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लाडले का कीर्ति चक्र छाती से लगा रो पड़ी मां, जिसने भी...

होमवीडियोदेश लाडले का कीर्ति चक्र छाती से लगा रो पड़ी मां, जिसने भी देखा कलेजा मुंह को आ गया X लाडले का कीर्ति चक्र छाती से लगा रो पड़ी मां, जिसने भी देखा कलेजा मुंह को आ गया   नई दिल्ली: राष्ट्रपति भवन का अशोक हॉल सोमवार, 8 जून 2026 को उस वक्त अत्यंत भावुक हो उठा जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने शहीद लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी को मरणोपरांत देश के दूसरे सबसे बड़े शांतिकालीन वीरता पुरस्कार कीर्ति चक्र से सम्मानित किया. आर्मी सर्विस कॉर्प्स/1 सिक्किम स्काउट्स के जांबाज अधिकारी शशांक ने उत्तरी सिक्किम की एक उफनती नदी में गिरे अपने साथी अग्निवीर स्टीफन सुब्बा की जान तो बचा ली लेकिन खुद वीरगति को प्राप्त हो गए. जब शहीद का यह सर्वोच्च सम्मान लेने उनके पिता श्री जंग बहादुर तिवारी और मां श्रीमती नीता तिवारी आगे बढ़े तो मां अपने लाडले की शहादत और अदम्य साहस को याद कर फूट-फूटकर रो पड़ीं. इस हृदयविदारक क्षण में राष्ट्रपति ने भी बेहद संवेदनशीलता दिखाते हुए मां का कंधा थामकर उन्हें ढांढस बंधाया. देश के इस वीर सपूत का सर्वोच्च बलिदान भारतीय सेना के अटूट सौहार्द, निस्वार्थ सेवा और सर्वोच्च निष्ठा की एक अमर दास्तान बन गया है, जिसने हर भारतीय की आंख नम कर दी.<br>नई दिल्ली: राष्ट्रपति भवन का अशोक हॉल सोमवार, 8 जून 2026 को उस वक्त अत्यंत भावुक हो उठा जब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने शहीद लेफ्टिनेंट शशांक तिवारी को मरणोपरांत देश के दूसरे सबसे बड़े शांतिकालीन वीरता पुरस्कार कीर्ति चक्र से सम्मानित किया. आर्मी सर्विस कॉर्प्स/1 सिक्किम स्काउट्स के जांबाज अधिकारी शशांक ने उत्तरी सिक्किम की एक उफनती नदी में गिरे अपने साथी अग्निवीर स्टीफन सुब्बा की जान तो बचा ली लेकिन खुद वीरगति को प्राप्त हो गए. जब शहीद का यह सर्वोच्च सम्मान लेने उनके पिता श्री जंग बहादुर तिवारी और मां श्रीमती नीता तिवारी आगे बढ़े तो मां अपने लाडले की शहादत और अदम्य साहस को याद कर फूट-फूटकर रो पड़ीं. इस हृदयविदारक क्षण में राष्ट्रपति ने भी बेहद संवेदनशीलता दिखाते हुए मां का कंधा थामकर उन्हें ढांढस बंधाया. देश के इस वीर सपूत का सर्वोच्च बलिदान भारतीय सेना के अटूट सौहार्द, निस्वार्थ सेवा और सर्वोच्च निष्ठा की एक अमर दास्तान बन गया है, जिसने हर भारतीय की आंख नम कर दी. न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें। Source link

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samastipur pusa university fish and moti pearl farming tips

होमताजा खबरlifestyle एक ही तालाब में करें मछली के साथ मोती पालन, डबल इनकम के लिए पहुंचे यहां Last Updated:June 08, 2026, 21:33 IST Fish And Ship farming Tips: समस्तीपुर के किसानों के लिए खुशखबरी है. अब मछली पालन के साथ तालाबों में सीप पालन कर मोती उत्पादन से डबल मुनाफा कमा रहे हैं. डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (पूसा) किसानों को ट्रेनिंग और तकनीकी मदद देकर इस आधुनिक तकनीक से जोड़ रहा है. जानें कैसे एक ही तालाब से हो रही है दोगुनी कमाई. ख़बरें फटाफट समस्तीपुर: हर किसान का सपना होता है कि वह कम लागत में अधिक से अधिक आमदनी प्राप्त करे. इसी सोच को साकार करने की दिशा में मछली पालन के साथ शीप (सीप) पालन एक बेहतर विकल्प बनकर उभर रहा है. समस्तीपुर जिले में कई किसान इस तकनीक को अपनाकर अतिरिक्त आय अर्जित कर रहे हैं. विशेषज्ञों के अनुसार मछली पालन के लिए तैयार तालाबों में ही शिप पालन किया जा सकता है. जिससे अलग से जमीन या बड़े निवेश की आवश्यकता नहीं पड़ती. यही वजह है कि एक ही संसाधन का उपयोग कर किसान दो अलग-अलग स्रोतों से कमाई कर सकते हैं. शिप पालन के माध्यम से मोती उत्पादन भी संभव है. जिसकी बाजार में अच्छी मांग रहती है और किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त होता है. वैज्ञानिक किसानों को दे रहे प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोगडॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के मत्स्य पालन विभाग के वैज्ञानिक डॉ. मुकेश कुमार ने बताया कि किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय द्वारा शीप पालन को बढ़ावा दिया जा रहा है. उन्होंने कहा कि इच्छुक किसान विभाग से संपर्क कर प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं.विश्वविद्यालय में विभिन्न प्रकार के शिप उपलब्ध हैं, जिन्हें किसान लेकर इस कार्य की शुरुआत कर सकते हैं. वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को शिप के रखरखाव, भोजन, देखभाल और मोती उत्पादन की पूरी प्रक्रिया सिखाई जाती है. डॉ. कुमार के अनुसार शिप के अंदर विशेष प्रकार का न्यूक्लियस डालकर मनचाहे डिजाइन के मोती तैयार किए जा सकते हैं. यदि किसी किसान को गणपति, फूल या अन्य आकृति वाला मोती चाहिए तो उसी प्रकार का न्यूक्लियस शिप के भीतर स्थापित किया जाता है. 17 से 18 महीने में तैयार होता है मोतीवैज्ञानिक डॉ. मुकेश कुमार ने बताया कि मोती उत्पादन एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है. जिसमें धैर्य और तकनीकी जानकारी दोनों की आवश्यकता होती हैं. सामान्य तौर पर एक गुणवत्तापूर्ण मोती तैयार होने में 17 से 18 महीने का समय लगता है. इस दौरान शिप सूक्ष्म शैवाल, बैक्टीरिया और कार्बनिक पदार्थों को भोजन के रूप में ग्रहण करता है. उचित देखभाल और सही तकनीक अपनाने पर किसानों को अच्छा उत्पादन प्राप्त होता है. उन्होंने कहा कि शिप पालन न केवल अतिरिक्त आय का साधन है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा कर सकता है. विश्वविद्यालय लगातार किसानों को इस तकनीक से जोड़ने का प्रयास कर रहा है ताकि वे पारंपरिक मछली पालन के साथ मोती उत्पादन कर अपनी आर्थिक स्थिति को और मजबूत बना सकें. About the Author Amit ranjan मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Samastipur,Bihar Source link

