नई दिल्ली: कांग्रेस पार्टी वंदे मातरम विवाद में बुरी तरह फंसती नजर आ रही है. पार्टी की सर्वोच्च संस्था कांग्रेस वर्किंग कमेटी यानी सीडब्ल्यूसी ने हाल ही में एक नया प्रस्ताव पास किया है. इसमें कहा गया है कि पार्टी के कार्यक्रमों में वंदे मातरम के सिर्फ पहले दो स्टैंजा ही गाए जाएंगे. कांग्रेस ने इसके लिए 1937 के एक पुराने प्रस्ताव का हवाला दिया है. लेकिन यह फैसला अब खुद कांग्रेस के गले की हड्डी बन गया है. पार्टी के अंदर ही कई बड़े नेता इस फैसले से खासे नाराज हैं. उनका स्पष्ट मानना है कि जब बीजेपी कई अन्य राष्ट्रीय मुद्दों पर बैकफुट पर थी, तब कांग्रेस ने यह विवाद खड़ा करके बीजेपी को मजबूत कर दिया है. दूसरी तरफ बीजेपी ने इस संवेदनशील मुद्दे को हाथोंहाथ लिया है. बीजेपी के बड़े नेता इसे सीधे तौर पर देशभक्ति से जोड़कर कांग्रेस पर तीखा प्रहार कर रहे हैं. इससे कांग्रेस का राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बिगड़ता दिख रहा है.
पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि देश में इस वक्त कई अहम मुद्दे चल रहे हैं. छात्रों की आकांक्षाएं और अयोध्या राम मंदिर में चंदा चोरी जैसे बड़े आरोपों से सरकार घिरी हुई थी. कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सरकार इन तमाम मुद्दों पर साफ तौर पर बैकफुट पर नजर आ रही थी. लेकिन वंदे मातरम के सिर्फ दो स्टैंजा गाने के फैसले ने पूरा नैरेटिव बदल दिया है. कांग्रेस के एक नेता का साफ कहना है कि हमें बीजेपी की ताकत वाले पिच पर बिल्कुल नहीं खेलना चाहिए था.
प्राइवेट फंक्शन के अजीब तर्क में बुरी तरह से फंस गई राहुल की पार्टी. (File Photo : PTI)
संसद में बिल पास होने के वक्त कांग्रेस ने क्यों साधी थी चुप्पी?
संसद के मानसून सत्र में राष्ट्र गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक 2026 पास हुआ है. इस महत्वपूर्ण बिल का मकसद वंदे मातरम को जन गण मन जैसा वैधानिक दर्जा देना है. यह बिल 30 जुलाई को लोकसभा में सिर्फ 15 मिनट के अंदर बिना किसी चर्चा के पास हो गया था. उस वक्त संसद में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के सांसद भारी हंगामा कर रहे थे. शोरगुल के बीच बिल पास हो गया और कांग्रेस ने इसका कोई ठोस विरोध दर्ज नहीं किया.
अब कांग्रेस के एक अन्य वरिष्ठ सीडब्ल्यूसी मेंबर ने कहा, ‘हमने संसद में इस बिल का विरोध इसलिए नहीं किया क्योंकि उस वक्त सदन में हंगामा चल रहा था. बिल शोरगुल के बीच पास हो गया.’ लेकिन उन्होंने यह भी माना कि पार्टी ने संसद के बाहर भी इसका कोई विरोध नहीं किया. जबकि परिसीमन या एफसीआरए संशोधन बिल पर पार्टी ने बाहर आकर मीडिया में अपनी बात मजबूती से रखी थी. अब अचानक से वंदे मातरम पर स्टैंड लेने से पार्टी बहुत ही असहज स्थिति में आ गई है.
अभिषेक मनु सिंघवी ने पार्टी को बचाने के लिए क्या कानूनी तर्क दिया?
