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अंकल ने बहनों के साथ रहने से मना किया विश्व थैलेसीमिया दिवस की पूर्व संध्या पर ऑड्रे हाउस में राज्यस्तरीय थैलेसीमिया कॉन्फ्रेंस भावुक अनुभवों और जागरूकता संदेशों का मंच बन गया। लहू बोलेगा रक्तदान संगठन रांची व झारखंड थैलेसीमिया पीड़ित एसोसिएशन के कार्यक्रम में थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों और उनके अभिभावकों ने समाज में भेदभाव, तानों और संघर्ष की कहानियां साझा कीं। निशा की मां रंजना देवी कहती हैं कि बेटी डेढ़ साल की थी जब पता चला कि वह थैलेसीमिया पीड़ित है, खून आसानी से नहीं मिलता था। रिश्तेदारों को फोन करने पर वह फोन नहीं उठाते थे। काफी दिक्कत होती थी। ऐसी ही कहानी सानिया परवीन की भी है। कार्यक्रम में अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री हफीजुल हसन भी शामिल हुए।
पढ़ाई छूट गई थी, फिर खुद को मजबूत बनाया 3 साल की थी जब पता चला कि मुझे थैलेसीमिया है। शुरुआत में शरीर फूल जाता था। बड़े होने पर एक बार तबियत इतनी खराब हो गई कि आईसीयू में एडमिट होना पड़ा। पढ़ाई छूट गई। फिर मैंने दोबारा पढ़ाई शुरू की। पढ़ाई को ही अपनी ताकत बनाया। अब तानों से कोई फर्क नहीं पड़ता। नई दवा से पीड़ित बच्चों को राहत, कई को नियमित रक्त चढ़ाने की जरूरत नहीं थैलेसीमिया व सिकल सेल एनीमिया से पीड़ित बच्चों के इलाज में नई दवा के आने से राहत मिली है। करीब 70% बच्चे पहले की तुलना में बेहतर हैं। कई मरीजों में ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत काफी कम हो गई है। कुछ बच्चों को अब नियमित रक्त चढ़ाने की जरूरत भी नहीं पड़ रही है। सदर अस्पताल रांची में इन मरीजों के लिए 40 बेड उपलब्ध हैं, जहां सरकार की ओर से निःशुल्क इलाज किया जा रहा है। यहां प्रतिदिन 15 बच्चों को खून चढ़ाया जाता है। लगातार ट्रांसफ्यूजन से शरीर में आयरन बढ़ने पर डेफेरासिरॉक्स, डेफेरिप्रोन और डेफेरॉक्सामाइन जैसी आयरन चेलेटिंग दवाएं दी जाती हैं। निशा कुमारी ने बताया कि जब मैं छोटी थी तब मेरे अंकल ने मेरी बहनों को मेरे साथ रहने से मना कर दिया था। आज सभी बहनें बड़ी हो गई है, पढ़ी-लिखी है बावजूद मेरे साथ नहीं रहती है। उनका मनाना है कि मेरे साथ रहने से उन्हें भी थैलेसीमिया जैसी बीमारी हो जाएगी। बीमारी के कारण पढ़ाई भी छूटी, पर माता-पिता ने हमेशा सहयोग किया। राजधानी रांची में थैलेसीमिया के करीब 1200 से 1500 मरीज थैलेसीमिया केवल एक बीमारी नहीं, बल्कि एक आजीवन चलने वाली चुनौती है। रांची में थैलेसीमिया पीड़ितों की संख्या करीब 1200 से 1500 के बीच है। जबकि पूरे झारखंड में ऐसे मरीजों का आंकड़ा करीब 10 हजार तक है। इस बीमारी से जूझ रहे मरीजों को हर महीने नियमित रूप से खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है, लेकिन कई बार समय पर ब्लड नहीं मिलने से परेशानी और बढ़ जाती है। कई बार परिवार और समाज भी उन्हें तिरस्कृत करता है। राज्य में ब्लड की भारी कमी, सीमित डोनर नेटवर्क और सुरक्षित रक्त जांच की कमजोर व्यवस्था ने इन परिवारों की परेशानी कई गुना बढ़ा दी है।- डॉ. अभिषेक रंजन, विशेषज्ञ, सदर अस्पताल रांची
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