किसान डेयरी फार्मिंग के तहत धान के पुआल को सूखे चारे के...
लखीमपुर खीरी: जिले में किसान और युवा खेती के साथ-साथ डेयरी फार्मिंग की ओर भी तेजी से आकर्षित हो रहे हैं. पशुपालन ग्रामीण क्षेत्रों में आमदनी का एक महत्वपूर्ण जरिया बनता जा रहा है. कई किसान गाय और भैंस पालकर दूध बेचने से अपनी आय बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं. हालांकि, डेयरी फार्मिंग में अच्छा मुनाफा कमाने के लिए पशुओं की सही देखभाल और उनके खानपान पर विशेष ध्यान देना जरूरी है. पशुओं को पौष्टिक और संतुलित आहार न मिलने पर उनके स्वास्थ्य के साथ-साथ दूध उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है. ऐसे में धान की कटाई के बाद खेतों में बचने वाली पराली यानी पुआल किसानों के लिए उपयोगी साबित हो रहा है. इसका सही तरीके से इस्तेमाल करके किसान चारे की समस्या को कुछ हद तक कम कर सकते हैं और पशुपालन पर होने वाले खर्च को नियंत्रित कर सकते हैं. धान का पुआल पशुओं के लिए कितना उपयोगी इन दिनों जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में धान की कटाई का काम चल रहा है. कटाई के बाद खेतों में बड़ी मात्रा में पुआल बच जाता है. आमतौर पर किसान इसे खेतों से हटाने या निस्तारित करने की चिंता करते हैं, लेकिन पशुपालन करने वाले किसान इसका उपयोग सूखे चारे के रूप में कर सकते हैं. धान के पुआल में रेशा यानी फाइबर पाया जाता है, जो पशुओं के पाचन तंत्र के सामान्य कामकाज में मदद करता है. हालांकि, इसमें प्रोटीन, ऊर्जा और कई जरूरी पोषक तत्वों की मात्रा हरे चारे तथा अच्छे गुणवत्ता वाले दूसरे पशु आहार की तुलना में कम होती है. धान के पुआल को पशुओं के आहार में सीमित मात्रा में शामिल करना चाहिए. इसके साथ हरा चारा, दाना, खली, चोकर और जरूरत के अनुसार खनिज मिश्रण उपलब्ध कराना जरूरी है. इससे पशुओं को आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं और पशुओं का स्वास्थ्य बेहतर बनाए रखने में मदद मिलती है. हरे चारे की कमी में बन सकता है सहारा ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन करने वाले किसानों के सामने साल के अलग-अलग समय पर हरे चारे की उपलब्धता की समस्या आती है. गर्मियों में सूखे की स्थिति, बाढ़ के दौरान खेतों में पानी भरने और मौसम में बदलाव के कारण कई बार हरे चारे की पर्याप्त उपलब्धता नहीं हो पाती. ऐसी स्थिति में किसान सूखे चारे के रूप में धान के पुआल का इस्तेमाल कर सकते हैं. पुआल को सूखी और सुरक्षित जगह पर रखने से इसे लंबे समय तक इस्तेमाल के लिए बचाकर रखा जा सकता है. इससे किसानों को चारे की कमी के समय कुछ राहत मिलती है. जिन किसानों के पास पर्याप्त भंडारण की सुविधा है, वे धान की कटाई के समय पुआल को इकट्ठा करके रख सकते हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर पशुओं को खिलाया जा सके. पुआल को खुले में बारिश और नमी से बचाना जरूरी है. गीला, सड़ा हुआ या फफूंद लगा पुआल पशुओं के स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक हो सकता है. इसलिए पशुओं को खिलाने से पहले उसकी गुणवत्ता की जांच करनी चाहिए. संतुलित आहार से बढ़ सकती है दूध देने की क्षमता डेयरी फार्मिंग में पशुओं से अधिक दूध प्राप्त करने के लिए केवल अधिक मात्रा में चारा देना पर्याप्त नहीं है. पशु को उसकी उम्र, वजन, दूध उत्पादन और शारीरिक स्थिति के अनुसार संतुलित आहार देना जरूरी होता है. यदि पशु को केवल पुआल खिलाया जाता है, तो उसे पर्याप्त प्रोटीन, ऊर्जा और खनिज नहीं मिल पाएंगे. इससे दूध उत्पादन प्रभावित हो सकता है. हरे चारे की कमी से निपटने के लिए किसान साइलेज बनाने की तकनीक का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. साइलेज बनाने में आमतौर पर मक्का, ज्वार और अन्य उपयुक्त हरे चारे को उचित नमी और हवा से सुरक्षित परिस्थितियों में किण्वित करके संरक्षित किया जाता है. इससे चारे को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है. पशु चिकित्सक ने दी संतुलित आहार की सलाह इस संबंध में बातचीत करते हुए पशु चिकित्सक डॉ. हेमंत सिंह ने बताया कि इस समय धान की कटाई चल रही है. ऐसे में किसान अपने पशुओं को पुआल खिला रहे हैं. उन्होंने कहा कि पशुओं को पुआल सीमित मात्रा में खिलाना चाहिए. इसके साथ उन्हें संतुलित आहार देना भी जरूरी है, जिससे पशुओं के स्वास्थ्य को बनाए रखने और दूध उत्पादन में मदद मिल सकती है. डॉ. सिंह के अनुसार, पशुओं की खुराक में केवल सूखे चारे पर निर्भर नहीं रहना चाहिए. हरा चारा और जरूरत के मुताबिक दाना उपलब्ध कराना आवश्यक है. पशुओं को पर्याप्त पानी देना चाहिए और उनके रहने की जगह को साफ-सुथरा रखना चाहिए. यदि पशु के दूध उत्पादन में अचानक कमी आती है, वह खाना कम कर देता है या उसके स्वास्थ्य में कोई बदलाव दिखाई देता है, तो पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए. Source link