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पश्चिम बंगाल में CBI को खुली छूट, लेकिन एक शर्त भी; सुवेंदु...

Last Updated:June 08, 2026, 20:37 IST पश्चिम बंगाल सरकार ने भ्रष्टाचार मामलों की जांच के लिए सीबीआई को फिर दी सामान्य सहमति सरकारी कर्मचारियों पर जांच से पहले सीबीआई को बंगाल सरकार से अनुमति लेनी होगी. (फाइल फोटो) कोलकाता. पश्चिम बंगाल सरकार ने सोमवार को भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों की जांच के लिए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) को फिर से “सामान्य सहमति” (जनरल कंसेंट) या “स्थायी अनुमति” बहाल करने की घोषणा की. इसके तहत अब सीबीआई राज्य में भ्रष्टाचार के मामलों की जांच शुरू करने के लिए हर बार राज्य सरकार से अलग-अलग अनुमति लेने की बाध्यता से मुक्त होगी. हालांकि, राज्य सरकार ने इस फैसले के साथ एक शर्त भी जोड़ी है. यदि किसी मामले में आरोप राज्य सरकार के किसी कर्मचारी के खिलाफ हों, तो सीबीआई को जांच शुरू करने से पहले राज्य सरकार की पूर्व अनुमति लेनी होगी. गौरतलब है कि वर्ष 2018 में तत्कालीन ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार ने सीबीआई को दी गई सामान्य सहमति वापस ले ली थी. इसके बाद पश्चिम बंगाल में किसी मामले की जांच शुरू करने के लिए सीबीआई के पास दो ही विकल्प बचे थे. पहला, प्रत्येक मामले में राज्य सरकार से अलग से अनुमति लेना और दूसरा, अदालत के आदेश के आधार पर जांच शुरू करना. अब नई पश्चिम बंगाल सरकार ने दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 (डीएसपीई एक्ट) की धारा 6 के तहत पूर्ववर्ती सरकार के फैसले को निरस्त करते हुए सीबीआई को फिर से सामान्य सहमति प्रदान कर दी है. उल्लेखनीय है कि 2018 में सामान्य सहमति वापस लिए जाने के बाद भी सीबीआई ने भ्रष्टाचार से जुड़े कई मामलों में एफआईआर दर्ज की थीं. उस समय तृणमूल कांग्रेस सरकार ने सीबीआई की इस कार्रवाई का विरोध करते हुए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया था. यहां तक कि कलकत्ता हाईकोर्ट द्वारा सीबीआई जांच के आदेश दिए जाने वाले मामलों में भी राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. इस दौरान केंद्र सरकार का तर्क था कि किसी भी राज्य सरकार की शक्तियां असीमित नहीं हैं और कोई भी राज्य सरकार आरोपियों को संरक्षण देने या राजनीतिक कारणों से जांच एजेंसियों के कामकाज में बाधा नहीं डाल सकती. About the Author Rakesh Ranjan Kumar राकेश रंजन कुमार को डिजिटल पत्रकारिता में 10 साल से अधिक का अनुभव है. न्यूज़18 के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने लाइव हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज़, जनसत्ता और दैनिक भास्कर में काम किया है. वर्तमान में वह h…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Kolkata,West Bengal Source link

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सुखोई लेकर पाकिस्‍तान में घुसा, ‘सिंदूर’ में फिर जमकर मचाई तबाही… भारत...

