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पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी की पहली सरकार के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान एक ऐसी तस्वीर सामने आई, जिसने भारतीय राजनीति में नेताओं के सम्मान और शिष्टाचार को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है. कोलकाता के भव्य मंच पर मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के शपथ ग्रहण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनसंघ के समय के दिग्गज और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सहयोगी रहे 98 वर्षीय माखनलाल सरकार को जिस गर्मजोशी से गले लगाया और झुककर उनका अभिवादन किया, वह महज एक तस्वीर नहीं थी. माखनलाल सरकार ने अपना पूरा जीवन पश्चिम बंगाल में पार्टी का आधार बढ़ाने और आम लोगों को जोड़ने में लगा दिया था. यहां तक कि वे डॉ. मुखर्जी के साथ जम्मू-कश्मीर आंदोलन के दौरान जेल भी गए थे. पीएम मोदी द्वारा एक वयोवृद्ध कार्यकर्ता को दिया गया यह सम्मान स्पष्ट करता है कि विचारधारा और संगठन के लिए अपना जीवन खपाने वालों को किस तरह सिर-आंखों पर बिठाया जाता है.
आज पश्चिम बंगाल के राजनीतिक इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया है, जहां पहली बार भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार ने सत्ता की बागडोर संभाली है. इस ऐतिहासिक और गौरवपूर्ण अवसर पर हम सभी के लिए महान प्रखर राष्ट्रवादी डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को याद करना बेहद स्वाभाविक है. देश की अखंडता और विशेष रूप से पश्चिम बंगाल के लिए उनका योगदान अविस्मरणीय है. प्रदेश में बनी यह नई सरकार उनके विचारों और आदर्शों से प्रेरणा लेते हुए उनके सपनों के बंगाल को धरातल पर उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी.
इस भव्य शपथ ग्रहण समारोह के दौरान एक बेहद भावुक और प्रेरणादायक क्षण तब आया, जब मेरी मुलाकात वयोवृद्ध और समर्पित देशभक्त श्री माखनलाल सरकार जी से हुई. सरकार का जीवन संघर्षों और राष्ट्रसेवा की एक जीवंत मिसाल है; उन्होंने न केवल डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया था, बल्कि जम्मू-कश्मीर आंदोलन के दौरान उनके साथी के तौर पर गिरफ्तारी भी दी थी. उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन पश्चिम बंगाल में पार्टी का जनाधार बढ़ाने और समाज के हर स्तर के लोगों को पार्टी की विचारधारा से जुड़ने के लिए प्रेरित करने में खपा दिया.
इसी तरह 2019 में पूर्व राष्ट्रपति और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न दिया गया. प्रणब मुखर्जी को कांग्रेस का संकटमोचक माना जाता था, लेकिन भाजपा सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजकर यह संदेश दिया कि राष्ट्रीय योगदान दलगत राजनीति से ऊपर होता है. 2024 में पूर्व प्रधानमंत्री और किसान नेता चौधरी चरण सिंह को भी मरणोपरांत भारत रत्न देकर भाजपा ने किसानों की राजनीति में उनके योगदान को मान्यता दी.
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तस्वीरों में झलकते इस सम्मान को देखकर बरबस ही कांग्रेस के उस इतिहास की याद आ जाती है, जहां पार्टी के शीर्ष नेताओं और यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्रियों को जीते जी तो क्या, मरने के बाद भी जलालत झेलनी पड़ी थी. भारतीय जनता पार्टी को ‘पार्टी विद डिफरेंस’ (Party with a difference) यूं ही नहीं कहा जाता है; इसके पीछे वह राजनीतिक संस्कार है जो अपने से वैचारिक विरोध रखने वाले राष्ट्र निर्माताओं को भी सम्मान देता है. दूसरी तरफ, आज के कांग्रेस नेतृत्व, विशेषकर राहुल गांधी को कोलकाता की इन तस्वीरों से यह सीखना चाहिए कि संगठन के वरिष्ठ नेताओं का सम्मान कैसे किया जाता है. जब हम कांग्रेस के अतीत के पन्ने पलटते हैं, तो पी.वी. नरसिम्हा राव और सीताराम केसरी जैसे कद्दावर नेताओं के साथ हुए अपमान की एक दर्दनाक कहानी सामने आती है, जो लोकतंत्र और पार्टी अनुशासन के नाम पर एक बदनुमा दाग है.
राव का यह अपमान यहीं नहीं रुका. दिल्ली, जो देश की राजधानी है और जहां पूर्व प्रधानमंत्रियों के भव्य स्मारक बने हुए हैं, वहां कांग्रेस नेतृत्व ने नरसिम्हा राव का अंतिम संस्कार तक नहीं होने दिया. पार्टी के शीर्ष नेतृत्व के दबाव में उनके परिवार को मजबूर किया गया कि वे पार्थिव शरीर को लेकर हैदराबाद जाएं. दिल्ली में उनके लिए एक छोटा सा स्मारक बनाने तक की जगह नहीं दी गई. एक पूर्व प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष की लाश के साथ किया गया यह राजनीतिक प्रतिशोध यह बताने के लिए काफी था कि कांग्रेस में ‘एक परिवार’ से इतर किसी भी नेता का कद बढ़ना कभी बर्दाश्त नहीं किया गया.
