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गढ़वा जिले के बंशीधर नगर अनुमंडल क्षेत्र में किसानों की सिंचाई का प्रमुख साधन बाईं बांकी जलाशय परियोजना (बंबा डैम) वर्षों से उपेक्षा का दंश झेल रहा है। डैम का गेट पिछले करीब एक वर्ष से क्षतिग्रस्त है। इस कारण इस बरसात में भी बारिश का पानी डैम में जमा
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इसका सीधा असर खरीफ फसल पर पड़ा है। डैम से सिंचाई सुविधा मिलने वाले एक दर्जन से अधिक गांवों में 1200 हेक्टेयर से अधिक भूमि पर धान की रोपाई प्रभावित हुई है। डैम से सिंचाई की उम्मीद लगाए बैठे हजारों किसानों को समय पर पानी नहीं मिला। इस कारण उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ा। आर्थिक रूप से सक्षम कुछ किसानों ने मोटर, डीजल पंप और अन्य वैकल्पिक साधनों की मदद से किसी तरह धान की रोपाई कर ली।
वहीं बड़ी संख्या में छोटे और सीमांत किसान सिंचाई के वैकल्पिक साधन जुटाने में सक्षम नहीं थे। इस कारण वे धान की रोपाई नहीं कर सके। जानकारी के अनुसार बंबा डैम का निर्माण वर्ष 1978-79 में करीब 36 लाख रुपये की लागत से कराया गया था। डैम के निर्माण का मुख्य उद्देश्य आसपास के किसानों को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना था। इसके जरिए क्षेत्र के एक दर्जन से अधिक गांवों के चार हजार से ज्यादा किसानों की करीब दो हजार हेक्टेयर भूमि सिंचित होती थी। समय के साथ डैम के रखरखाव पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। इस कारण इसकी स्थिति खराब होती चली गई। पिछले एक वर्ष से डैम का गेट क्षतिग्रस्त है। इस कारण पानी रोकना मुश्किल हो गया। किसानों का कहना है कि यदि समय रहते गेट की मरम्मत करा दी जाती तो इस वर्ष बारिश के पानी का बेहतर उपयोग किया जा सकता था। धान की रोपाई में उत्पन्न संकट से भी बचा जा सकता था। बंबा डैम से प्रभावित गांवों में बंबा, बरडीहा, चितविश्राम, बारोडीह, ठरका, ठरटिया, पिपरडीह, सुलसुलिया, सनपुरा, महदेईया, सरहसताल, मंगरदह, नरही और जासा आदि शामिल हैं। इन गांवों के किसानों की बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है। ग्रामीणों के अनुसार धान की रोपाई का मुख्य समय बीत जाने के बाद सिंचाई विभाग की ओर से अगस्त महीने में डैम का गेट लगाने का काम शुरू किया गया है। किसानों का सवाल है कि जब फसल के लिए पानी की सबसे अधिक जरूरत थी, तब गेट की मरम्मत क्यों नहीं कराई गई।