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विपक्ष को मोदी सरकार के जाने का इंतजार है. इंतजार 2014 से ही विपक्षी कर रहे हैं. राहुल गांधी को अब पक्का भरोसा हो गया है कि नरेंद्र मोदी की सरकार अगले साल तक गिर जाएगी. शनिवार को अल्पसंख्यक सलाहकार समिति की बंद कमरे में हुई बैठक में उन्होंने अपनी भविष्यवाणी बताई. बंगाल की निवर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी इसी तरह की आस लगाए बैठी हैं. उन्होंने कहा है- ‘आप (मोदी) दिल्ली में सत्ता से गिरेंगे तो भुगतना होगा कर्मों का फल. मुझे उसी दिन का इंतजार है.’ कुछ इसी तरह की उम्मीद अखिलेश यादव, अरविंद केजरीवाल और तेजस्वी यादव को भी होना चाहिए. इसलिए कि नरेंद्र मोदी के विरोध का अलख फिलवक्त विपक्ष के ये ही नेता जगाए हुए हैं.
इस वक्त विपक्ष के नेता ये कयास लगा रहे हैं कि पीएम मोदी की सरकार जल्द गिर जाएगी. फोटो- पीटीआई
नरेंद्र मोदी के सत्ता से जल्दी जाने का जाप करने वाले इंडिया ब्लाक के विपक्षी नेताओं की ताकत को तथ्यों से समझिए. पिता मुलायम सिंह यादव की अनुकंपा से अखिलेश यादव एक बार यूपी के मुख्यमंत्री बने. दोबारा उनकी वापसी नहीं हुई. 2017 से ही वे दोबारा सीएम बनने का अवसर तलाश रहे हैं. अरविंद केजरीवाल 2 बार यानी 10 साल दिल्ली में प्रचंड बहुमत वाली सरकार के मुखिया थे. दोनों से भाजपा ने ही सत्ता छीनी है. राहुल गांधी 2014 से खुद को आजमा रहे हैं. अभी तक सफलता इतनी भर मिली है कि वे इस बार नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी तक घंहुच गए हैं. तेजस्वी यादव तो बिहार में राजद के अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. सत्ता जाने के 10 साल बाद 2015 में राजद ने 80 सीटें जीती थीं. 2025 में उसकी सीटें खिसक कर 25 पर आ गई हैं. उनमें भी एक ने विधायक ने साथ छोड़ दिया है.
विपक्षी नेताओं की समझ
ममता 15 साल तक बंगाल की मुख्यमंत्री रहीं हैं. केंद्र में भी कभी एनडीए सरकार में मंत्री थीं. अखिलेश यादव और अरविंद केजरीवाल भी मुख्यमंत्री रह चुके हैं. राहुल गांधी 3 बार जोर आजमाइश में विफल रहने के बावजूद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं. इसलिए इन्हें नासमझ मानना भूल होगी. पर, इनके बयानों से इनके संसदीय ज्ञान का अनुमान तो लग ही जाता है. इन विपक्षी नेताओं को इस बात पर आपत्ति है कि मध्य पूर्व एशिया की स्थितियों के कारण देश में ईंधन की कमी है, फिर भी पीएम मोदी विदेशों की सैर कर रहे हैं. ऐसा सवाल न संसदीय मर्यादा के अनुकूल है और न संसदीय व्यवस्था की समझ ही दर्शाता है.
विरोध के बावजूद विस्तार
इन्हें इतनी तो सामान्य समझ होगी ही कि मोदी तफरीह के लिए विदेश दौर पर नहीं गए हैं. उनके टूर में कई महत्वपूर्ण व्यावसायिक और सामरिक डील भी हो रही हैं. मोदी देश के पीएम हैं तो भविष्य की चिंता का भार भी उन पर है. जिस भाजपा के मोदी नेता हैं, वह तात्कालिक लाभ के लिए कोई काम नहीं करती. भाजपा का लंबे समय तक शासन का प्लान है. इसलिए मोदी मुंह भी नहीं छिपा सकते. 10 साल तो उनके कामों को लोगों ने सराहा और अगले 5 साल और काम करने की मोहलत दे दी है. इसलिए अगले साल तक मोदी सरकार गिरने की राहुल की भविष्यवाणी का कोई तार्किक या तथ्यात्मक आधार नहीं दिखता. भाजपा का जिस कदर विस्तार हो रहा है, उससे ममता की आस भी पूरी होने की गुंजाइश नहीं दिख रही है. उल्टे ममता की टीएमसी के सांसद-विधायक भाजपा से गलबहियां के लिए बेताब दिख रहे हैं.
बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इटली के दौरे पर थे. इटली की पीएम जॉर्जिया मेलोनी के साथ.
PM का दौरा जरूरी क्यों?
अब जरा पीएम के विदेश दौरे की जरूरत समझिए कि कि किन वजहों से प्रधानमंत्री का विदेश दौरा जरूरी लगता है. रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद ही दुनिया के देश वैचारिक रूप से बंटने लगे थे. कुछ तो इस-उस ओर खड़े भी हो गए. इसका असर दुनिया ने महसूस किया है. असर आज भी बरकरार है. फरवरी 2026 से ईरान, इजरायल और अमेरिका गुत्थमगुत्था हो रहे हैं. यह नई समस्या है. इस युद्ध का असर यह है कि पूरी दुनिया में कच्चा तेल और रसोई गैस के लिए हाहाकार मचा हुआ है. कुछ देशों में तो इसके दाम बेतहाशा बढ़े हैं. भारत में इस बीच करीब 4 रुपए ही कीमत बढ़ी है. पर, असर दिख तो दिख ही रहा है. पीएम नरेंद्र मोदी ने स्थिति और गंभीर होने की आशंका जताते हुए आगाह किया है. इस संकट में सर्वाइव करने के रास्ते तो तलाशने ही पड़ेंगे न. और, यह काम पीएम के अलावा दूसरा कोई कर भी नहीं सकता. इसके लिए तो हवाई करना मजबूरी और जरूरी है.
40 बिलियन डॉलर की डील
अब जरा इसे भी समझिए. इस महीने (मई 2026) पीएम मोदी 5 देशों की यात्रा पर निकले हैं. संयुक्त अरब अमीरात (UAE), नीदरलैंड्स, स्वीडन, नॉर्वे और इटली के दौरे में लगभग 40 बिलियन डॉलर (करीब 3.5 लाख करोड़ रुपये) के निवेश की डील हुई है. UAE से लंबे समय के लिए तेल और रसोई गैस सप्लाई का समझौता मौजूदा तेल संकट को टालने की दिशा में बड़ी डील मानी जा रही है. ASML और Tata के साथ सेमीकंडक्टर फैब, डिफेंस और AI में स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप, ग्रीन एनर्जी, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और सप्लाई चेन डाइवर्सिफिकेशन जैसे समझौते भी पीएम ने इस बार की यात्रा में किए हैं. इससे आर्थिक विकास में मदद मिलने की उम्ममीद है तो सामरिक रणनीति की दृष्टि भी दिखती है.
सामरिक समझौते भी किए
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अमेरिका से भारत के रिश्ते ठीक नहीं चल रहे. ट्रंप ने पहले भारतीय सामानों पर बेहिसाब टैरिफ लगाया. रूस से सस्ते तेल की खरीद रोकने का दबाव बनाया. सामरिक तौर पर भी भारत को मुसीबत में डालने करने का प्रयास ट्रंप ने शुरू कर दिया है. अब तक न्यूट्रल रहे भारत के बजाय इसके दुश्मन पाकिस्तान को उसने ईरान-इजरायल युद्ध में सरपंच बनाया. भारत के छोटे पड़ोसी देश तो कभी भी अमेरिका के आगे सरेंडर कर सकते हैं या जीत की जिद में बर्बाद हो सकते हैं. ऐसे में सामरिक तैयारी भी जरूरी है. इसके लिए रणनीतिक साझेदार तो तलाशने ही पड़ेंगे. पीएम की विदेश यात्रा इसलिए भी जरूरी थी.
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प्रभात खबर, हिंदुस्तान और राष्ट्रीय सहारा में संपादक रहे. खांटी भोजपुरी अंचल सीवान के मूल निवासी अश्क जी को बिहार, बंगाल, असम और झारखंड के अखबारों में चार दशक तक हिंदी पत्रकारिता के बाद भी भोजपुरी के मिठास ने ब…और पढ़ें