Annamalai launch new party in tamilnadu: तमिलनाडु की सियासत में इन दिनों कुछ ऐसा पक रहा है जो आने वाले दिनों में दक्षिण भारत की पूरी राजनीति को बदलकर रख सकता है. कभी सूबे में भारतीय जनता पार्टी का सबसे आक्रामक और चमकता हुआ चेहरा रहे पूर्व आईपीएस अधिकारी के. अन्नामलाई के बारे में यह खबर उड़ रही है कि वह बीजेपी का दामन छोड़ सकते हैं. मीडिया और सियासी हल्कों में यह दावा किया जा रहा है कि अन्नामलाई दिल्ली दरबार के कुछ फैसलों से बेहद खफा हैं, खासकर राज्य में क्षेत्रीय दलों के साथ पार्टी के नए तालमेल को लेकर. चर्चा तो यहां तक है कि वह जून के इसी हफ्ते में अपने अगले बड़े कदम का ऐलान कर सकते हैं और अपनी खुद की नई पार्टी की घोषणा भी कर सकते हैं. आइए समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर वो कौन से समीकरण हैं, जिन्होंने पीएम मोदी के इस सबसे भरोसेमंद सिपाही को बगावत और नई राह चुनने की कगार पर लाकर खड़ा कर दिया है.
पीएम मोदी के ‘सिंघम’ की बीजेपी से क्यों बढ़ीं दूरियां?
मीडिया रिपोर्ट में छपी खबर के मुताबिक, तमिलनाडु के पूर्व बीजेपी अध्यक्ष के. अन्नामलाई और केंद्रीय नेतृत्व के बीच लंबे समय से कुछ मुद्दों को लेकर अंदरूनी खींचतान चल रही थी. राज्य में संगठन के भीतर जब से बदलाव किए गए और उनके कुछ फैसलों को पलटा गया, तभी से अन्नामलाई और उनके धुर समर्थकों में एक अजीब सी खामोशी और नाराजगी देखी जा रही थी. हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच जब उम्मीदवारों और रणनीति की बात आई, तो उसमें अन्नामलाई के आक्रामक तेवरों को थोड़ा शांत करने की कोशिश की गई, जो उनके समर्थकों को बिल्कुल रास नहीं आया.
अन्नामलाई राज्य की कुछ खास सीटों पर अपनी रणनीति के तहत काम करना चाहते थे, लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने स्थानीय स्तर पर कुछ ऐसे फैसले लिए जो उनके नजरिए से मेल नहीं खा रहे थे. इसी तवज्जो की कमी और संगठन में बढ़ते मतभेदों के कारण अन्नामलाई ने पिछले कुछ दिनों से खुद को बड़े राजनीतिक कार्यक्रमों और बैठकों से दूर कर लिया है. हालांकि उन्होंने इस दूरी के पीछे कुछ निजी और पारिवारिक कारणों का हवाला दिया है, लेकिन राजनीति को करीब से जानने वाले लोग इसे किसी बड़े तूफान से पहले की खामोशी मान रहे हैं.
क्या वाकई नई क्षेत्रीय पार्टी बनाने जा रहे हैं अन्नामलाई?
सोशल मीडिया से लेकर चेन्नई के चाय के अड्डों तक यह अफवाह इस वक्त बेहद गर्म है कि अन्नामलाई अब किसी राष्ट्रीय पार्टी के अनुशासन के दायरे में बंधकर रहने के मूड में नहीं हैं. मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया जा रहा है कि अन्नामलाई के बेहद करीबी समर्थक और जमीनी स्तर के कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर लगातार एक नई राजनीतिक लहर की बातें कर रहे हैं. यहां तक कि उनके प्रशंसक नई पार्टी के संभावित नाम, उसकी विचारधारा और तमिलनाडु की माटी से जुड़े कुछ खास प्रतीकों को भी आपस में शेयर कर रहे हैं.