होमफोटोदेश सुखोई लेकर पाक में घुसा, जमकर मचाई तबाही… भारत के लाल को मिला वीर चक्र Last Updated:June 08, 2026, 19:34 IST पाकिस्तान की सीमा में घुसकर तबाही मचाने वाले जांबाज सुखोई-30 एमकेआई पायलट ग्रुप कैप्टन मनीष अरोड़ा को वीर चक्र से सम्मानित किया गया है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान दुश्मन के घर में घुसकर सटीक एयरस्ट्राइक करने वाले मनीष अरोड़ा ने देश की सुरक्षा के लिए असाधारण वीरता का प्रदर्शन किया था. शौर्य चक्र विजेता इस वीर योद्धा ने पाकिस्तानी एयर डिफेंस को छकाते हुए खतरनाक मिशन को अंजाम दिया, जिसके लिए देश ने उन्हें इस बड़े सैन्य सम्मान से नवाजा है. भारतीय वायुसेना के जांबाज सुखोई-30 एमकेआई (Su-30MKI) पायलट ग्रुप कैप्टन मनीष अरोड़ा को उनकी अदम्य वीरता के लिए वीर चक्र से नवाजा गया है. मनीष अरोड़ा वायुसेना के उन चुनिंदा और जांबाज लड़ाकू पायलटों में शामिल हैं, जिन्होंने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान अदम्य साहस का परिचय देते हुए पाकिस्तान की सीमा में घुसकर दुश्मन के ठिकानों को नेस्तनाबूद किया था. इस बेहद खतरनाक हवाई हमले को सफलतापूर्वक अंजाम देने और देश की संप्रभुता की रक्षा करने के लिए उन्हें यह सम्मान मिला है. पूर्व में शौर्य चक्र पा चुके ग्रुप कैप्टन मनीष अरोड़ा ने पाकिस्तान में घुसकर हवाई स्ट्राइक करने वाले इस पराक्रम से देश का गौरव बढ़ाया है. न्यूज़18 को गूगल पर अपने पसंदीदा समाचार स्रोत के रूप में जोड़ने के लिए यहां क्लिक करें। Source link

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darbhanga mithilanchal traditional beera saag preservation and taste recipe

Last Updated:June 08, 2026, 18:34 IST Mithilanchal Traditional Beera Saag Recipe: तीखा, चटपटा और मिट्टी की सोंधी खुशबू वाला मिथिलांचल का पारंपरिक बीरा साग आज भी लोगों को माँ-नानी के हाथों के स्वाद की याद दिलाता है. जानिए इस साग की वो अनूठी तकनीक, जिससे इसे सुखाकर सालभर खाने के लिए सुरक्षित रखा जाता है. यह चावल-लिट्टी के साथ क्यों खास है जानें. साथ ही इसको बनाने की विधि भी खास है. दरभंगा: मिथिलांचल के लोग खाने के बड़े शौकीन होते हैं. बात अगर साग की हो तो यहां पर कई वैरायटी के मिल जाएंगे. यहां हर मौसम का अपना साग है. चने का साग, बथुआ, पालक, सरसों. लेकिन समस्या ये कि ये साग सीजनल हैं. मन किया और मौसम नहीं, तो क्या करें? मिथिला की गृहणियों ने इसका देसी जुगाड़ निकाल लिया है ‘बीरा’. यह साग को सालभर खाने का पारंपरिक तरीका है. इसे बनाकर रख लीजिए, फिर बेमौसम भी आपके थाली से साग का स्वाद गायब नहीं होगा. बीरा क्या है?बीरा यानी सुखाया और संरक्षित किया हुआ साग. पुराने समय में जब फ्रिज नहीं थे, तब मिथिलांचल में माँ-दादी साग को सुखाकर, तलकर या मसाले में पका कर डिब्बों में रख देती थीं. बरसात में जब खेत-खलिहान में साग नहीं मिलता, तब यही बीरा चावल-रोटी का स्वाद दोगुना कर देता था. बीरा बनाने की आसान विधिमिथिला की गृहणी आशा देवी बताती है कि सबसे पहले मनपसंद साग लें. जैसे बथुआ, सरसों या चना का साग. फिर साग को हल्का फ्राई कर के रख लें. अब तड़का तैयार करें. मिक्सी में सरसों और लहसुन के साथ काली मिर्च का पेस्ट बना लें. कढ़ाई को गैस पर चढ़ाएं, थोड़ा सरसों का तेल डालें. तेल गरम हो तो सरसों-लहसुन का पेस्ट डालकर भूनें. खुशबू आने लगे तो हल्दी पाउडर, लाल मिर्च पाउडर, स्वादानुसार नमक और एक बारीक कटा टमाटर डाल दें. मसाले को धीमी आँच पर तब तक भूनें जब तक तेल किनारे न छोड़ दे. फिर जरूरत भर पानी डालें और ग्रेवी तैयार करें. पानी उबल जाए तो उसमें पहले से फ्राई किया हुआ या सुखाया हुआ बीरा डाल दें. 5 मिनट पकाएँ. लीजिए, मिथिलांचल का स्पेशल बीरा तैयार है. किसके साथ खाएं?गरम-गरम बीरा चावल के साथ अमृत लगता है. रोटी, पराठे या लिट्टी के साथ भी इसका जवाब नहीं. तीखा, चटपटा और मिट्टी की सोंधी खुशबू वाला यह बीरा आपको नानी-दादी के दौर में ले जाएगा. तो अगली बार जब मौसम का साग बाजार में खूब दिखे, तो थोड़ा ज्यादा खरीद लें. बीरा बनाकर रख लें. फिर पूरा साल बेमौसम भी आपके किचन से साग की महक नहीं जाएगी. यही है मिथिलांचल का स्वाद, जो कभी फीका नहीं पड़ता. About the Author Amit ranjan मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Darbhanga,Bihar Source link

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कांग्रेस के रहते ‘इंडिया’ अलायंस का कोई फ्यूचर नहीं; राहुल गांधी पर...

