सौ बात की एक बात ये कि ट्रंप तो हारे ही हारे साथ में नेतनयाहू की PM की गद्दी भी अब चली ही गई समझो. और उनको बाहर कर दिया इज़रायल के अरब नागरिकों ने. तो ये समझने वाली बात है कि इज़रायल में अरब नागिरक कौन लोग हैं जो वोट भी कर सकते हैं वहां पर? इज़रायल तो यहूदियों का देश है, तो ये 20% अरब कौन हैं? ग़ाज़ा और वेस्ट बैंक वाले हैं क्या ये लोग? नहीं, ये वो नहीं हैं. वो तो इज़रायल के चुनाव में वोट ही नहीं कर सकते. तो फिर ये कौन लोग हैं ये पूरा समझने की ज़रूरत है. इतना अब तो यहां की पब्लिक को भी पता चल गया कि इज़रायल की संसद में 120 सीटें हैं और वहां मोटे तौर पर तीन धड़े लड़ रहे थे चुनाव. एक था नेतन्याहू का गठबंधन, वो है यहूदी पार्टियों का. दूसरा था गादी आज़ेनकोट वाला गठबंधन, वो भी है यहूदी पार्टियों का. और तीसरा धड़ा था अरब पार्टियों का. 61 सीटें चाहिए थीं सरकार बनाने के लिए. वो तीनों में किसी की नहीं आईं. यहूदी पार्टियों में नेतन्याहू की साइड को मिलीं 53 सीटें, गादी आज़ेनकोट वाली साइड को मिलीं 48 सीटें, और बाक़ी 19 सीटें मिलीं अरब पार्टियों को. 61 किसी को नहीं मिलीं.
तो या तो दोनों यहूदी धड़े मिल कर यहूदी एकता की सरकार बनाते. या गादी आइज़ेनकोट वाली साइड अरब पार्टियों का समर्थन लेती तब सरकार बनती. चक्कर क्या था कि हमास के जो तीन साल पहले हमले हुए थे उसके बाद से यहूदी पार्टियां अरब पार्टियों का समर्थन लेते हुए दिखना नहीं चाह रही थीं. लेकिन जब ट्रंप की पार्टी अमेरिका में हार गई तो यहूदी पार्टियों को भी साफ़ संकेत मिल गया कि ट्रंप की विरोधी डेमोक्रैटिक पार्टी इज़रायल का भले ही समर्थन करती रहे, नेतन्याहू का नहीं करेगा. ट्रंप की पार्टी के लोग भी कहने लग गए थे कि नेतन्याहू ने ही ट्रंप को ईरान युद्ध में घसीट लिया और वो इसी वजह से हार गए. और अमेरिका के समर्थन के बिना तो इज़रायल चल नहीं सकता. तो यहूदी पार्टियां समझ गईं कि नेतन्याहू को तो प्रधानमंत्री नहीं बना सकते. उधर अरब पार्टियां भी समझ गईं कि नेतन्याहू को बाहर करने का यही मौक़ा है तो उन्होंने गादी आइज़ेनकोट का समर्थन करने का मन बना लिया. तो आइज़ेनकोट की साइड के 48 और अरब पार्टियों के 19 के समर्थन से 120 टोटल सांसदों में अब 67 ऐसे दिख रहे हैं, जो आइज़नेकोट को प्रधानमंत्री बनवा देंगे.
यानी नेतन्याहू का पत्ता साफ़ होता दिख रहा है. लेकिन यहां की पब्लिक को अभी भी ये क्लियर नहीं है कि ये इज़रायल के अंदर अरब वोटर कौन से हैं, जिन्होंने अरब पार्टियों को 19 सीटें दिला दीं जिसकी वजह से नेतन्याहू का पत्ता साफ़ होता दिख रहा है. वो समझने के लिए इज़रायल कैसे बना वो समझना पड़ेगा. पिछले तीन साल से जो वहां हो रहा है उसके बाद तो यहां की पब्लिक भी इज़रायल का नक़्शा तो इतनी बार देख देख के काफ़ी कुछ समझ गई है कि मेडिटरेनियन सी यानी भूमध्य सागर के किनारे इज़रायल है. उसके उत्तर में लेबनान है. उसके पूर्व में ऊपर सिरिया है और उसके साथ जॉर्डन है. और इज़रायल के दक्षिण में ईजिप्ट है, मिस्र है. और इज़रायल के अंदर दो इलाक़े हैं वेस्ट बैंक और ग़ाज़ा पट्टी. ये इज़रायल के अंदर हैं लेकिन इज़रायल में नहीं हैं.