कहा जा रहा है कि जून के पहले या दूसरे हफ्ते में अन्नामलाई कोई बड़ा और चौंकाने वाला आधिकारिक ऐलान कर सकते हैं. द्रविड़ राजनीति के इस मजबूत गढ़ में अपनी एक अलग और बेदाग पहचान बनाने वाले पूर्व आईपीएस के चाहने वाले भी यही चाहते हैं कि वह किसी केंद्रीय गाइडलाइन के नीचे काम करने के बजाय, तमिलनाडु के युवाओं की आवाज बनकर अपनी एक अलग क्षेत्रीय पार्टी खड़ी करें. अगर ऐसा होता है, तो यह दक्षिण भारत में अपनी जड़ें मजबूत करने की कोशिश में जुटी बीजेपी के लिए एक बहुत बड़ा झटका साबित हो सकता है.
द्रविड़ दलों से गठबंधन की कोशिश बनी सबसे बड़ा कांटा?
अन्नामलाई के बीजेपी छोड़ने की अटकलों के पीछे जो सबसे बड़ी और ठोस वजह निकलकर सामने आ रही है, वो है राज्य के बड़े क्षेत्रीय दल एआईएडीएमके (AIADMK) के साथ बीजेपी के रिश्तों का उतार-चढ़ाव. अन्नामलाई शुरू से ही इस स्टैंड पर अड़े थे कि बीजेपी को तमिलनाडु में बिना किसी बैसाखी के, अपने दम पर अकेले चुनाव लड़ना चाहिए और द्रविड़ राजनीति के विकल्प के रूप में उभरना चाहिए. उन्होंने अपने पूरे कार्यकाल के दौरान द्रविड़ पार्टियों की नीतियों पर जमकर तीखे हमले किए थे, जिससे राज्य के युवाओं में उनका क्रेज बढ़ा था.
लेकिन दिल्ली में बैठे रणनीति कारों को लगता था कि स्टालिन की मजबूत डीएमके को टक्कर देने के लिए स्थानीय स्तर पर पुराना गठबंधन ही काम आ सकता है. सूत्रों के अनुसार, इस गठबंधन की शर्तों और रणनीति को लेकर अन्नामलाई के आक्रामक रुख को आलाकमान ने थोड़ा दबाने की कोशिश की. बीजेपी नेतृत्व चाहता था कि द्रविड़ दलों के साथ रिश्ते सुधारे जाएं, जो कि अन्नामलाई की अपनी राजनीतिक लाइन के बिल्कुल खिलाफ था. यही वैचारिक मतभेद अब एक बड़ी खाई में बदल चुका है.
कभी कहा था- राजनीति छोड़कर खेती करने चला जाऊंगा
अन्नामलाई स्वभाव से बेहद कड़क, स्वाभिमानी और लीक से हटकर राजनीति करने वाले नेता माने जाते हैं. कुछ समय पहले जब उनके साइडलाइन होने या पार्टी लाइन से अलग चलने की खबरें उड़ी थीं, तब उन्होंने मीडिया के सामने आकर बेहद बेबाकी से अपनी बात रखी थी. उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि वह राजनीति में किसी पद या कुर्सी के लालच में नहीं आए हैं. उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा था, “मैं जब तक अपनी मर्जी से और अपनी शर्तों पर राजनीति में रहना चाहूंगा, रहूंगा. जिस दिन मुझे लगेगा कि मैं कुछ नहीं बदल पा रहा, मैं वापस अपने गांव जाकर खेती करने लगूंगा.”
उनका यह पुराना तेवर साफ दिखाता है कि वह दबाव की राजनीति के आगे झुकने वाले इंसान नहीं हैं. मौजूदा समय में तमिलनाडु की सियासत में सिनेमा से राजनीति में आए जोसेफ विजय (विजय थलपति) की पार्टी टीवीके (TVK) ने भी एक मजबूत तीसरी ताकत के रूप में हलचल मचा रखी है. ऐसे में अन्नामलाई को लगता है कि सूबे के युवाओं और द्रविड़-विरोधी वोटर्स के बीच उनके लिए अपनी खुद की जमीन तैयार करने का यह बिल्कुल सही मौका है. अब देखना यह है कि दिल्ली का बुलावा उन्हें रोकता है या ‘अन्ना’ अपनी नई राह चुनते हैं.