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सीनेट और सिंडिकेट का बुनियादी ढांचा पूरी तरह से बदलेगा…झारखंड में विश्वविद्यालयों की सर्वोच्च नीति-निर्धारक इकाइयों—सीनेट और सिंडिकेट का बुनियादी ढांचा पूरी तरह बदल गया है। ‘झारखंड राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम-2026’ के माध्यम से चुनाव आधारित प्रतिनिधित्व प्रणाली को खत्म कर मनोनयन (नॉमिनेशन) व्यवस्था लागू कर दी गई है। नीति-निर्धारकों का मानना है कि इस कदम से विश्वविद्यालयों में आंतरिक गुटबाजी खत्म होगी और निर्णय लेने की प्रक्रिया में तेजी आएगी। दूसरी तरफ, शिक्षाविदों का कहना है कि चुनाव प्रणाली खत्म होने से विश्वविद्यालयों की लोकतांत्रिक स्वायत्तता और जवाबदेही खतरे में पड़ जाएगी। इससे विश्वविद्यालय एक लोकतांत्रिक स्वायत्त संस्था से केंद्रीय प्रशासनिक निकाय में तब्दील हो जाएंगे। उनका तर्क है कि ऐसी स्थिति में सीनेट और सिंडिकेट की बैठकों में होने वाली अनियमितताओं पर न तो कोई विरोध दर्ज कराएगा और न ही कोई सवाल उठा सकेगा। अभी क्या है व्यवस्था? निर्वाचित प्रतिनिधि: वर्तमान व्यवस्था के तहत प्रोफेसर व एसोसिएट प्रोफेसर कोटे से एक-एक और असिस्टेंट प्रोफेसर कोटे से दो प्रतिनिधि चुनकर आते हैं। इसी तरह संबद्ध (अफिलिएटेड) कॉलेजों से एक शिक्षक प्रतिनिधि तथा विश्वविद्यालय मुख्यालय, पीजी विभाग और अंगीभूत (कॉन्स्टिट्यूएंट) कॉलेजों के कर्मचारियों का एक प्रतिनिधि चुनाव जीतकर आता है। नामित प्रतिनिधि: इसके अलावा विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा नामित डीन, विभागाध्यक्ष (एचओडी), प्राचार्य (प्रिंसिपल), छात्र संघ के प्रतिनिधि, राजभवन (लोकभवन) और सरकार द्वारा मनोनीत प्रतिनिधि इसमें शामिल होते हैं। नई व्यवस्था में क्या होगा? नए एक्ट के तहत सीनेट और सिंडिकेट की संरचना तो बनी रहेगी, लेकिन इनमें चुनाव आधारित प्रतिनिधित्व पूरी तरह खत्म हो जाएगा। अब इसमें केवल विश्वविद्यालय के पदेन प्रतिनिधि, राजभवन और सरकार द्वारा मनोनीत सदस्य ही शामिल होंगे। इसके तहत राज्य सरकार को शिक्षा, उद्योग, कृषि, बैंकिंग, वित्त, सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों के 10 प्रतिष्ठित व्यक्तियों को नामित करने का अधिकार दिया गया है। बदलाव के फायदे और नुकसान (नफा-नुकसान) फायदे (लाभ) कार्यों में तेजी: निर्वाचित प्रतिनिधियों के विरोध और हंगामे के कारण अक्सर बैठकें स्थगित हो जाती थीं और महत्वपूर्ण फैसले अटक जाते थे। अब मनोनीत सदस्यों के होने से नीतियां और निर्णय बिना किसी गतिरोध के तेजी से लिए जा सकेंगे। गुटबाजी से मुक्ति: विश्वविद्यालयों में सीनेट और सिंडिकेट चुनाव के दौरान शिक्षकों और कर्मचारियों के बीच तीव्र राजनीतिक गुटबाजी देखने को मिलती थी, जिससे शैक्षणिक माहौल प्रभावित होता था। चुनाव खत्म होने से कैंपस की आंतरिक राजनीति पर लगाम लगेगी। खर्च की बचत: इन चुनावों के आयोजन में विश्वविद्यालय प्रशासन का काफी समय, मैनपावर और पैसा खर्च होता था। अब इस संसाधन और धन का उपयोग शैक्षणिक व शोध कार्यों में किया जा सकेगा। विशेषज्ञों को अवसर: चुनाव में अक्सर वही लोग जीत पाते थे जिनकी लोकप्रियता या राजनीतिक पकड़ मजबूत होती थी। मनोनयन व्यवस्था से सरकार और राजभवन विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और उद्योगपतियों को जगह दे सकेंगे, जिससे विश्वविद्यालय को उनके अनुभवों का सीधा लाभ मिलेगा। बेहतर समन्वय: मनोनीत सदस्य सरकार और राजभवन के नीतिगत विचारों के अनुकूल होंगे, जिससे विश्वविद्यालय की योजनाओं और सरकारी नीतियों के बीच टकराव की स्थिति कम होगी। नुकसान (हानि) लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन: विश्वविद्यालयों को हमेशा स्वतंत्र विचारों और लोकतंत्र की नर्सरी माना जाता है। चुनाव खत्म होने से उनकी स्वायत्तता प्रभावित होगी और वे पूरी तरह से एक सरकारी विभाग की तरह काम करने लगेंगे। प्रशासनिक नियंत्रण का अंत: निर्वाचित प्रतिनिधि प्रशासन की कमियों, वित्तीय अनियमितताओं और मनमाने फैसलों पर सीधे सवाल उठाते थे। मनोनीत सदस्य चूंकि सत्ता के सहयोग से पद पाते हैं, इसलिए वे प्रशासन की गलतियों पर आंखें मूंद सकते हैं, जिससे भ्रष्टाचार और तानाशाही बढ़ने का खतरा रहेगा। समस्याओं की अनदेखी: शिक्षक, गैर-शिक्षण कर्मचारियों और छात्रों की व्यावहारिक तथा जमीनी समस्याओं को प्रखरता से उठाने वाला कोई नहीं होगा, क्योंकि मनोनीत सदस्यों को दोबारा चुनाव में जाने का कोई डर नहीं होगा। ‘जी-हुजूरी’ की संस्कृति: इस बदलाव से चाटुकारिता को बढ़ावा मिल सकता है। योग्यता के बजाय सत्तासीन लोगों के करीबी या उनकी विचारधारा से मेल खाने वाले व्यक्तियों को ही सीनेट और सिंडिकेट में जगह मिलने की संभावना बढ़ जाएगी। असंतोष में वृद्धि: जब शिक्षकों और कर्मचारियों को यह महसूस होगा कि प्रबंधन में उनकी बात सुनने या उनका प्रतिनिधित्व करने वाला कोई लोकतांत्रिक माध्यम नहीं बचा है, तो कैंपस में आंतरिक असंतोष और बढ़ेगा।
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