Modi Cabinet Reshuffle: ‘हवा का रुख बदले तो हैरत कैसी? सियासत में मौसम रोज बदलते हैं, आज जो सफ (कतार) में आगे हैं, कल वो भी पीछे निकलते हैं.’ राजनीति भी एक मौसम की तरह है, कब हवा का रुख बदल जाए पता ही नहीं चलता. इस सियासत में कब कौन आगे निकल जाए, कौन पीछे रह जाए इसकी कल्पना कोई नहीं कर सकता. देश की वर्तमान राजनीति की स्थिति भी कुछ ऐसी ही नजर आ रही है. मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के बीच कैबिनेट फेरबदल की चर्चाएं तेज हैं. नेताओं से लेकर आम जनता तक सभी के मन में बस एक ही प्रश्न है कि आखिर कैबिनेट फेरबदल कब होगी, कौन दोबारा अपनी कुर्सी पर रहेगा और किसे अपनी गद्दी छोड़नी पड़ेगी.इसी कड़ी में न्यूज 18 हिंदी वेबसाइट के प्रधान संपादक और वरिष्ठ पत्रकारों की पैनल ने कुछ ऐसी घटनाएं एवं किस्सों का जिक्र किया है जिससे आपको अंदाजा हो जाएगा कि आखिर कैबिनेट फेरबदल में क्या होने वाला है. तो आइए जानते हैं कि पैनल में क्या चर्चा हुई… बंगाल में बीजेपी की प्रचंड जीत के बाद के समीकरण, बिहार में भारत भूषण तिवारी की हत्या से उपजा सियासी उबाल, अयोध्या में राम मंदिर चढ़ावे को लेकर उठा विवाद और पंजाब में अकाल तख्त की हलचल, इन सभी घटनाओं का सीधा असर आगामी कैबिनेट विस्तार और बीजेपी की चुनावी रणनीति पर पड़ने वाला है. आपको बता दें की इस चर्चा में न्यूज 18 हिंदी वेबसाइट के प्रधान संपादक आलोक कुमार, और वरिष्ठ पत्रकार पायल, पल्लवी, मधुपर्णा और अमित पांडे शामिल हैं. सबने मिलकर इन मुद्दों पर अपनी राय रखी. आइए, ‘पंचायत’ के इस विशेष विश्लेषण में विस्तार से समझते हैं कि आखिर पर्दे के पीछे क्या पक रहा है? मोदी का ‘सरप्राइज’ फैक्टर और कैबिनेट रीशफल का आधार पिछले कुछ हफ्तों से लगातार यह अटकलें लगाए जा रहे थे कि फेरबदल आज होगा या कल होगा… इस पर पैनलिस्ट पायल ने बड़े विस्तार से मौसम के साथ तुलना करते हुए बताया कि जिस तरह हम ये अनुमान नहीं लगा सकते कि कब बारिश होगी, कब गर्मी ज्यादा रहेगी ठीक वैसे ही मोदी सरकार को लेकर आप चाहे जितने भी कयास लगा लें, उनके फैसलों का सटीक अनुमान लगाना असंभव है. फेरबदल की चर्चाओं से मंत्रियों में डर बैठ गया है कि कई नेता मंदिरों में दर्शन करते नजर आते हैं तो कई किसी ज्योतिष के पास बैठे हुए. इसके बाद वरिष्ठ पत्रकार पल्लवी ने बताया कि आमतौर पर जातीय (Caste) और क्षेत्रीय (Regional) समीकरणों पर ध्यान देकर फेरबदल किया जाता है लेकिन पीएम मोदी का स्टाइल हमेशा से स्थापित राजनीतिक ढांचों से परे रहा है. इस बार इकॉनमी, एआई (AI) और बड़े रिफॉर्म्स पर जोर है. मंत्रियों का बकायदा एक रिपोर्ट कार्ड तैयार किया गया है. जिस भी नेता ने उम्मीद के मुताबिक काम नहीं किया है, उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है. सरकार अब एक ‘यंग और डायनेमिक लुक’ देने की तैयारी में है. बंगाल का ‘खेला’: टीएमसी से आए नेताओं को मिलेगा इनाम या होगा इंतजार? अब बात करें पश्चिम बंगाल की जहां बीजेपी की जीत और टीएमसी की हार के बाद बड़ा खेला हो