Sonia Gandhi Emotional Politics : नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में सोमवार को आयोजित इंडिया गठबंधन की महाबैठक से एक ऐसी तस्वीर सामने आई जिसने भारतीय राजनीति के कई पुराने पन्नों को एक बार फिर से पलट दिया है. बैठक के दौरान जब तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी हॉल में पहुंचीं, तो वहां मौजूद कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी ने बेहद गर्मजोशी के साथ आगे बढ़कर उन्हें गले लगा लिया. सोनिया ने ममता को जादू की झप्पी दी. इस भावुक पल को देखकर वहां मौजूद राहुल गांधी ने हाथ जोड़े और ममता बनर्जी के चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान तैर गई. साल 2018 में कर्नाटक में एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण में बीएसपी सुप्रीमो मायावती के साथ भी सोनिया की गाल मिलाते एक तस्वीर आइकॉनिक बनी थी, लेकिन कुछ ही महीनों के बाद दोनों के रास्ते जुदा हो गए.
भारतीय राजनीति में जब-जब विपक्ष एक मंच पर आता है, तब-तरह की तस्वीरें और समीकरण देश का ध्यान खींचते हैं. लेकिन कुछ तस्वीरें ऐसी होती हैं जो सिर्फ राजनीति नहीं बदलतीं, बल्कि इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए दर्ज हो जाती हैं. अतीत में ऐसा ही एक ऐतिहासिक और बेहद भावुक पल कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान देखने को मिला था. उस वक्त पूरा विपक्ष बेंगलुरु के मंच पर एकजुट था, लेकिन सोशल मीडिया से लेकर अखबारों की सुर्खियों तक केवल एक ही लम्हा छाया रहा था, वह था बसपा सुप्रीमो मायावती और कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गांधी का एक-दूसरे को बेहद गर्मजोशी और आत्मीयता से गले लगाना. 8 साल बाद एक बार वैसी ही तस्वीर आई है, जो सुर्खियां बटोर रहा है. लेकिन मोदी युग में इस तस्वीर के मायने बदल गए हैं.
मोदी युग में इमोशनल तस्वीर के मायने बदल गए!
सोमवार को नई दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक के बाद राजनीतिक गलियारों में इस बात को लेकर गंभीर चर्चा छिड़ गई है कि क्या सोनिया और ममता का मिलन रंग अलग गुल खिलाएगा? मोदी दौर की इस बेहद व्यावहारिक और आक्रामक राजनीति में क्या सोनिया गांधी का यह इमोशनल दांव वाकई रंग लाएगा? इतिहास गवाह है कि सोनिया गांधी ने अतीत में भी कई बार क्षेत्रीय क्षत्रपों को साधने के लिए इसी तरह के भावुक और आत्मीय कदम उठाए हैं, लेकिन वक्त बदलने के साथ ही वे सारे समीकरण ताश के पत्तों की तरह बिखर गए.
जब मायावती ने झटक दिया था सोनिया गांधी का हाथ
सोनिया गांधी की इस ‘इमोशनल पॉलिटिक्स’ के इतिहास को खंगालें तो उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा सुप्रीमो मायावती के साथ हुआ वाकया सबसे पहले जेहन में आता है. बेंगलुरु के बाद दिल्ली में भी एक बार फिर से सोनिया और मायावती एक राजनीतिक मंच नजर आए. विपक्ष को एकजुट करने की कवायद चल रही थी, तब सोनिया गांधी ने मंच पर मायावती के प्रति अपनी आत्मीयता दिखाते हुए उनके ‘गाल से गाल टकराए’ थे और उन्हें गले लगाने की कोशिश की थी. लेकिन अपनी सख्त और कड़क राजनीति के लिए मशहूर मायावती को सोनिया का यह भावुक अंदाज रास नहीं आया. मायावती ने बेहद असहज होते हुए तुरंत सोनिया गांधी का हाथ झटक दिया था और खुद को उनसे दूर कर लिया था.
कब-कब काम नहीं आई सोनिया की ‘जादू की झप्पी’
वह तस्वीर चीख-चीखकर बयां कर रही थी कि क्षेत्रीय क्षत्रप कांग्रेस के इस बड़े भाई वाले और भावुक रवैये को अपने सियासी वजूद के लिए एक खतरे के रूप में देखते हैं. बाद के दिनों में भी बसपा और कांग्रेस के रिश्ते कभी सामान्य नहीं हो सके. ममता बनर्जी और मायावती के अलावा भी सोनिया गांधी ने कई बड़े नेताओं के साथ इस तरह के भावुक रिश्ते बनाने की कोशिश की, जो बाद में बुरी तरह फेल साबित हुए.
के. चंद्रशेखर राव (KCR): तेलंगाना राज्य के गठन के समय बीआरएस तत्कालीन टीआरएस प्रमुख केसीआर ने दिल्ली में सोनिया गांधी से मुलाकात की थी. उस वक्त केसीआर ने सोनिया गांधी को ‘तेलंगाना की मां’ बताते हुए उनके पैर छुए थे और सोनिया ने उन्हें गले लगाया था. लेकिन जैसे ही राज्य का गठन हुआ, केसीआर ने कांग्रेस से पूरी तरह दूरी बना ली और दस साल तक राज्य में कांग्रेस को हाशिए पर रखा.
टीएमसी में अगले 24 से 48 घंटे के अंदर एक और बड़ी टूट हो सकती है.
मुलायम सिंह यादव: साल 1999 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार गिरी थी, तब सोनिया गांधी ने 272 सांसदों के समर्थन का दावा किया था. उस समय मुलायम सिंह यादव के साथ उनकी बेहद करीबी तस्वीरें सामने आई थीं. लेकिन आखिरी वक्त पर मुलायम सिंह ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर समर्थन देने से इनकार कर दिया, जिसने सोनिया को गहरे सियासी संकट में डाल दिया था.
ममता के साथ इस ‘झप्पी’ के मायने?
सोमवार को सोनिया गांधी और ममता बनर्जी के बीच जो गर्मजोशी दिखी, उसके पीछे दोनों नेताओं की अपनी-अपनी राजनीतिक मजबूरियां और जरूरतें हैं. जानकार बताते हैं ममता बनर्जी इस समय अपने जीवन के सबसे बड़े सांगठनिक संकट से जूझ रही हैं. पश्चिम बंगाल में सत्ता जाने के बाद उनकी पार्टी के भीतर सांसदों की महाबगावत की खबरें आम हैं. ऐसे कठिन दौर में दिल्ली आकर सोनिया गांधी के गले मिलना ममता के लिए अपनी प्रासंगिकता और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख को बचाए रखने का एक बड़ा सहारा है. वहीं सोनिया गांधी जानती हैं कि ‘मोदी दौर’ की मजबूत भाजपा से सीधे टकराने के लिए कांग्रेस को इन क्षेत्रीय क्षत्रपों के अनुभवों की सख्त जरूरत है.
नरेंद्र मोदी के इस दौर में राजनीति पूरी तरह से आंकड़ों, कैडर और जमीन पर मिलने वाले नतीजों पर शिफ्ट हो चुकी है. ऐसे में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि अतीत के कड़वे अनुभवों के बाद, सोनिया गांधी का यह भावुक दांव क्या ममता बनर्जी को कांग्रेस के करीब रख पाएगा, या फिर दिल्ली से कोलकाता लौटते ही यह जादू की झप्पी एक बार फिर पुराने सियासी ठंडे बस्ते में चली जाएगी.