होमताजा खबरदेश कांग्रेस के रहते ‘इंडिया’ अलायंस का कोई फ्यूचर नहीं, राहुल पर बरसे AAP नेता Last Updated:June 08, 2026, 17:33 IST सोमनाथ भारती ने कहा कि विभिन्न राज्यों में कांग्रेस का रवैया क्षेत्रीय दलों के प्रति अलग-अलग रहा है और कई जगहों पर उसने विरोधी दलों का अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन किया है. उन्होंने कहा कि जहां भी कोई क्षेत्रीय पार्टी मजबूत होती है, वहां कांग्रेस उसे कमजोर करने की कोशिश करती है. सोमनाथ भारती ने कांग्रेस पर निशाना साधा. नई दिल्ली. आम आदमी पार्टी (आप) के नेता सोमनाथ भारती ने कहा कि कांग्रेस इंडिया ब्लॉक के नेतृत्व को संभालने में विफल रही है. उन्होंने दावा किया कि जब तक कांग्रेस नेतृत्व करेगी तब तक इंडिया गठबंधन का कोई भविष्य नहीं है. आम आदमी पार्टी के नेता सोमनाथ भारती ने आईएएनएस से कहा, “भारतीय गठबंधन एक मिशन के लिए बनाया गया था. जिस तरह भाजपा ने एनडीए बनाया, उसी तरह हमने इंडिया गठबंधन बनाया था. लेकिन हर गठबंधन का एक धर्म होता है. धर्म यह है कि जो अंदर है, वही बाहर भी दिखना चाहिए. सार्वजनिक रूप से कहा गया था कि हम एक गठबंधन के रूप में लड़ेंगे और एक-दूसरे का समर्थन करेंगे, लेकिन पर्दे के पीछे कांग्रेस भाजपा का साथ देती नजर आ रही थी.” सोमनाथ भारती ने आगे कहा, “लोकसभा चुनाव के दौरान दिल्ली में 4-3 का फार्मूला तय हुआ था. जो 3 सीटें कांग्रेस को मिलीं, उनके लिए अरविंद केजरीवाल ने खुलकर प्रचार किया. वहीं, जो 4 सीटें आम आदमी पार्टी को मिलीं, उनके लिए राहुल गांधी सहित कांग्रेस का कोई नेता वोट मांगने नहीं पहुंचा. ऐसे में यह कैसा गठबंधन है? दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान तो खुलकर बात सामने आ गई जब शून्य सीट जीतने के बाद कहा कि आम आदमी पार्टी हार गई. इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि कांग्रेस को गठबंधन धर्म निभाना नहीं आता है?” सोमनाथ भारती ने आरोप लगाया कि जब राहुल गांधी वोट चोरी की बात करते हैं तो दिल्ली को छोड़ देते हैं. जब तक इंडिया गठबंधन का कांग्रेस नेतृत्व करेगी, तब तक इस गठबंधन का कोई भविष्य नहीं है. इसके पहले सोमनाथ भारती ने कहा था कि कांग्रेस का रवैया ऐसा है कि वह चाहती है कि राजनीति केवल भाजपा और कांग्रेस के बीच सीमित रह जाए और अन्य दल खत्म हो जाएं, ताकि भविष्य में दोनों के बीच बारी-बारी से सत्ता चलती रहे. उन्होंने आरोप लगाया कि जिस तरह कांग्रेस ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ व्यवहार किया, उसी तरह पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के साथ भी किया. उन्होंने कहा कि विभिन्न राज्यों में कांग्रेस का रवैया क्षेत्रीय दलों के प्रति अलग-अलग रहा है और कई जगहों पर उसने विरोधी दलों का अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन किया है. उन्होंने कहा कि जहां भी कोई क्षेत्रीय पार्टी मजबूत होती है, वहां कांग्रेस उसे कमजोर करने की कोशिश करती है. दिल्ली में आम आदमी पार्टी और पश्चिम बंगाल में टीएमसी इसका उदाहरण है. सोमनाथ भारती ने कहा कि कांग्रेस की इस तरह की नीतियों का अनुभव उनकी पार्टी ने खुद किया है, इसलिए उन्हें इसका अंदाजा है. About the Author Rakesh Ranjan Kumar राकेश रंजन कुमार को डिजिटल पत्रकारिता में 10 साल से अधिक का अनुभव है. न्यूज़18 के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने लाइव हिन्दुस्तान, दैनिक जागरण, ज़ी न्यूज़, जनसत्ता और दैनिक भास्कर में काम किया है. वर्तमान में वह h…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : New Delhi,Delhi Source link

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Solar energy series 6th story: solar power in winter| सौर ऊर्जा-6: गर्मी...

