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Income Tax Notice: गुजरात हाई कोर्ट ने एक मामले में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को बड़ा झटका दिया है. कोर्ट ने एक ऐसी मृत महिला को भेजे गए टैक्स नोटिस को खारिज कर दिया है जिसकी मौत 5 साल पहले हो चुकी थी. डिपार्टमेंट ने जमीन बिक्री पर कैपिटल गेन्स टैक्स के असेसमेंट के लिए यह नोटिस भेजा था. महिला के परिवार ने इसे कोर्ट में चुनौती दी थी. कोर्ट ने माना कि डिपार्टमेंट ने गलत सेक्शन का इस्तेमाल किया है.
मौत के 5 साल बाद महिला को मिला Income Tax नोटिस, गुजरात हाई कोर्ट ने किया रद्द. (फाइल फोटो)
अहमदाबाद: गुजरात हाई कोर्ट ने इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की एक बड़ी लापरवाही को उजागर किया है. कोर्ट ने एक ऐसी महिला के खिलाफ टैक्स नोटिस को रद्द कर दिया है जिसकी मौत पांच साल पहले ही हो चुकी थी. यह मामला नानी दमन के भीमपोर गांव की रहने वाली पद्माबेन त्रिवेदी का है. उन्होंने साल 2009 में अपनी जमीन बेची थी. इसके बाद उन्होंने 2010-11 में अपना इनकम टैक्स रिटर्न फाइल किया था. मई 2012 में पद्माबेन की मौत हो गई थी. लेकिन इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने 30 मार्च 2017 को उन्हें एक नोटिस भेज दिया. यह नोटिस लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स की दोबारा कैलकुलेशन के लिए था. यह रिटर्न फाइल करने के सात साल बाद असेसमेंट खोलने के लिमिटेशन पीरियड का आखिरी दिन था. इसके बाद महिला के परिवार ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी.
इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने किस आधार पर भेजा था टैक्स नोटिस?
पद्माबेन ने 2009 में 13,626 वर्ग मीटर जमीन एक कंपनी को 92.6 लाख रुपये में बेची थी. एक रजिस्टर्ड वैल्युअर ने 1981 के रेट के आधार पर इसका फेयर मार्केट वैल्यू तय किया था. तब इसका रेट 81 रुपये प्रति वर्ग मीटर और कुल वैल्यू 11 लाख रुपये थी. पद्माबेन ने अपने रिटर्न में 22.9 लाख रुपये का लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन दिखाया था. लेकिन डिपार्टमेंट का दावा था कि 1981 की वैल्यू को बहुत ज्यादा बढ़ाकर दिखाया गया है. असेसिंग ऑफिसर ने दावा किया कि उस समय का रेट सिर्फ 1 रुपये प्रति वर्ग मीटर था. उन्होंने डील से होने वाले कैपिटल गेन को 69.6 लाख रुपये बताया.
मृत महिला के परिवार ने कोर्ट में क्या दलील देकर जीता यह केस?
जुलाई 2017 में पद्माबेन के रिश्तेदारों ने असेसमेंट रीओपनिंग नोटिस का जवाब दिया. उन्होंने इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से उनकी ओरिजिनल रिटर्न पर विचार करने का अनुरोध किया. उसी साल उनके परिवार ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. परिवार ने एक मरे हुए व्यक्ति को नोटिस भेजने की वैधता पर सवाल उठाया. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यह नोटिस एक ऐसे कानूनी प्रावधान पर आधारित है जो इस मामले में लागू नहीं होता है. यह नियम 2012 से पहले के असेसमेंट पर लागू नहीं किया जा सकता था.
गुजरात हाई कोर्ट के जजों की बेंच ने इस मामले पर क्या फैसला सुनाया?
जस्टिस ए एस सुपेहिया और जस्टिस वी डी नानावती की डिवीजन बेंच ने इस मामले की सुनवाई की. हाई कोर्ट की बेंच ने याचिकाकर्ता की दलीलों से सहमति जताई. कोर्ट ने माना कि डिपार्टमेंट ने गलत तरीके से सेक्शन 55A का इस्तेमाल किया है. कोर्ट ने कहा, ‘एक्ट के सेक्शन 55A(a) के प्रावधान लागू नहीं होंगे’. कोर्ट ने बताया कि जमीन का फेयर मार्केट वैल्यू रजिस्टर्ड वैल्युअर की रिपोर्ट के आधार पर तय किया गया है. यह असेसिंग ऑफिसर द्वारा तय की गई वैल्यू से काफी कम है. हालांकि बेंच ने एक सवाल खुला छोड़ दिया है. अगर परिवार नोटिस का जवाब देता है तो क्या मृत व्यक्ति के खिलाफ टैक्स कार्यवाही जारी रह सकती है.
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