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Inspiring story of Metro man E Sreedharan: देश की रफ्तार बढ़ाने वाले...


Inspiring story of Metro man E Sreedharan: आज हम मेट्रो में सफर करते हैं और 5 म‍िनट की भी देरी बर्दाश्‍त नहीं करते. वहीं जब मेट्रो नहीं थी तो ट्रेनों में घंटों की लेट-लतीफी झेलते थे. द‍िल्‍ली की सड़कों पर भीषण जाम झेलते थे. क्‍या आपको पता है क‍ि द‍िल्‍ली-एनसीआर की लाइफलाइन द‍िल्‍ली मेट्रो के जनक कौन हैं? हो सकता है आप नाम जानते भी हों ई-श्रीधरन, ज‍िन्‍हें भारत सरकार पद्म व‍िभूषण से भी सम्‍मान‍ित कर चुकी है, लेक‍िन क्‍या आपको पता है क‍ि गांव के सरकारी स्‍कूल से पढ़े और फ‍िर इंजीनि‍यर ई श्रीधरन ने मेट्रो मेन बनने का सफर कैसे तय क‍िया? आइए जानते हैं उनकी प्रेरक कहानी..

ई. श्रीधरन ऐसे ही दूरदर्शी इंज‍ीन‍ियर हैं, जिन्होंने अपनी प्रतिभा, अनुशासन और नेतृत्व क्षमता से न केवल भारत के बुनियादी ढांचे को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया बल्‍क‍ि आधुनिक परिवहन व्यवस्था की तस्वीर ही बदल दी. उन्‍हीं की बदौलत आज दिल्‍ली मेट्रो में सफर करते हुए हम म‍िनटों का ह‍िसाब रखते हैं.

साल 1932 में 12 जून को केरल के करुकापुथुर में जन्मे एल्लाट्टुवलपिल श्रीधरन आज उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसने अनुशासन, ईमानदारी और समयबद्धता को सफलता का सबसे बड़ा मंत्र बनाया. भारत के प्रसिद्ध सिविल इंजीनियर और ‘मेट्रो मैन’ के नाम से विख्यात श्रीधरन का जीवन इस बात का प्रमाण है कि दृढ़ इच्छाशक्ति और स्पष्ट कार्यप्रणाली से असंभव दिखने वाले सपनों को भी साकार किया जा सकता है.

श्रीधरन की प्राथमिक शिक्षा पलक्कड़ जिले के पट्टांबी के निकट सरकारी लोअर प्राइमरी स्कूल, चथन्नूर में हुई. इसके बाद उन्होंने बेसल इवेंजेलिकल मिशन हायर सेकेंडरी स्कूल से उच्च माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की और फिर पालघर के विक्टोरिया कॉलेज में अध्ययन किया. बाद में उन्होंने काकीनाडा के सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज से सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की. उनकी कार्यशैली की सबसे बड़ी पहचान निर्धारित समय सीमा के भीतर गुणवत्तापूर्ण कार्य पूरा करना रहा है. अपनी इसी पहचान की बदौलत उन्होंने सार्वजनिक परिवहन का चेहरा बदल दिया.

साल 1963 में रामेश्वरम और तमिलनाडु को जोड़ने वाला पम्बन पुल टूट गया था. रेलवे ने इसके पुनर्निर्माण के लिए छह महीने का लक्ष्य तय किया था. बाद में यह समय सीमा घटाकर तीन महीने कर दी गई और इसकी जिम्मेदारी श्रीधरन को दी गई. चुनौती को स्वीकार करते हुए उन्होंने मात्र 45 दिनों में पुल का पुनर्निर्माण कर दिखाया. यह उपलब्धि उनकी असाधारण कार्यक्षमता और नेतृत्व क्षमता का शुरुआती परिचय थी.

उनकी उल्लेखनीय उपलब्धियों में से एक कोंकण रेलवे परियोजना भी रही. भारत के पश्चिमी तट के साथ 760 किलोमीटर लंबी इस रेलवे लाइन का निर्माण आसान नहीं था. बेहद चुनौतीपूर्ण भूभाग, 150 से अधिक पुलों और कई तकनीकी कठिनाइयों के बावजूद इस परियोजना को महज सात वर्षों में पूरा कर लिया गया.

साल 1995 में दिल्ली मेट्रो रेल निगम (डीएमआरसी) के प्रबंध निदेशक के रूप में नियुक्त हुए श्रीधरन ने राष्ट्रीय राजधानी के सार्वजनिक परिवहन के सपने को वैश्विक सफलता की कहानी में बदल दिया. 1995 से 2012 तक दिल्ली मेट्रो का नेतृत्व करते हुए उन्होंने पहले चरण का निर्माण निर्धारित समय से पहले और तय बजट के भीतर पूरा कर दिखाया.

दिल्ली मेट्रो की सफलता ने देशभर के शहरों को प्रेरित किया. लखनऊ मेट्रो, कोच्चि मेट्रो जैसी परियोजनाओं के लिए यह एक आदर्श बनी, वहीं जयपुर और हैदराबाद जैसे शहरों ने भी मेट्रो रेल नेटवर्क अपनाने की दिशा में कदम बढ़ाए. कोलकाता मेट्रो की योजना को आकार देने में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा.

सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका योगदान थमा नहीं. वे राष्ट्रीय विकास से जुड़े मुद्दों पर सलाहकार और अग्रणी विचारक के रूप में सक्रिय बने रहे. वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव बान की-मून ने उन्हें सतत परिवहन पर संयुक्त राष्ट्र के उच्चस्तरीय सलाहकार समूह (एचएलएजी-एसटी) का सदस्य नियुक्त किया.

देश और दुनिया ने उनके योगदान को अनेक सम्मानों से सम्मानित किया. भारत सरकार ने ई श्रीधरन को 2001 में पद्म श्री और 2008 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया. फ्रांस सरकार ने 2005 में शेवेलियर डे ला लेगियोन डी’होनूर प्रदान किया. टाइम पत्रिका ने 2003 में उन्हें एशिया का हीरो और दुनिया के 100 सबसे प्रभावशाली लोगों में शामिल किया. वर्ष 2013 में जापान ने उन्हें अपने राष्ट्रीय सम्मान ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन- गोल्ड एंड सिल्वर स्टार से नवाजा.

वर्ष 2011 में दिल्ली मेट्रो में उनके उत्तराधिकारी के रूप में मंगू सिंह की नियुक्ति की गई, लेकिन उनके द्वारा स्थापित कार्य संस्कृति और मानक आज भी भारतीय बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए प्रेरणा बने हुए हैं.



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