाले बारीक रेडियोएक्टिव कणों का पहला सामना राजस्थान के सीमावर्ती इलाकों, जैसे बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर को करना पड़ सकता है.
- पंजाब: पाकिस्तान के पंजाब प्रांत से सटा होने और सर्दियों के मौसम में ‘वोस्टर्न डिस्टर्बेंस’ के मुख्य रास्ते में होने की वजह से पंजाब के ऊपर वायुमंडलीय धुंध और महीन धूल जमा होने का जोखिम काफी ज्यादा रहेगा.
- जम्मू-कश्मीर: उत्तर-पश्चिमी सीमाई इलाका होने और अत्यधिक ऊंचाई पर बहने वाली जेट स्ट्रीम हवाओं के सीधे संपर्क में होने के कारण ये केंद्र शासित प्रदेश भी इस संभावित खतरे की जद में आता है.
- इसके अलावा पंजाब और राजस्थान से बिल्कुल सटे होने के कारण हरियाणा भी इसके प्रभाव से अछूता नहीं रहेगा.
वैज्ञानिक सच: क्या भारत में फैलेगी ‘रेडिएशन सिकनेस’?
ये खबर सुनकर डर लगना स्वाभाविक है, लेकिन परमाणु वैज्ञानिकों और मौसम विज्ञानियों का डेटा कुछ राहत देने वाला सच भी बयां करता है.
- 2,500 किलोमीटर की भौगोलिक ढाल: सेंट्रल ईरान और भारत के पश्चिमी राज्यों के बीच लगभग 2,000 से 2,500 किलोमीटर की विशाल दूरी है. ये दूरी भारत के लिए एक प्राकृतिक ढाल का काम करती है.
- कणों का नीचे गिरना: न्यूक्लियर धमाके से निकलने वाले बड़े और भारी रेडियोएक्टिव कण इतनी लंबी दूरी तय नहीं कर सकते. वो भारत पहुंचने से बहुत पहले ही ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान की जमीन पर गिर जाएंगे.
- हवा में बिखराव: हजारों किलोमीटर का सफर तय करते-करते हवा में रेडियोएक्टिव कण इतने ज्यादा फैल जाएंगे कि भारत की धरती तक पहुंचते-पहुंचते उनका स्तर बेहद मामूली रह जाएगा. यानी भारत में सीधे तौर पर घातक ‘रेडिएशन सिकनेस’ होने का खतरा लगभग ना के बराबर रहेगा.
असली महासंकट: अरब सागर का जहरीला पानी और तटीय सुरक्षा
हवा का खतरा भले ही दूरी की वजह से कम हो जाए, लेकिन जल-सुरक्षा का संकट भयानक रूप ले सकता है. यदि फारस की खाड़ी या अरब सागर के आसपास रेडियोएक्टिव कण गिरते हैं, तो फारस की खाड़ी के आसपास बने विशाल डिसेलिनेशन प्लांट यानी समुद्री पानी को पीने योग्य बनाने वाले कारखाने पूरी तरह जहरीले हो जाएंगे.
इसके अलावा, रेडियोएक्टिव कचरा बहकर अरब सागर के पानी में मिलेगा. गुजरात और महाराष्ट्र जैसे तटीय राज्यों के लिए समुद्री खाद्य चक्र, मछुआरों की आजीविका और तटीय पर्यावरण पर इसका लंबे समय तक बहुत बुरा असर पड़ेगा.
भारत की अर्थव्यवस्था पर ‘परमाणु स्ट्राइक’
हवा और पानी के खतरे के अलावा, ईरान पर न्यूक्लियर अटैक का सबसे बड़ा झटका भारत की अर्थव्यवस्था और आम नागरिक की जेब पर लगेगा.
- कच्चा तेल और रिकॉर्ड तोड़ महंगाई: भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें से बड़ा हिस्सा ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ के संकरे समुद्री रास्ते से गुजरता है. युद्ध या न्यूक्लियर अटैक की स्थिति में ये रास्ता किसी काम का नहीं रह जाएगा. अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें $150 से $200 प्रति बैरल के पार चली जाएंगी, जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छूने लगेंगे और देश में भीषण महंगाई आ जाएगी.
- 80 लाख भारतीयों की जान का जोखिम: खाड़ी देशों में लगभग 80 लाख से ज्यादा भारतीय नागरिक रहते हैं और काम करते हैं. युद्ध और परमाणु विकिरण के खतरे के बीच इतने बड़े पैमाने पर अपने नागरिकों को रेस्क्यू करना भारत सरकार के लिए अब तक की सबसे बड़ी लॉजिस्टिक और वित्तीय चुनौती बन जाएगा. साथ ही, खाड़ी देशों से भारत आने वाला अरबों डॉलर का रेमिटेंस भी रुक जाएगा.
- चाबहार पोर्ट का सपना ठप: भारत ने मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक सीधे व्यापार के लिए ईरान के रणनीतिक ‘चाबहार बंदरगाह’ में अरबों रुपये का निवोश किया है. ईरान पर बड़ा हमला होते ही ये पूरा प्रोजेक्ट और भारत की कनेक्टिविटी महत्वाकांक्षाएं हमेशा के लिए ठंडे बस्ते में चली जाएंगी.
- रूसी-रुपया और विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव: तेल की कीमतें बढ़ने से भारत का चालू खाता घाटा बेकाबू हो जाएगा और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया अपने सबसे निचले स्तर पर गिर जाएगा.
कूटनीति के मुश्किल मोड़ पर भारत
वाशिंगटन में मिडटर्म चुनावों की बौखलाहट और पेंटागन की आक्रामक युद्ध रणनीतियों ने पश्चिम एशिया के साथ-साथ पूरे दक्षिण एशिया को एक बेहद सेंसेटिव और खतरनाक मोड़ पर ला खड़ा किया है.
वैज्ञानिक नजरिए से भारत के पश्चिमी राज्यों यानी गुजरात, राजस्थान, पंजाब, जम्मू-कश्मीर को हवा के सीधे रेडियोएक्टिव हमले से 2500 किमी की दूरी थोड़ा बचा जरूर लेगी, लेकिन आर्थिक तबाही, समुद्री प्रदूषण, और 80 लाख भारतीयों की सुरक्षा का संकट भारत के सामने एक पहाड़ जैसा रूप ले लेगा.