नई दिल्ली: मुस्लिम समाज में एकतरफा तलाक की प्रथाओं को लेकर एक बार फिर देश की सर्वोच्च अदालत में बड़ी कानूनी लड़ाई शुरू होने जा रही है. सुप्रीम कोर्ट कल यानी मंगलवार 19 मई से तलाक-ए-हसन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अहम सुनवाई करेगा. इस प्रथा से पीड़ित कई मुस्लिम महिलाओं ने अदालत का दरवाजा खटखटाकर इसे पूरी तरह असंवैधानिक और लैंगिक न्याय के खिलाफ घोषित करने की मांग की है.
क्या होता है तलाक-ए-हसन?
मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत तलाक-ए-हसन को तलाक का एक प्रामाणिक या न्यायसंगत तरीका माना गया है, लेकिन इसके दुरुपयोग और एकतरफा स्वरूप पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं. इस सिस्टम के तहत पति अपनी पत्नी को एक-एक महीने के अंतराल पर यानी कुल तीन महीने की अवधि में तीन बार तलाक बोलकर, लिखकर या डिजिटल माध्यम से संदेश भेजकर शादी को पूरी तरह खत्म कर सकता है.
इस प्रक्रिया में हर एक तलाक के बाद एक महीने का समय (इद्दत की अवधि) दिया जाता है ताकि यदि दोनों पक्षों में समझौता हो सके तो शादी बच जाए. इस दौरान अगर दोनों में शारीरिक संबंध बन जाते हैं या वे सुलह कर लेते हैं तो तलाक अपने आप रद्द हो जाता है. लेकिन अगर लगातार तीन महीनों तक हर महीने एक बार तलाक कहा जाता है और कोई सुलह नहीं होती तो तीसरे महीने के बाद निकाह पूरी तरह टूट जाता है. पीड़ित महिलाओं का तर्क है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह एकतरफा है और इसमें महिलाओं की सहमति या उनके अधिकारों का कोई सम्मान नहीं होता.
कौन-से मुस्लिम कानून पहले हो चुके हैं रद्द?
भारत में मुस्लिम समाज की महिलाओं के अधिकारों को सुरक्षित करने और सामाजिक बुराइयों को खत्म करने के लिए न्यायपालिका ने पहले भी कई ऐतिहासिक फैसले सुनाए हैं:
· तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत): साल 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने एक ही बार में तीन बार ‘तलाक, तलाक, तलाक’ बोलकर शादी खत्म करने की प्रथा (तलाक-ए-बिद्दत) को असंवैधानिक करार दिया था. इसके बाद सरकार ने 2019 में कानून बनाकर इसे एक दंडनीय अपराध घोषित कर दिया.
· शाह बानो मामला (1985): इस ऐतिहासिक फैसले में सर्वोच्च अदालत ने यह साफ किया था कि मुस्लिम महिलाओं को भी तलाक के बाद दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत अपने पति से गुजारा भत्ता पाने का पूरा कानूनी अधिकार है.
सवाल-जवाब
तलाक-ए-हसन और प्रतिबंधित हो चुके तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) में क्या अंतर है?
तीन तलाक (तलाक-ए-बिद्दत) में पति एक ही बार में एक ही सांस में तीन बार तलाक बोलकर तुरंत शादी खत्म कर देता था, जिसमें सुलह की कोई गुंजाइश नहीं होती थी. वहीं, तलाक-ए-हसन में तीन महीने का समय दिया जाता है और हर महीने एक बार तलाक बोला जाता है, जिसमें समझौते का एक मौका रहता है. हालांकि, यह भी एकतरफा ही होता है.
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ताओं की मुख्य मांग और दलीलें क्या हैं?
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि तलाक-ए-हसन की यह प्रथा मनमानी, एकतरफा और महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन है. यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव के खिलाफ अधिकार) और अनुच्छेद 21 (सम्मान से जीने का अधिकार) का सीधा उल्लंघन करती है, इसलिए इसे अमान्य घोषित किया जाना चाहिए.
19 मई की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट का मुख्य फोकस किस बात पर रहने की उम्मीद है?
सुप्रीम कोर्ट मुख्य रूप से इस बात की समीक्षा करेगा कि क्या यह प्रथा मुस्लिम महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कमजोर स्थिति में लाती है और क्या यह आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में लैंगिक समानता के सिद्धांतों के अनुकूल है. कोर्ट इस मामले में विभिन्न मुस्लिम संगठनों और कानूनी विशेषज्ञों के पक्षों को सुनेगा.