इज़रायल की अरब पार्टियों को फिर कौन वोट देता है?
मतलब इज़रायल से घिरे हुए हैं लेकिन इज़रायल में नहीं माने जाते. यहां जो अरब रहते हैं उन्होंने वोट नहीं किया इन चुनावों में. यहां तो पैलेस्टिनियन अथॉरिटी का शासन है. मतलब क़ब्ज़ा तो इज़रायल का है लेकिन शासन पैलेस्टिनियन अथॉरिटी का है. फ़िलीस्तीन अथॉरिटी. इसके चुनाव में 2006 में हमास जीत गया था. तो वेस्ट बैंक और ग़ाज़ा के अरब जो हैं वो वहां वोट देते हैं. तो इज़रायल की अरब पार्टियों को फिर कौन वोट देता है? वो हैं इज़रायल के अरब.
बेंजामिन नेतन्याहू की कुर्सी पर खतरा मंडरा रहा है. (रॉयटर्स)
इजरायल के बनने की कहानी
तो क्या है कि इज़रायल कैसे बना ये समझिये. ये वो इलाक़ा है जहां से यहूदी धर्म शुरू हुआ. जीज़स क्राइस्ट भी बाद में आए और इस्लाम भी बाद में आया. पहले यहां यहूदी धर्म आया. ये सब बहुत सदियों पहले की बात हो रही है. फिर यहां रोम साम्राज्य का क़ब्ज़ा हो गया था और यहूदियों पर यहां ज़ुल्म हुए और उनको भगा दिया गया था और वो युरोप के दूसरे इलाक़ो में जा कर बस गए. लेकिन इज़रायल हमेशा उनकी गाथाओं में रहा कि यहूदियों की अपनी भूमि वही हैं. फिर पूरे अरब पर तुर्की के ऑटोमन तुर्क साम्राज्य का शासन हो गया. तो इस इलाक़े पर भी उनका शासन था. ये इलाक़ा फ़िलीस्तीन कहा जाने लगा था. और बंजर रेगिस्तान ही था. ऑटोमन तुर्कों का भी इस इलाक़े पर कोई बहुत ज़्यादा ध्यान नहीं रहता था. कई अरब क़बीले होते थे यहां रेगिस्तान में. फिर पहली वर्ल्ड वॉर में तुर्क हार गए. और ये फ़िलीस्तीन का इलाक़ा आ गया ब्रिटेन के राज्य में. तो 1917 में ब्रिटेन ने बोला कि इस बंजर इलाक़े में दुनिया भर के यहूदियों को बसने के लिए ज़मीन दी जाएगी जो भी आना चाहे. क्योंकि कई जगहों पर यहूदियों को प्रताड़ित किया जाने लगा था. उनको भगाया जा रहा था. तो यहूदी आ कर बसना शुरु हुए ब्रिटेन के शासन में. फिर तो हिटलर ने जर्मनी में यहूदियों पर ज़ुल्म ढाने शुरू कर दिये. और पूरे यूरोप से यहूदी भगाए जाने लगे. औऱ कई भाग कर फ़िलीस्तीन के इस बंजर रेगिस्तान में आ कर बसने लगे. फिर दूसरी वर्ल्ड वॉर हुई और हिटलर की हार हुई. लेकिन यहां इस इलाक़े में यहूदियों और यहां के अरबों में तनाव शुरू हो गया था. ब्रिटेन ने वही किया जो भारत में उसने किया. यहां भारत पाकिस्तान बना कर चला गया. वहां पर ब्रिटेन ने बोला कि हम तो जा रहे हैं शासन छोड़कर. यहां दो मुल्क बना दिये जाएं फ़िलीस्तीन में, एक यहूदियों का और एक अरबों का.
इजरायल में करीब 20 लाख अरब वोटर्स हैं. (फोटो- एपी)
यहूदी और अरब की कहानी, कौन हैं ये अरब पार्टी वाले
- UN में यानी संयुक्त राज्य में भी ये प्रस्ताव रखा गया कि दो देश बना दो. यहूदी तो राज़ी थे, लेकिन अरब नहीं माने. उनका कहना था कि यहूदी तो यहां बसाए गए हैं, ये तो अरब देश है. लेकिन 14 मई 1948 को यहूदी नेताओं ने इजरायल को एक स्वतंत्र देश घोषित कर दिया.