Last Updated:June 08, 2026, 16:29 IST Solar Energy Series 6th Story: न्‍यूज18हिंदी की सौर ऊर्जा-सोलर पैनल्‍स सीरीज में आज पढ़िए छठी स्टोरी. ‘हमें गर्मियों में तो भरपूर धूप मिलती है, लेकिन सर्दियों में सोलर पैनल कैसे काम करते हैं? अगर कोई घर पूरी तरह से सोलर पावर (सौर ऊर्जा) पर निर्भर है, तो क्या उसे सर्दियों में भी पर्याप्त बिजली मिल पाएगी? आइए जानते हैं सीईईडब्ल्यू एक्सपर्ट भावना त्यागी की राय सौर ऊर्जा-6: गर्मी तो ठीक! सर्दी में सोलर पैनल कितनी बिजली देते हैं, बस सौर-पॉवर से चल जाता है खर्च? Solar Energy series 6th story: जब तक सूरज रहेगा, सौर ऊर्जा रहेगी. यही वजह है कि कभी न खत्म होने वाली ऊर्जा को इस्तेमाल करने के लिए लोगों को सलाह दी जा रही है. सरकार भी हर घर सूर्य बिजली योजना के तहत लोगों को सोलर पैनल्स लगवाने की सलाह दे रही है ताकि सौर बिजली में देश आत्मनिर्भर हो सके. हर किसी का अपना रूफटॉप सोलर सिस्टम हो और हर किसी की अपनी खुद की बिजली हो. न बिजली कटौती हो और न बिजली के बिल का झंझट हो. हालांकि गर्मी में तो आसमान में धूप खिली रहती है और सुबह से लेकर शाम तक सोलर पैनल्स इतनी बिजली पैदा कर देते हैं कि एक घर में पूरी इस्तेमाल भी नहीं हो पाती, लेकिन सर्दियों में क्या? ठंडों में जब सूरज राजा भी दुबके रहते हैं और आसमान में अंधेरा और धुंध छाया रहता है तो ये सोलर पैनल्स कैसे काम करते हैं? क्या ये बिजली बनाते हैं? क्या इस बिजली से पूरे घर का खर्च चल जाता है? अगर कोई घर सिर्फ सोलर पैनल्स पर निर्भर हो जाए तो उस घर में 24 घंटे रोशनी रह सकती है? ‘सौर ऊर्जा-सोलर पैनल’ को लेकर चलाई जा रही News18hindi की सीरीज की छठी कहानी में आइए काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर की प्रोग्राम लीड भावना त्यागी से जानते हैं सभी सवालों के जवाब विस्तार से… ‘हमें गर्मियों में तो भरपूर धूप मिलती है, लेकिन सर्दियों में सोलर पैनल कैसे काम करते हैं? भावना त्यागी कहती हैं, ‘सोलर पैनल सर्दियों में भी काम करते हैं क्योंकि वे बिजली बनाने के लिए धूप (सूर्य की रोशनी) का इस्तेमाल करते हैं, न कि उसकी गर्मी का. हालांकि सर्दियों में दिन छोटे होते हैं और धूप भी कमजोर होती है, इसके बावजूद सोलर पैनल बिजली बना सकते हैं, लेकिन उसकी मात्रा कम हो जाती है.’ अगर कोई घर पूरी तरह से सोलर पावर (सौर ऊर्जा) पर निर्भर है, तो क्या उसे सर्दियों में भी पर्याप्त बिजली मिल पाएगी? About the Author प्रिया गौतमSenior Correspondent Priya Gautam is an accomplished journalist currently working with Hindi.News18.com with over 14 years of extensive field reporting experience. Previously worked with Hindustan times group (Hindustan Hindi) and …और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Delhi,Delhi,Delhi ‘हमें गर्मियों में तो भरपूर धूप मिलती है, लेकिन सर्दियों में सोलर पैनल कैसे काम करते हैं? भावना त्यागी कहती हैं, ‘सोलर पैनल सर्दियों में भी काम करते हैं क्योंकि वे बिजली बनाने के लिए धूप (सूर्य की रोशनी) का इस्तेमाल करते हैं, न कि उसकी गर्मी का. हालांकि सर्दियों में दिन छोटे होते हैं और धूप भी कमजोर होती है, इसके बावजूद सोलर पैनल बिजली बना सकते हैं, लेकिन उसकी मात्रा कम हो जाती है.’ अगर कोई घर पूरी तरह से सोलर पावर (सौर ऊर्जा) पर निर्भर है, तो क्या उसे सर्दियों में भी पर्याप्त बिजली मिल पाएगी? भावना बताती हैं, ‘कोई भी घर हर समय अपनी पूरी बिजली के लिए सिर्फ सोलर पैनल पर निर्भर नहीं रह सकता है, क्योंकि सोलर पैनल सिर्फ दिन में यानी धूप होने पर ही बिजली बनाते हैं. चौबीसों घंटे (24/7) लगातार बिजली पाने के लिए, सोलर सिस्टम को जरूरत से काफी बड़ा लगाना होगा. साथ ही, इसके साथ बैटरी लगानी होगी ताकि दिन में बनने वाली अतिरिक्त बिजली को स्टोर किया जा सके और उसका इस्तेमाल रात में या कम धूप वाले दिनों में किया जा सके.’ यह सोलर सिस्टम और सोलर एनर्जी बैकअप भी पॉवर बैकअप की तरह ही काम करता है, जैसे दिनभर बिजली आती है और न आने पर इन्वर्टर बैटरी के स्टोर बिजली को घर को सप्लाई करता है, ठीक उसी तरह सोलर ऊर्जा से बनी बिजली भी बैटरी में स्टोर हो जाती है और जरूरत पड़ने पर घर के काम आती है. सर्दियों में क्या आती है मुख्य समस्या? सर्दियों में दिन छोटे होते हैं और सूर्य की किरणें अपेक्षाकृत कम तीव्र होती हैं. इसके कारण सोलर पैनल गर्मियों की तुलना में कम बिजली पैदा करते हैं. उत्तर भारत में दिसंबर-जनवरी के दौरान कई दिनों तक कोहरा और बादल भी बने रह सकते हैं, जिससे उत्पादन और घट जाता है. बारिश के मौसम में भी गर्मी के मुकाबले सोलर बिजली उत्पादन कमजोर पड़ जाता है. फिर लोग पूरे साल सोलर से कैसे बिजली लेते हैं? सोलर पैनल से पैदा बिजली के इस्तेमाल के लिए आमतौर पर तीन चीजों का ध्यान रखा जाता है. भारत में कितना असर पड़ता है?भारत के अधिकांश हिस्सों में सर्दियों में सोलर उत्पादन गर्मियों की तुलना में लगभग 20% से 40% तक कम हो सकता है. हालांकि ठंडा मौसम पैनलों की कार्यक्षमता बढ़ाता है, और ऐसे पैनल ज्यादा दिनों तक चलते हैं लेकिन कम धूप और छोटे दिन कुल उत्पादन को घटा देते हैं. मान लीजिए किसी घर में 5 किलोवाट का सोलर सिस्टम है तो गर्मियों में यह रोजाना लगभग 20–25 यूनिट बिजली पैदा कर सकता है. जबकि सर्दियों में यही उत्पादन घटकर लगभग 12–18 यूनिट प्रतिदिन रह सकता है. हालांकि कुछ जगहों पर जहां धूप ज्यादा और अच्छी खिलती है वहां अंतर आ सकता है. खबरें पढ़ने का बेहतरीन अनुभव QR स्कैन करें, डाउनलोड करें News18 ऐप या वेबसाइट पर जारी रखने के लिए यहां क्लिक करें login Source link