रिपोर्ट्स और प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, जब सीताराम केसरी ने इस तख्तापलट का विरोध करने की कोशिश की, तो उनके साथ शारीरिक बदसलूकी की गई. यहां तक कहा जाता है कि कुछ कांग्रेसी नेताओं ने उनकी धोती तक खींचने की कोशिश की और उन्हें कांग्रेस मुख्यालय के एक कमरे (जिसे कुछ लोग बाथरूम भी बताते हैं) में बंद कर दिया गया. यह सब इसलिए किया गया ताकि वे सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने की घोषणा के बीच कोई व्यवधान न डाल सकें. एक बुजुर्ग और पिछड़े वर्ग (ओबीसी) से आने वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ यह व्यवहार शर्मनाक था.
कांग्रेस ने अपने जिन रत्नों को भुला दिया या अपमानित किया, उन्हें सम्मान देने का काम भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली नरेंद्र मोदी सरकार ने किया. 2024 में भाजपा सरकार ने राजनीति से ऊपर उठकर आर्थिक सुधारों के जनक पी.वी. नरसिम्हा राव को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा. यह उस अपमान का प्रायश्चित था जो कांग्रेस ने उन्हें दिया था. इसी तरह, आजीवन कांग्रेस के मुखर विरोधी रहे, लेकिन किसानों के मसीहा और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह को भी भारत रत्न देकर भाजपा ने यह संदेश दिया कि देश के निर्माण में योगदान देने वालों का मूल्यांकन दलगत राजनीति से ऊपर होना चाहिए.
पी.वी. नरसिम्हा राव, वह नाम जिसने 1991 के ऐतिहासिक आर्थिक सुधारों के जरिए भारत को दिवालिया होने से बचाया था, उनके साथ कांग्रेस आलाकमान का बर्ताव राजनीति के सबसे क्रूर अध्यायों में दर्ज है. 2004 में जब नरसिम्हा राव का निधन हुआ, तो उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए नई दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय (24 अकबर रोड) ले जाया गया. लेकिन विडंबना देखिए, जिस व्यक्ति ने प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में देश और पार्टी की कमान संभाली थी, उनके शव को पार्टी दफ्तर के अंदर तक नहीं ले जाने दिया गया. मुख्यालय के मुख्य दरवाजे बंद कर दिए गए थे और उनका पार्थिव शरीर तपती धूप में बाहर सड़क पर एक वाहन में ही रखा रहा.
राव के अलावा, कांग्रेस के कद्दावर नेता और वर्षों तक पार्टी के खजांची रहे सीताराम केसरी की विदाई की कहानी भी किसी बॉलीवुड थ्रिलर से कम नहीं है. मार्च 1998 का वह दिन भारतीय राजनीति के इतिहास में एक ‘काले दिन’ के रूप में याद किया जाता है. केसरी उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष थे. सोनिया गांधी को पार्टी की कमान सौंपने के लिए 14 मार्च 1998 को कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की एक बैठक बुलाई गई. यह एक ऐसा असंवैधानिक तख्तापलट था, जिसकी पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी. बैठक में केसरी के खिलाफ एकतरफा प्रस्ताव पारित कर दिया गया और जब बैठक चल ही रही थी, तभी 24 अकबर रोड के बाहर लगी उनकी अध्यक्ष पद की ‘नेमप्लेट’ को उखाड़ कर फेंक दिया गया.
सीताराम केसरी ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में कई बार यह दर्द बयां किया कि उन्हें सम्मानपूर्वक इस्तीफा देने का मौका तक नहीं दिया गया. उन्हें गैर-लोकतांत्रिक और असंवैधानिक तरीके से धक्के मारकर बाहर निकाला गया था. केसरी ने दशकों तक कांग्रेस के लिए काम किया था, लेकिन जब परिवार को सत्ता सौंपने की बारी आई, तो उनके सारे योगदान को शून्य कर दिया गया. आज जब भाजपा कांग्रेस पर वंशवाद और आंतरिक लोकतंत्र की कमी का आरोप लगाती है, तो सीताराम केसरी का यह प्रसंग उसका सबसे बड़ा और अकाट्य प्रमाण बनकर सामने आता है.
इसी तरह 2019 में पूर्व राष्ट्रपति और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणब मुखर्जी को भारत रत्न दिया गया. प्रणब मुखर्जी को कांग्रेस का संकटमोचक माना जाता था, लेकिन भाजपा सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाजकर यह संदेश दिया कि राष्ट्रीय योगदान दलगत राजनीति से ऊपर होता है. 2024 में पूर्व प्रधानमंत्री और किसान नेता चौधरी चरण सिंह को भी मरणोपरांत भारत रत्न देकर भाजपा ने किसानों की राजनीति में उनके योगदान को मान्यता दी.