- ग़ाज़ा और वेस्ट बैंक वाला इलाक़ा अरब इलाक़ा था, वो उन्होंने छोड़ दिया और बाक़ी को इज़रायल घोषित कर दिया अगले ही दिन मिस्र, जॉर्डन, सीरिया, लेबनान और इराक की सेनाएं हमला करने आ गईं इज़रायल पर. यानी इज़रायल बनते ही उसपर अटैक कर दिया अरब देशों ने. लेकिन इस 1948 के युद्ध में इजरायल जीत गया.
- अरब माने नहीं थे दो देश बनाने के लिए. यहूदी मान गए थे. लेकिन यहूदियों ने इज़रायल बना दिया और उसपर हमला हो गया तो इज़रायल जब जीत गया युद्ध में तो सात लाख अरब लोगों को अपने घर छोड़कर भागना पड़ा वहां से.
- लेकिन उसके बाद भी जो अरब लोग इजरायल की नई सीमाओं के अंदर रह गए, उनकी संख्या करीब डेढ़ लाख थी. इजरायल ने उन्हें नागरिकता दे दी. इस तरह वो इजरायल के नागरिक बन गए और 1949 से ही वोट डालने लगे.
कितनी है इजरायल में इनकी संख्या
आज उनकी संख्या बढ़कर लगभग बीस लाख हो गई है. वो इजरायल के अंदर के नागरिक हैं, इसलिए चुनाव में वोट डालते हैं. वेस्ट बैंक और गाजा को इज़रायल ने छोड़ दिया था क्योंकि वहां पर अरब देश बनना था जिसपर अरब माने नहीं थे. 1948 के युद्ध में वेस्ट बैंक पर जॉर्डन ने क़ब्ज़ा कर लिया था और ग़ाज़ा पर मिस्र ने क़ब्ज़ा कर लिया था. लेकिन फिर 1967 में युद्ध हुआ और फिर इज़रायल जीत गया. तो 1967 इजरायल ने जॉर्डन से वेस्ट बैंक छीन लिया और मिस्र से गाजा पट्टी छीन ली. लेकिन वहां रहने वाले अरब लोगों को इजरायल ने अपना नागरिक नहीं बनाया. वहां आंदोलन जलता रहा और 1994 में वहां पर एक पैलेस्टिनियन अथॉरिटी बनाने पर राज़ी हो गया. कि वो लोकल शासन कर लेगी. और क़ब्ज़ा हालांकि इज़रायल का ही है. उम्मीद ये थी कि ये पैलेस्टिनियन अथॉरिटी आगे चल कर एक फ़िलीस्तीन देश बन जाएगी और जो 1948 में बात हुई थी UN और अरब नहीं माने थे आख़िर वही होगा. मतलब एक यहूदियों का इज़रायल और ये वेस्ट बैंक और ग़ाज़ा में अरब लोगों का देश हो जाएगा फ़िलीस्तीन. लेकिन वो बात उस दिशा में जाने के बजाए और बिगड़ गई. और हमास ने चुनाव जीत लिये वहां 2006 में. और तबसे ये तनाव बना हुआ है.
हमास और इजरायल की दुश्मनी
हमास कहता है कि पूरा इज़रायल ही फ़िलीस्तीन बना देंगे और इज़रायल की यहूदी पार्टियां हमास को ही ख़त्म करने की बात कहती हैं. लेकिन हमास के 2023 के हमलों के बाद क्या हुआ कि इज़रायल के अंदर जो अरब रहते हैं जिनको इज़रायल शुरू से अपना नागरिक मानता रहा है उनको भी नेतन्याहू सरकार में बहुत कुछ झेलना पड़ा. इससे पहले तक वो लोग कोई बहुत ज़ोर-शोर से इज़रायल के चुनावों में वोट नहीं डालते थे. यहूदी ही ज़्यादा डालते थे. जो अरब इज़रायल के नागरिक हैं वो तो रेगिस्तान वगैरह में ज़्यादा रहते हैं और अब भी क़बीलों वाला ही रहन-सहन है उनका. उनकी महिलाएं तो वोट देने जाती ही नहीं थीं. लेकिन इस बार इजरायल के अरब नागरिकों ने भारी संख्या में वोट डाला. पहले 40% लोग भी वोट नहीं डालने आते थे अरब समुदाय के इज़रायल के चुनाव में. इस बार करीब 80% लोग वोट डालने गए. नेतन्याहू की नीतियों के ख़िलाफ़. और नतीजा ये हुआ कि अरब पार्टियों को 19 सीटें मिल गईं और उन्होंने ही रोका नेतन्याहू को फिर से PM बनने से. वो अरब जो शुरू से इज़रायल के अंदर ही रह रहे हैं उन्होंने इस बार अपनी ताक़त दिखा दी. सौ बात की एक बात.