भारतन्यूज़ – टॉप हेडर
News Menu Bar

हर 10-11 दिन में ब्लड ट्रांसफ्यूजन, दर्द, कमजोरी पर हिम्मत नहीं हारती...


Last Updated:

Jamshedpur News: जमशेदपुर की 25 वर्षीय नीतू महतो मेजर थैलेसीमिया से ग्रसित हैं. इस बीमारी में हर 10-11 दिन में उन्हें ब्लड चढ़वाना पड़ता है पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. आज वे खुद को मरीज नहीं बल्कि फाइटर मानती हैं और दूसरे मरीजों को जागरूक करने का काम पूरे हौसले के साथ कर रही हैं.

जमशेदपुर. कई लोग थैलेसीमिया को सिर्फ एक बीमारी समझते हैं, लेकिन जो लोग इससे रोज लड़ते हैं, उनके लिए यह जिंदगी का सबसे बड़ा संघर्ष होता है. हर 10 से 15 दिन में खून चढ़ाना, शरीर में कमजोरी, दर्द और मानसिक तनाव, यह सब एक थैलेसीमिया मरीज की जिंदगी का हिस्सा बन जाता है. लेकिन जमशेदपुर की 25 वर्षीय नीतू महतो ने इस संघर्ष के सामने हार मानने के बजाय लड़ना चुना और आज वह कई लोगों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं. जानते हैं नीतू की कहानी.

डेढ़ साल में ही नीतू के मां-बाप समझ गए थे कुछ गड़बड़ है
नीतू के पिता रंजीत महतो और मां भारती महतो ने अपनी बेटी को संभालने और आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. नीतू बताती हैं कि जब वह सिर्फ डेढ़ साल की थीं, तब उनके माता-पिता को एहसास हुआ कि कुछ ठीक नहीं है. जहां दूसरे बच्चे चलना-फिरना शुरू कर देते हैं, वहीं नीतू एक जगह बैठी रहती थीं. डॉक्टर को दिखाने पर पता चला कि उन्हें थैलेसीमिया है. पहली बार ब्लड चढ़ाने के अगले ही दिन वह चलने और खेलने लगीं.

डरकर नहीं जीना
शुरुआती दिनों में उन्हें बार-बार ब्लड चढ़ाना पड़ता था. आज भी हर 11 दिन में उनका ब्लड ट्रांसफ्यूजन होता है. नीतू बताती हैं कि कमजोरी, सिरदर्द, कुछ खाने का मन नहीं करना और शरीर में ऊर्जा की कमी हमेशा बनी रहती है. बचपन में जब उनके दोस्त खेलते और दौड़ते थे, तब वह कमजोरी के कारण एक किनारे बैठी रहती थीं. 13-14 साल की उम्र में उन्हें समझ आया कि उन्हें मेजर थैलेसीमिया है. उस समय उन्होंने तय किया कि अब डरकर नहीं, बल्कि हिम्मत के साथ जीना है.

दूसरे मरीजों की करती हैं मदद
इसके बाद नीतू ने इस बीमारी को समझना शुरू किया. उन्होंने रिसर्च की, डॉक्टरों से जानकारी ली और खुद को मानसिक रूप से मजबूत बनाया. इसी दौरान उन्हें अनुराग फाउंडेशन का सहयोग मिला, जहां से उन्हें सही जानकारी, इलाज और आर्थिक मदद भी मिली. बाद में वह पीपल फॉर चेंज से जुड़ गईं और आज 100 से अधिक सेमिनार कर चुकी हैं. वह थैलेसीमिया मरीजों को सही इलाज, दवा और डॉक्टरों की जानकारी देती हैं, ताकि कोई भी मरीज खुद को अकेला महसूस न करे.

लगातार संघर्ष से बदली तस्वीर
नीतू ने सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आवाज उठाई. लगातार संघर्ष और प्रयास के बाद थैलेसीमिया मरीजों को डिसेबिलिटी कैटेगरी में शामिल कराया गया. अब मरीजों को हर महीने आर्थिक सहायता, रेलवे में रियायत और परीक्षाओं में आरक्षण जैसी सुविधाएं मिल रही हैं. नीतू बताती हैं कि झारखंड में वह पहली लड़की हैं, जिन्होंने इस मुद्दे पर खुलकर लड़ाई शुरू की और आज हजारों मरीजों को इसका फायदा मिल रहा है.

मरीज नहीं फाइटर हैं नीतू
नीतू का सपना है कि वह आगे चलकर टीचर बनें और गांव-गांव तक लोगों को यह समझाएं कि थैलेसीमिया क्या है और इससे कैसे बचा जा सकता है. उनका मानना है कि अगर समय रहते जांच हो जाए और जागरूकता बढ़े, तो कई बच्चों को इस बीमारी से बचाया जा सकता है. नीतू आज सिर्फ थैलेसीमिया सर्वाइवर नहीं, बल्कि एक सच्ची ‘थैलेसीमिया फाइटर’ बन चुकी हैं, जो हर दिन दूसरों को जीने की नई उम्मीद दे रही हैं.

About the Author

Raina Shukla

बुंदेलखंड यूनिवर्सिटी से मास कम्यूनिकेशन एंड जर्नलिज़्म में मास्टर्स, गोल्ड मेडलिस्ट. पत्रकारिता का सफर दैनिक जागरण से शुरू हुआ, फिर प्रभात खबर और ABP न्यूज़ से होते हुए News18 Hindi तक पहुंचा. करियर और देश की …और पढ़ें



Source link

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top