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पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ की बात करें तो मेरठ धार्मिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. यहां विभिन्न शिवालय ऐसे हैं. जो रामायण कालीन युग के साथ-साथ महाभारत काल में भी काफी महत्वपूर्ण माने जाते थे. ऐसे में अगर आप मेरठ के सदर जाएंगे तो आपको सिद्धपीठ बिलेश्वर नाथ मंदिर देखने को मिलेगा. बिंलेश्वरनाथ मंदिर की अगर बात की जाए तो यह हजारों वर्ष पुराना रामायण कालीन मंदिर ही माना जाता है. मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित हरिश्चंद्र जोशी के अनुसार मेरठ रावण की पत्नी मंदोदरी के पिता मय का राज्य क्षेत्र मयराष्ट्र माना जाता था. क्योंकि रावण की पत्नी मंदोदरी धार्मिक प्रवृत्ति की मानी जाती थी. इसलिए वह भी इसी मंदिर में विधि विधान के साथ भगवान भोलेनाथ की पूजा अर्चना किया करती थी
सावन माह की शुरुआत हो गई है. सनातन संस्कृति के अनुसार सावन माह में जो भी श्रद्धालु भगवान भोलेनाथ की विधि विधान के साथ पूजा अर्चना करते हैं. उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है. यही कारण है कि भोले भक्त ऐसे शिवालय को ढूंढते हैं जिनका इतिहास हजारों वर्ष पुराना हो.
ऐसे में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ की बात करें तो मेरठ धार्मिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण माना जाता है. यहां विभिन्न शिवालय ऐसे हैं. जो रामायण कालीन युग के साथ-साथ महाभारत काल में भी काफी महत्वपूर्ण माने जाते थे. ऐसे में अगर आप मेरठ के सदर जाएंगे तो आपको सिद्धपीठ बिलेश्वर नाथ मंदिर देखने को मिलेगा.
बिंलेश्वरनाथ मंदिर की अगर बात की जाए तो यह हजारों वर्ष पुराना रामायण कालीन मंदिर ही माना जाता है. मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित हरिश्चंद्र जोशी के अनुसार मेरठ रावण की पत्नी मंदोदरी के पिता मय का राज्य क्षेत्र मयराष्ट्र माना जाता था. क्योंकि रावण की पत्नी मंदोदरी धार्मिक प्रवृत्ति की मानी जाती थी. इसलिए वह भी इसी मंदिर में विधि विधान के साथ भगवान भोलेनाथ की पूजा अर्चना किया करती थी.
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उन्होंने बताया कि प्रतिदिन रावण की पत्नी मंदोदरी जिस प्रकार भगवान भोलेनाथ की विधि विधान के साथ पूजा अर्चना किया करती थी. उसे भगवान भोलेनाथ भी काफी प्रसन्न होते थे. एक दिन भगवान भोलेनाथ ने यहीं पर ही उन्हें दर्शन देकर मनचाहा पर मांगने के लिए कहा था. इसके पश्चात मंदोदरी ने विद्वान पति मांगा था.जिसके फल स्वरूप उन्हें रावण जैसा विद्वान पति मिला था.
पंडित हरिश्चंद्र जोशी बताते हैं कि तब से लेकर अब तक भगवान भोलेनाथ के प्रति भक्तों में विशेष आस्था देखने को मिलती है. उन्होंने बताया कि यहां पर अगर भोले भक्त 40 दिन तक निरंतर भगवान भोलेनाथ की पूजा अर्चना करते हुए दीपक जलाते हैं. उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. इसी के साथ उन्होंने बताया कि कुंवारी कन्याएं भी अगर यहां 16 सोमवार तक पूजा अर्चना करते हुए भगवान भोलेनाथ की आराधना करती हैं तो उन्हें भी मनचाहा वर ही मिलता है.
उन्होंने बताया कि मंदिर में ही भगवान भोलेनाथ के सामने मां पार्वती भी विराजमान है. ऐसे में जो भी श्रद्धालु यहां पूजा अर्चना करते हैं उन्हें मां पार्वती की पूजा अर्चना करने का अवसर मिल पाता है. जिससे कि सभी मनोकामनाएं होती है. दरअसल ऐतिहासिक मंदिर की अगर बात की जाए तो मराठा शासक ने इसका जीर्णोद्धार कराया था.
ऐसे में यह मंदिर मराठा शैली के अनुसार ही बना हुआ है. आप जब मंदिर में प्रवेश करेंगे. तो आपको गर्भ ग्रह में शीश झुकाकर ही प्रवेश करना होगा. उसके पश्चात आप भगवान भोलेनाथ पर रुद्राभिषेक या जलाभिषेक कर विधि विधान के साथ पूजा अर्चना कर सकते हैं. साथ ही बराबर में भी शिवलिंग स्थापित हैं. उधर भी आप विधि विधान के साथ पूजा अर्चना कर सकते हैं.
बताते चले कि अगर आप भी इस ऐतिहासिक मंदिर में भगवान भोलेनाथ का दर्शन करना चाहते हैं. ऐसे सभी श्रद्धालु भैंसाली मेट्रो स्टेशन उतरकर भगवान भोलेनाथ की पूजा करने के लिए मंदिर पहुंच सकते हैं. क्योंकि यहां से मात्र 400 मीटर की दूरी पर मंदिर स्थित है. सावन माह को लेकर यहां विशेष इंतजाम भी किए गए हैं. जिससे कि श्रद्धालुओं को दर्शन करने में बिल्कुल भी परेशानी ना हो.