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गुमला|जिले की जलवायु और भूमि औषधीय व पोषक गुणों से भरपूर तिल की खेती के लिए अत्यंत उपयुक्त है। कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक अटल तिवारी ने बताया कि अपनी विशेषताओं के कारण तेलों की रानी कहा जाने वाला तिल, कम लागत, कम सिंचाई और बेहद कम समय में किसानों को अच्छी आय देने वाली फसल के रूप में उभर रहा है। बाजार में इसकी भारी मांग है, क्योंकि इसके बीजों में लगभग 45-50 प्रतिशत तेल और 20-25 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने और किसानों की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए यह एक उत्कृष्ट विकल्प सिद्ध हो रहा है। उन्होंने बताया जिले में तिल की बुवाई मुख्य रूप से खरीफ मौसम में जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के मध्य तक की जाती है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार इसके लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सबसे बेहतर मानी जाती है। बुवाई से पहले खेत की 2-3 बार जुताई कर मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए। जिले की परिस्थितियों के लिए कई उन्नत किस्में सुझाई गई हैं, जो अधिक उत्पादन देने के साथ-साथ रोगों के प्रति सहनशील हैं। इनमें प्रमुख हैं: बिरसा तिल-1 और बिरसा तिल-2, कांके सफेद जेएलटी-408, प्रगति, शुभरा, स्वेता, टीकेजी-22 और जवाहर-306। उन्होंने बताया कि बेहतर उत्पादन के लिए प्रति हेक्टेयर 3 से 5 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है। बुवाई के समय कतार से कतार की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। संतुलित पोषण का गणित: मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए प्रति हेक्टेयर 5–10 टन सड़ी हुई गोबर की खाद के साथ 40 किलो नाइट्रोजन, 20 किलो फॉस्फोरस और 20 किलो पोटाश का प्रयोग करना चाहिए। तिल की फसल में शुरुआती 20–25 दिनों में खरपतवार नियंत्रण बेहद जरूरी है। इसके बाद 35–40 दिनों पर दूसरी निराई-गुड़ाई करने से उपज में भारी वृद्धि होती है। इस फसल में पत्ती व फली छेदक कीट व अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा रोग का खतरा रहता है। अटल तिवारी कृिष वैज्ञानिक गुमला । आप खेती-किसानी से जुड़े किस विषय पर जानकारी चाहते हैं, वॉट्सएप नंबर 7482098079 पर सिर्फ मैसेज करें।
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