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‘हमें भी एनडीए में शामिल होना है’, TMC के 20 बागी सांसदों...

होमताजा खबरदेश ‘हमें भी एनडीए में शामिल होना है’, TMC के 20 बागी सांसदों का ओम बिरला को पत्र Last Updated:June 08, 2026, 15:28 IST नई दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस के भीतर बड़ी राजनीतिक हलचल की खबर है. दावा किया जा रहा है कि पार्टी के 20 असंतुष्ट सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र भेजकर अलग गुट बनाने की मांग की है. बताया जा रहा है कि इस पहल का नेतृत्व काकोली घोष दस्तीदार कर रही हैं. इससे पहले बागी सांसदों ने केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर एक गोपनीय बैठक की, जिसमें सुवेंदु अधिकारी के मौजूद रहने की भी चर्चा है. जगदीश चंद्र बसुनिया, अरुप चक्रवर्ती, प्रसून बनर्जी, शर्मिला सरकार और खलीलुर रहमान समेत कई नेताओं के नाम सामने आए हैं, जबकि देव, पार्थ भौमिक और जून माल्या को लेकर भी अटकलें लगाई जा रही हैं. हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है. पश्चिम बंगाल विधानसभा के बाद लोकसभा में टीएमसी में टूट. नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल के बाद नई दिल्ली में तृणमूल कांग्रेस में बड़ी टूट होने का प्रोसेस शुरू हो गया है. तृणमूल कांग्रेस के 20 असंतुष्ट सांसदों ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पत्र भेजा है और उन्होंने अलग गुट बनाने का प्रस्ताव दिया है. बताया जा रहा है कि इस गुट का नेतृत्व सांसद काकोली घोष दस्तीदार कर रही हैं. दिलचस्प बात यह है कि यह बगावत ऐसे समय में आया है जब तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी नई दिल्ली में ही मौजूद हैं. उनके साथ पार्टी महासचिव अभिषेक बनर्जी भी हैं. इन सांसदों के पास दो विकल्प हैं. या तो ये टीएमसी से अलग होकर बीजेपी में शामिल हो जाएं या फिर विधानसभा की तरह अलग गुट बनाकर अलग हों. बताया जा रहा है कि तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों ने लोकसभा स्पीकर को पत्र भेजने से पहले दिल्ली के मोतीलाल नेहरू मार्ग पर स्थित केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के सरकारी आवास पर सोमवार को एक बेहद गोपनीय बैठक की, जिसमें पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी भी मौजूद रहे. ये हो सकते हैं बागी सांसद लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को सौंपे गए पत्र में जगदीश चंद्र बसुनिया, अरुप चक्रवर्ती, प्रसून बनर्जी, शर्मिला सरकार और खलीलुर रहमान जैसे नेताओं के नाम प्रमुखता से सामने आ रहे हैं. वहीं काकोली घोष दस्तीदार, पार्थ भौमिक, अभिनेता-राजनेता देव और जून माल्या को लेकर भी असंतोष की अटकलें लगाई जा रही हैं. तृणमूल सांसद सुखेंदु शेखर राय ने पार्टी से इस्तीफा दिया, राज्यसभा सदस्य पद छोड़ा तृणमूल कांग्रेस को बड़ा झटका देते हुए वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर राय ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता और राज्यसभा दोनों से इस्तीफा दे दिया. पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शामिल राय का यह कदम ऐसे समय आया है, जब संगठन के भीतर लंबे समय से असंतोष और गुटबाजी की चर्चा चल रही है. उनके इस्तीफे ने संकेत दिया है कि पार्टी के अंदरूनी मतभेद अब संसदीय स्तर तक पहुंच चुके हैं. राय ने अपने इस्तीफे में शासन और संगठन में बढ़ते भ्रष्टाचार तथा जनता के बढ़ते असंतोष को वजह बताया. उन्होंने आरजी कर अस्पताल दुष्कर्म-हत्याकांड मामले में पार्टी के रुख पर भी लगातार सवाल उठाए थे. उनका इस्तीफा उस बगावत के कुछ दिन बाद आया है, जिसमें 58 विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ जाकर रिताब्रता बनर्जी का समर्थन किया था. विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर उभरी दरारें अब और गहरी होती दिखाई दे रही हैं. About the Author Abhishek Kumar अभिषेक कुमार News18 की डिजिटल टीम में बतौर एसोसिएट एड‍िटर काम कर रहे हैं. वे यहां बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तसीगढ़, उत्तराखंड की राजनीति, क्राइम समेत तमाम समसामयिक मुद्दों पर लिखते …और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Delhi,Delhi,Delhi Source link

