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Indias Crop Production : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक ने कहा है कि हमें चावल उत्पादन के रकबे को 5 करोड़ हेक्टेयर तक बढ़ाने की जरूरत नहीं है. इसके लिए 3.5 करोड़ हेक्टेयर ही काफी है और शेष रकबे को तिलहन व दलहन उत्पादन को दिया जा सकता है.
भारत में दाल और तिलहन का उत्पादन बढ़ाने का सुझाव दिया गया है.
नई दिल्ली. आपको जानकर हैरान होगी कि देश के सबसे बड़े कृषि अधिकारी और वैज्ञानिक ने चावल उत्पादन और उसका रकबा घटाने की सलाह दी है. उनका कहना है कि भारत को ज्यादा चावल उगाने की बजाय इस रकबे का इस्तेमाल दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए करना चाहिए. दुनिया में बढ़ते खाद्य संकट और अल नीनो जैसे जलवायु प्रभाव के बीच यह सुझाव काफी मायने रखता है. कृषि अधिकारी का दावा है कि भारत के लिए चावल का मौजूदा उत्पादन काफी है और अब दूसरी फसलों में निर्भरता पर जोर दिया जाना चाहिए.
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक एमएल जाट ने कहा कि भारत में साल 2047 के लिए निर्धारित चावल उत्पादन लक्ष्य पहले ही हासिल हो चुके हैं, जिससे फसल विविधीकरण की आवश्यकता और बढ़ जाती है. फिलहाल हमें 5 करोड़ हेक्टेयर में चावल उगाने की जरूरत नहीं है. साल 2047 तक 3.5 करोड़ हेक्टेयर का रकबा चावल उत्पादन के लिए पर्याप्त होगा. लिहाजा यदि शेष बचे 1.5 करोड़ हेक्टेयर क्षेत्र को कम किया जाए, तो उसे तिलहन और दालों की ओर मोड़ा जा सकता है. इससे हम इन फसलों में आत्मनिर्भर बन सकते हैं.
अल नीनो से निपटने के लिए तैयार है भारत
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सरकार इस साल की खरीफ फसल पर अल नीनो के संभावित प्रभाव से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है. उन्होंने एकीकृत खेती और दालों व तिलहनों में आत्मनिर्भरता बढ़ाने पर जोर दिया. मंत्री ने कहा कि बदलती जलवायु के प्रति चिंता करने के बजाय तैयारी जरूरी है. प्रभावित जिलों के लिए आकस्मिक योजनाएं बनाई जाएंगी और जहां आवश्यक होगा, वहां फसलों में बदलाव पर विचार किया जाएगा.
क्या है सरकार की तैयारी
उन्होंने बताया कि मंत्रालय अल नीनो के प्रभाव की स्थिति में वैकल्पिक फसलों के लिए जिलों की पहचान करने और बीज की उपलब्धता सुनिश्चित करने की प्रक्रिया में है. भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने 13 अप्रैल को जारी अपने प्रथम चरण के पूर्वानुमान में साल 2026 के लिए सामान्य से कम दक्षिण-पश्चिम मानसून का अनुमान लगाया है जिसमें वर्षा दीर्घकालिक औसत का लगभग 92 फीसदी रहने की संभावना है.
अल नीनो से गर्म हो जाता है मौसम
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) ने मई-जुलाई के बीच अल नीनो जैसी परिस्थितियों की वापसी की संभावना जताई है. वहीं अमेरिका स्थित राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (एनओएए) ने 11 मई के अपने ‘ईएनएसओ अपडेट’ में कहा कि मई-जून के दौरान अल नीनो परिस्थितियां विकसित हो सकती हैं और साल के अंत तक बनी रह सकती हैं. अल नीनो स्थिति प्रशांत महासागर के पूर्वी उष्णकटिबंधीय क्षेत्र के सतही जल के असामान्य रूप से गर्म होने से जुड़ी है. इससे भारत में अधिक गर्म और शुष्क मौसम बन जाता है.
राज्यों की ढिलाई बर्दाश्त नहीं
चौहान ने कहा कि मौसम संबंधी चुनौतियों के बावजूद भारत 2025-26 फसल वर्ष (जुलाई-जून) में 37.656 करोड़ टन खाद्यान्न उत्पादन का रिकॉर्ड हासिल करने की दिशा में अग्रसर है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 1.88 करोड़ टन अधिक है. अल नीनो से निपटने के उपायों को लागू करने में राज्यों ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी. अगर राज्यों के कृषि मंत्री इससे जुड़ी बैठकों में नहीं आते तो सीधे मुख्यमंत्री को पत्र लिखा जाएगा.
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प्रमोद कुमार तिवारी को शेयर बाजार, इन्वेस्टमेंट टिप्स, टैक्स और पर्सनल फाइनेंस कवर करना पसंद है. जटिल विषयों को बड़ी सहजता से समझाते हैं. अखबारों में पर्सनल फाइनेंस पर दर्जनों कॉलम भी लिख चुके हैं. पत्रकारि…और पढ़ें