चुका है. लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल उन नेताओं का है, जिन्होंने टीएमसी छोड़कर बीजेपी या एनडीए का दामन थामा है. सौगत राय और सुदीप बंदोपाध्याय जैसे दिग्गज नेताओं को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है. एक तरफ जहां सौगत राय ने टीएमसी का साथ नहीं छोड़ा, वहीं दूसरी तरफ सुदीप बंदोपाध्याय और काकोली घोष ने नई पार्टी बना कर NDA का समर्थन करना शुरू कर दिया है. तो क्या कैबिनेट में इन्हें कोई जगह मिल सकती है? इस पर पत्रकार मधुपर्णा ने कहा कि यह बताना बेहद मुश्किल है. लेकिन यह भी कहा जा सकता है कि जब 20 नेता बीजेपी में शामिल हुए तो पार्टी कुछ जरूर सोचेगी. वहीं पत्रकार पल्लवी ने सवाल उठाया कि सालों से संघर्ष कर रहे कार्यकर्ताओं को दरकिनार कर कल आए नेताओं को कैबिनेट में जगह क्यों दी जाए?पत्रकार अमित पांडे ने बताया कि संसद में कुछ महत्वपूर्ण बिलों को पास कराने और संख्या बल को मजबूत करने के लिए इन 20 सांसदों में से कुछ सांसदों का अहम रोल रहा है. ऐसे में कम से कम तीन या चार सांसदों को इनाम मिलने की संभावना है. महाराष्ट्र और पंजाब: टूट-फूट और अंदरूनी कलह का दौर महाराष्ट्र की राजनीति में जो हो रहा है, वह भारतीय राजनीति में शायद पहली बार है. एक ही पार्टी (शिवसेना और एनसीपी) के दो फाड़ हो चुके हैं. चुनाव परिणामों के बाद ‘चेतना जागने’ का दौर जारी है. पत्रकार पायल ने बताया कि सचिन अहीर जैसे नेताओं का सुबह उद्धव गुट छोड़कर दोपहर में सत्ता पक्ष के साथ पर्चा भर देना, यह दिखाता है कि राजनीति में निष्ठाएं कितनी तेजी से बदल रही हैं. वहीं दूसरी ओर वरिष्ठ पत्रकार पल्लवी ने कहा कि सिर्फ टीएमसी या शिवसेना ही नहीं, पंजाब कांग्रेस में भी भारी उथल-पुथल है. भगवंत मान और बाजपा पर फोकस है, तो कांग्रेस के भीतर 8 से ज्यादा बैठकें हो चुकी हैं, लेकिन अध्यक्ष पद को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है. अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग नाराज होकर छुट्टी पर जाने का मन बना रहे हैं. दलित वोट बैंक खिसकने के बावजूद चरणजीत सिंह चन्नी को अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चाएं हैं. ऐसे में कई कांग्रेसी नेताओं की ‘चेतना’ भी जल्द जाग सकती है और वे बीजेपी का रुख कर सकते हैं.पत्रकार अमित पांडे ने आगे बताया कि बीजेपी के बड़े नेता तरुण चुघ का शपथ ग्रहण से पहले संसद की सीढ़ियों को नमन करना, पंजाब के वोटर्स और पार्टी हाईकमान को एक सीधा साइकोलॉजिकल मैसेज था. बिहार का गणित और यूपी का चुनाव: सवर्ण वोट बैंक की चिंता बिहार में हाल ही में सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाए जाने के फैसले ने यह साबित कर दिया कि बीजेपी अब भी अपने फैसलों से चौंका सकती है. प्रधान संपादक आलोक कुमार ने बताया कि उन्हें भी इसका अंदाजा नहीं था. चर्चा थी कि किसी कैडर के नेता को मौका मिलेगा, न कि आरजेडी से आए किसी व्यक्ति को. लेकिन राजनीति में जो होता है, वह दिखता नहीं है.पत्रकार अमित पांडे ने