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sitamarhi pupri farmers getting huge profit from himsagar mango cultivation tips

होमताजा खबरकृषि सीतामढ़ी में इस आम की खेती से मालामाल हो रहे किसान, हर साल बंपर कमाई निश्चित Last Updated:June 08, 2026, 14:21 IST Himsagar Mango Cultivation Sitamarhi Tips: सीतामढ़ी के पुपरी में पारंपरिक खेती छोड़ किसान अब हिमसागर आम की बागवानी से बंपर मुनाफा कमा रहे हैं. मालदा-बम्बई से भी मीठे और पूरी तरह रेशा रहित इस आम की खासियत यह है कि यह बिना किसी गैप के हर साल फलता है. जानिए प्रगतिशील किसान पप्पू ठाकुर से इस आम की खासियत और पौधे मिलने की जगह. सीतामढ़ी: सीतामढ़ी जिले में पारंपरिक खेती से अलग हटकर किसान अब आम की बागवानी में नए प्रयोग कर रहे हैं. जिले के पुपरी ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों में इन दिनों हिमसागर प्रजाति के आम की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही है. अपनी मनमोहक खुशबू, रसीले स्वाद और पूरी तरह से रेशा रहित गूदे के कारण इस आम ने स्थानीय बाजार में अपनी एक खास और मजबूत पहचान बना ली है. क्षेत्र के प्रगतिशील किसान पप्पू ठाकुर पिछले कुछ समय से करीब डेढ़ एकड़ की भूमि पर हिमसागर आम के बगीचे की सफल खेती कर रहे हैं. उनके इस प्रयास को देखकर आसपास के अन्य किसान भी अब इस खास किस्म के आम के पौधे लगाने की ओर आकर्षित हो रहे हैं. हिमसागर से हर सीजन में निश्चित आमदनी​हिमसागर आम की सबसे बड़ी यूएसपी (विशेषता) इसका हर साल फल देना है. आमतौर पर मालदा और बम्बई जैसी आम की लोकप्रिय किस्में एक साल के अंतराल (गैप) पर फलती हैं. जिसे किसान ऑफ-ईयर और ऑन-ईयर कहते हैं. लेकिन हिमसागर के साथ ऐसा नहीं है. दसहरी और अम्रपाली की तरह ही हिमसागर के पेड़ों में भी नियमित रूप से हर वर्ष बंपर फल आते हैं. लगातार उत्पादन होने के कारण किसानों को हर सीजन में निश्चित आमदनी होती है. जिससे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है. इस आम का पौधा लगाने के बाद महज पांच साल के भीतर ही फल देना शुरू कर देता है, जो व्यावसायिक दृष्टिकोण से किसानों के लिए बेहद फायदेमंद सौदा साबित हो रहा है. दिखने में बम्बई जैसा, खाने में मालदा से सौ गुना बेहतर​स्वाद और दिखावट के मामले में भी यह आम बेहद अनूठा और लाजवाब है. यह दिखने में बम्बई आम जैसा होता है, लेकिन इसका गूदा अंदर से एकदम गहरा और लाल होता है. स्थानीय किसानों का दावा है कि खाने के मामले में यह मालदा और बम्बई आम की तुलना में सौ गुना बेहतर, अत्यधिक मीठा और स्वादिष्ट है. इसके फल का आकार भी काफी अच्छा होता है. लगभग एक किलोग्राम वजन में चार से पांच आम चढ़ते हैं. इसका मतलब है कि एक आम का आकार इतना पर्याप्त होता है कि कोई एक व्यक्ति इसे खा ले तो उसका मन पूरी तरह तृप्त हो जाए. स्वाद के साथ-साथ यह स्वास्थ्य के लिहाज से भी काफी सेहतमंद और फायदेमंद माना जाता है. यहां ले सकते हैं हिमसागर के पौधे​किसानों के लिए मुनाफे को बढ़ाने के लिए अब क्षेत्र में ही बड़े पैमाने पर इसकी ग्राफ्टिंग (कलम तैयार करना) का कार्य भी शुरू कर दिया गया है. किसान पप्पू ठाकुर के अनुसार, जो भी लोग इस बेहतरीन प्रजाति की बागवानी करना चाहते हैं, उनके लिए उनके यहां हिमसागर के उन्नत पौधे भी आसानी से उपलब्ध हैं. इस प्रकार, सीतामढ़ी के पुपरी में हिमसागर आम न केवल अपनी मिठास से लोगों का दिल जीत रहा है, बल्कि नियमित और बेहतर उत्पादन के जरिए किसानों के जीवन में समृद्धि की नई मिठास घोल रहा है. कृषि क्षेत्र में इस तरह के आत्मनिर्भर प्रयास निश्चित रूप से सराहनीय हैं. About the Author Amit ranjan मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें News18 न्यूजलेटर अब ईमेल पर इनसाइड स्‍टोर‍ीज खबरों के पीछे की खबर अब आपके इनबॉक्‍स में सबमिट करें Location : Sitamarhi,Bihar Source link

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न शादी, न अपना परिवार… राजस्थान के इस शख्स के हैं 60...

