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Fish Farming in Flood Areas Tips: बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में जहां खेती करना अक्सर घाटे का सौदा साबित होता है. वहां प्रगतिशील किसान रणधीर कुमार मुन्ना ने मछली पालन का ऐसा ‘हिट फॉर्मूला’ तैयार किया है जिसने सबको हैरान कर दिया है. 7 एकड़ जमीन पर 4 लाख की लागत लगाकर वे सालाना 12 लाख का कारोबार कर रहे हैं. बिना सरकारी मदद के, निजी संसाधनों से तैयार यह प्रबंधन आज क्षेत्र के बेरोजगार युवाओं के लिए आत्मनिर्भरता की नई राह दिखा रहा है.
सीतामढ़ी: जिले के प्रगतिशील किसान रणधीर कुमार मुन्ना ने परंपरागत खेती से हटकर नीली क्रांति (मछली पालन) को अपनाकर स्वरोजगार की एक शानदार मिसाल पेश की है. अपनी सात एकड़ की निजी जमीन पर इस किसान ने स्वयं के खर्च से सात तालाबों का निर्माण किया है. बिना किसी शुरुआती सरकारी सहायता के उन्होंने इस बंजर दिखने वाली जमीन को लाभ के सौदे में बदल दिया है. आज वे न केवल खुद स्वावलंबी बने हैं, बल्कि अपने इस फार्म के जरिए तीन अन्य स्थानीय मजदूरों को भी नियमित रोजगार उपलब्ध करा रहे हैं. पिछले पांच वर्षों से लगातार इस क्षेत्र में सक्रिय रहकर उन्होंने यह साबित कर दिया है कि यदि सही प्रबंधन और इच्छाशक्ति हो, तो ग्रामीण इलाकों में भी बड़े व्यवसाय खड़े किए जा सकते हैं.
तकनीकी प्रबंधन, स्पॉन से फिंगरलिंग तक का सफर
इस मछली फार्म की सफलता का मुख्य श्रेय किसान की बेहतर तकनीकी समझ और समय प्रबंधन को जाता है. किसान रणधीर कुमार मुन्ना ने अपने सात एकड़ के फार्म को नर्सरी तालाब और बड़े तालाबों में विभाजित किया है. सबसे पहले नर्सरी तालाब में मछली का बच्चा यानी स्पॉन डाला जाता है. जब ये बच्चे विकसित होकर फिंगरलिंग बन जाते हैं, तब उन्हें बड़े तालाबों में स्थानांतरित किया जाता है. सीतामढ़ी का यह इलाका बाढ़ प्रभावित है, इसलिए किसान ने एक विशेष रणनीति अपनाई है. वे अक्टूबर के महीने से तालाबों में मछली डालना शुरू करते हैं. महज चार महीनों के भीतर उत्पादन प्राप्त कर लेते हैं. यह सुनियोजित तरीका उन्हें जोखिम कम करने और बेहतर गुणवत्ता वाली मछली तैयार करने में मदद करता है.
बाढ़ की चुनौती और साल में दो बार बंपर उत्पादन
चूंकि यह क्षेत्र बाढ़ की चपेट में रहता है इसलिए जुलाई और अगस्त के दो महीनों में मछली पालन का काम रोकना पड़ता है. इसके बावजूद, किसान रणधीर कुमार मुन्ना के सटीक प्रबंधन का ही नतीजा है कि वे साल में दो बार मछलियों का उत्पादन ले पाने में सक्षम हैं. यदि क्षेत्र पूरी तरह बाढ़ से सुरक्षित होता, तो वे साल में तीन बार उत्पादन ले सकते थे. किसान का कहना है कि बाढ़ प्रभावित क्षेत्र होने की वजह से सावधानी अधिक बरतनी पड़ती है, लेकिन अक्टूबर से लेकर जून तक का समय उनके लिए स्वर्ण अवसर की तरह होता है. वे बाढ़ के पानी के उतरने का इंतजार करते हैं और फिर अपनी पूरी क्षमता के साथ मछली उत्पादन के चक्र को शुरू करते हैं. जिससे उत्पादन की निरंतरता बनी रहती है.
कम लागत में शानदार मुनाफा और भविष्य की उम्मीदें
आर्थिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह मॉडल बेहद प्रेरणादायक है. किसान रणधीर कुमार मुन्ना ने बताया कि सात एकड़ में मछली पालन के लिए उन्हें सालाना लगभग 4 लाख की लागत आती है. इस निवेश के बदले वे सालाना 10 से 12 लाख तक का कारोबार करते हैं. जिससे तमाम खर्चे काटकर उन्हें 6 से 7 लाख का शुद्ध मुनाफा होता है. वर्तमान में वे यह सारा कार्य अपने निजी संसाधनों से कर रहे हैं. हालांकि उन्हें भविष्य में सरकारी सहयोग और योजनाओं के लाभ की भी उम्मीद है. उनकी यह कहानी क्षेत्र के अन्य युवाओं के लिए एक मार्गदर्शक का काम कर रही है, जो सरकारी नौकरी के पीछे भागने के बजाय अपनी जमीन पर ही आधुनिक तकनीकों के सहारे आत्मनिर्भर बनने का सपना देख रहे हैं.
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