गुजरात के सोमनाथ मंदिर के आसपास नॉनवेज खाने की बिक्री और परोसने पर लगी रोक हटाने की मांग लेकर पहुंचे रेस्टोरेंट मालिकों को सुप्रीम कोर्ट से फिलहाल राहत नहीं मिली है. शीर्ष अदालत ने गुजरात हाईकोर्ट के उस अंतरिम आदेश में दखल देने से इनकार कर दिया, जिसके जरिए मंदिर के आसपास मांसाहारी भोजन बनाने, बेचने और स्टोर करने पर प्रतिबंध फिर से लागू हो गया था. हालांकि, कोर्ट ने गुजरात हाईकोर्ट से मामले का जल्द निपटारा करने को कहा है.
इस सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक दिलचस्प टिप्पणी भी की. रेस्टोरेंट मालिकों की ओर से दलील दी गई कि देश की करीब 80 फीसदी आबादी मांसाहारी है और इस तरह की पाबंदी से उनका कारोबार पूरी तरह प्रभावित होगा. इस पर जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने कहा कि ऐसे मामलों में संतुलन बनाए रखना जरूरी है. अदालत ने हल्के-फुल्के अंदाज में यह भी कहा, ‘रोशनी का त्योहार दिवाली मिठाई खाकर मनाइए, वेज या नॉनवेज को फिलहाल छोड़ दीजिए.’
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर प्रतिबंध हटाने से इनकार करते हुए कहा कि मामला अभी अंतरिम चरण में है और हाईकोर्ट को ही इस पर अंतिम फैसला करना चाहिए. बेंच ने कहा, ‘हमें संतुलन बनाए रखना होगा. हम अभी कुछ नहीं कह रहे हैं.’ अदालत ने हाईकोर्ट से अपील पर जल्द सुनवाई करने का अनुरोध किया.
‘कारोबार खत्म हो जाएगा’
रेस्टोरेंट मालिकों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील हुजेफा अहमदी ने अदालत में दलील दी कि खानपान व्यक्ति की पसंद का विषय है और राज्य किसी पर अपनी पसंद का भोजन थोप नहीं सकता. उन्होंने कहा कि देश की लगभग 80 फीसदी आबादी मांसाहारी है. ऐसे में सरकार इस तरह के आदेश देकर जरूरत से ज्यादा संवेदनशीलता क्यों दिखा रही है?
अहमदी ने कहा कि स्थायी प्रतिबंध लगाना असामान्य है और संविधान की भावना सहिष्णुता की शिक्षा देती है. उन्होंने यह भी कहा कि इस तरह की पाबंदी से कारोबार पूरी तरह खत्म हो सकता है. उनके मुताबिक, संबंधित रेस्टोरेंट पिछले करीब 40 वर्षों से इस इलाके में कारोबार कर रहे हैं.
वकील ने हाईकोर्ट की कार्यवाही पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि एकल जज की पीठ ने 30 अक्टूबर को रेस्टोरेंट मालिकों के पक्ष में आदेश दिया था, लेकिन उसी दिन कुछ ही घंटों में हाईकोर्ट की खंडपीठ ने उस पर रोक लगा दी. अहमदी ने सवाल किया कि इस मामले में इतनी जल्दबाजी की क्या जरूरत थी?
गुजरात सरकार ने धार्मिक भावनाओं का दिया हवाला
गुजरात सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रेस्टोरेंट मालिकों की याचिका का विरोध किया. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई 25 नवंबर को होनी है.
मेहता ने कहा कि मंदिर के आसपास के 500 मीटर के दायरे में प्रतिबंध पहले से लागू था. बाद में सरकार ने कॉरिडोर विकसित किया. उन्होंने यह भी बताया कि संबंधित इलाकों में रेस्टोरेंट मालिकों को शाकाहारी भोजन परोसने की अनुमति है.
राज्य सरकार का तर्क है कि त्योहारों और धार्मिक आयोजनों के दौरान मंदिर के आसपास मांस, मछली और अन्य मांसाहारी व्यंजन बनाने या बेचने से श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती हैं. इससे मंदिर आने वाले लोगों को असुविधा और आसपास के क्षेत्र में परेशानी भी हो सकती है.
10 अगस्त के आदेश से शुरू हुआ विवाद
यह पूरा मामला गुजरात के जिला मजिस्ट्रेट की ओर से 10 अगस्त को जारी अधिसूचना से जुड़ा है. इसके तहत कुछ निर्धारित इलाकों में दुकानों, रेस्टोरेंट, होटलों और सड़क किनारे लगने वाले स्टॉल पर मांसाहारी भोजन तैयार करने, बेचने और स्टोर करने पर रोक लगाई गई थी. प्रतिबंध के दायरे में सात निर्धारित सड़कें और इलाके शामिल थे. इनमें सोमनाथ मंदिर के 500 मीटर के भीतर का पूरा क्षेत्र भी शामिल था.
इस आदेश को इलाके में कारोबार करने वाले रेस्टोरेंट मालिकों ने गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी. 30 अक्टूबर को हाईकोर्ट की एकल पीठ ने उनकी याचिका स्वीकार करते हुए प्रतिबंध हटाने का आदेश दिया. इसके बाद राज्य सरकार ने उसी दिन इस फैसले के खिलाफ अपील दाखिल कर दी.
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कुछ ही घंटों के भीतर एकल पीठ के आदेश पर रोक लगा दी. इसके साथ ही मंदिर के आसपास नॉनवेज भोजन तैयार करने, बेचने और स्टोर करने पर लगी पाबंदी फिर से प्रभावी हो गई. इसी आदेश को चुनौती देते हुए रेस्टोरेंट मालिक सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे.
अनुच्छेद 25 पर आने वाले फैसले का भी जिक्र
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 25 से जुड़े एक अन्य मामले का भी उल्लेख किया. पीठ ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक सवालों पर संविधान पीठ का फैसला जल्द आने की उम्मीद है और उसका इस मामले पर भी महत्वपूर्ण असर हो सकता है.
अदालत ने अंत में रेस्टोरेंट मालिकों की याचिका पर प्रतिबंध हटाने का आदेश देने से इनकार कर दिया. हालांकि, गुजरात हाईकोर्ट से अपील का जल्द निपटारा करने का अनुरोध किया और दो महीने के भीतर फैसला देने को कहा.
फिलहाल 10 अगस्त की अधिसूचना की वैधता पर गुजरात हाईकोर्ट की खंडपीठ का अंतिम फैसला आना बाकी है. मामले की अगली सुनवाई अब 25 नवंबर को होगी.