पाली: कहते हैं कि एक-दो बच्चों की परवरिश करना और उन्हें संभालना ही आज के दौर में सबसे बड़ी जिम्मेदारी माना जाता है. लेकिन क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि इस दुनिया में और खासकर हमारे राजस्थान में एक ऐसा व्यक्ति भी है, जिसके एक नहीं, दो नहीं, बल्कि पूरे 60 हजार बच्चे हैं! जी हां, चौंकिए मत. यह बिल्कुल सच है. और ये अनोखा पिता अपने इन 60 हजार बच्चों को सिर्फ पालता ही नहीं है, बल्कि उनसे बेइंतहा मोहब्बत करता है, उनका पूरा ख्याल रखता है. यह हम नही कहते यह कहते है खुद पर्यावरण प्रेमी रविंद्र काबरा जो इनको अपने बच्चो की तरह ही केयर करते है. दिन में 10 घंटे इनकी देखरेख करते है. इनका मानना है कि अगर हमें एक हेल्दी जीवन जीना है, तो हमें प्रकृति से जुड़ना होगा और पौधों को अपने बच्चों की तरह प्यार देना होगा. आज के इस दौर में जहां लोग बड़ी-बड़ी गाड़ियों और सुख-सुविधाओं को लग्जरी मानते हैं, वहीं इस शख्स ने ‘ग्रीनरी’ को ही अपनी असली लग्जरी मान लिया है. पर्यावरणविद रविंद्र काबरा ने बताया, ग्रीनरी के लिए काम करते हुए मुझे 55 साल हो गए. उन्हे इसकी प्रेरणा उनके दादा जी से मिली क्योंकि वह भी इस तरह से 5-5 घंटे गार्डनिंग को दिया करते थे. पहले 45 प्लांट से इसकी शुरूअता की थी ओर आज मेरे पास 60 हजार बच्चे (प्लांट्स) हो गए है. जब 60,000 हो गए तो मैंने पर्यावरण को महत्ता देते हुए जोधपुर के मेड़तीगेट से अपना पूरा गार्डन जवाई बांध बीसलपुर ब्रिज पर शिफ्ट किया है. इसे ‘गोकुल: द वैली ऑफ फ्लावर्स’ का नाम दिया गया. अब सपने में ही मुझे मेरे बच्चे दिखाई देते है. 400 से भी ज्यादा किस्म के प्लांट्स यहां 400 किस्म के प्लांट्स हैं. जिनमें कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, जापान, उत्तरप्रदेश, साउथ और विदेशी किस्मों के अलावा भारत भर के प्लांट्स मौजूद हैं. यहां 35 कलर की लिलि, 80 कलर्स के चंपा, 70 कलर में बोगनवेलिया, 150 प्रकार के अडेनियम, 50,000 सीजनल, 70 प्रकार के फ्रूट्स और 500 प्रकार के बड़े पेड़ हैं. हाइड्रेजिया, ट्यूलिप, हेलिकेर्निया, बर्ड ऑफ पैरेडाइज सहित बड़े प्लांट्स में लेजेस्टोनिया, स्पेथोडिया, बॉटल ब्रश हैं. आम, जामुन, अमरूद, संतरा, मौसमी, आंवला, नींबू, चीकू, शहतूत, सीताफल सहित प्लांट्स वैरायटियां हैं. ये पर्यावरण को दुरुस्त बनाने के साथ विशेष प्रकार की जीव जंतुओं को सेफ्टी, भोजन और सुकून दे रहे हैं. मां जैसे बच्चो की समझ जाते है हर परेशानी एक मां जैसे अपने बच्चों से जडती है तो उनकी हर तकलीफ और परेशानी को समझती है काबरा का भी अपने बच्चो से कुछ ऐसा ही कनेक्शन है. काबरा का कहना है कि मेने आज तक न तो कभी गूगल किया न ही कोई किताब पढी है बच्चो ने ही अपने हर जरूरत को बताया है और आज मैं इतना कह सकता हूं कि इनकी छोटी सी और बडी तकलीफ पांच मिनट इनके पास आकर खडा होता हूं तो यह खुद अपने आप अपने भाव प्रकट करते है. जोधपुर से पाली के जवाई तक का सफर काबरा कहते है कि वह बरसों पूर्व जंवाई बांध फोटोग्राफी करने जाता था. उसी समय ये जगह मुझे पसंद आ गई थी. जब जोधपुर में प्लांट्स बढ़े तो मैंने यहां करीब डेढ़ लाख स्क्वायर फीट में मेंटेन करना शुरू किया. यहां आने के बाद पता चला कि यहां जमीन में एक फीट के नीचे ग्रेनाइट, मिट्टी कम मूंगिया अधिक है. इसको डवलप करना मुश्किल था. एक साल की मेहनत के बाद ये तैयार हुआ. इन प्लांट्स के वेस्ट से हर दिन 25 किलो से अधिक ऑर्गेनिक खाद भी मिल जाती है. री-साइकिल टेक्निक यूज करने के बाद भी हर माह 60 हजार का खर्चा आता है. 80 प्रतिशत तक पानी मै खुद ही प्लांट्स को पिलाता हूं. Source link

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