- विवाद तेजी से बढ़ता देख कांग्रेस के कानूनी विंग के प्रमुख अभिषेक मनु सिंघवी मैदान में उतरे हैं. उन्होंने पार्टी लीडरशिप को अपनी कानूनी राय दी है और कानून की व्याख्या की है.
- सिंघवी ने पब्लिक और प्राइवेट फंक्शन के बीच एक लकीर खींचने की कोशिश की है. राज्यसभा सांसद सिंघवी ने कहा, ‘कानून राष्ट्रीय आधिकारिक कार्यक्रमों की बात करता है. यह आपके घर, होटल या संस्थान में होने वाले प्राइवेट कार्यक्रमों के बारे में कुछ नहीं कहता है.’
- सिंघवी का सीधा तर्क है कि संशोधित कानून वंदे मातरम को एक खास तरीके से गाने के लिए मजबूर नहीं करता है. कानून सिर्फ राष्ट्रगीत गाने में बाधा डालने या रोकने पर ही लागू होता है.
- सिंघवी ने कहा, ‘कांग्रेस अपने आंतरिक पार्टी कार्यक्रमों की बात कर रही है, सरकारी कार्यक्रमों की नहीं.’ उन्होंने बीजेपी पर आरोप लगाया कि वह देशभक्ति को छह स्टैंजा के टेस्ट में जबरन बदल रही है.
सिंघवी के मुताबिक कांग्रेस ने ही वंदे मातरम को राष्ट्रगान के बराबर का दर्जा दिया था.
1937 के प्रस्ताव का हवाला देकर कन्हैया कुमार ने क्या सफाई दी?
कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने अपने ताजा फैसले को सही ठहराने के लिए इतिहास का सहारा लिया है. पार्टी ने 1937 के एक पुराने प्रस्ताव का विशेष जिक्र किया है. कांग्रेस का तर्क है कि महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे स्वतंत्रता संग्राम के दिग्गजों ने भी यही माना था. उन्होंने सार्वजनिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम के पहले दो स्टैंजा तक ही सीमित रखने का उस वक्त समर्थन किया था.
इस फैसले का बचाव करते हुए कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार ने कहा, ‘हमें एक स्पष्ट स्टैंड लेना था. अगर हम ऐसा नहीं करते, तो पार्टी के रैंक और फाइल के बीच भारी कन्फ्यूजन पैदा होता.’ उनका मानना है कि स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत को बचाना पार्टी की अहम जिम्मेदारी है.
कन्हैया ने कहा कि यह हमारी विरासत है और हमें हर हाल में इसकी रक्षा करनी होगी. हालांकि यह सफाई बीजेपी के तीखे हमलों को रोकने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रही है.
राज्यों में अलग-अलग नियमों से कांग्रेस के अंदर कितना भ्रम फैल रहा है?
कांग्रेस के इस विवादास्पद फैसले ने राज्यों में भी भारी भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है. स्वतंत्रता दिवस के आधिकारिक कार्यक्रमों में इसका असर साफ तौर पर दिखा. कांग्रेस शासित हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना में पूरा वंदे मातरम शान से गाया गया. इसके अलावा झारखंड में भी पूरा गीत गाया गया, जहां कांग्रेस गठबंधन सरकार का एक जूनियर हिस्सा है. लेकिन केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने राष्ट्रीय गीत गाने से परहेज किया.
केरल से कर्नाटक तक कांग्रेस में घमासान, वंदे मातरम पर साफ स्टैंड नहीं होने से पार्टी कैडर में भारी कन्फ्यूजन. (File Photo : PTI)
यह गहरा विरोधाभास राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के लिए नई मुसीबत खड़ी कर रहा है. जब अभिषेक मनु सिंघवी से केरल सरकार के इस कदम के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने गोलमोल जवाब दिया.
सिंघवी ने कहा, ‘अलग-अलग राज्य सरकारें अपने फैसले खुद ले सकती हैं.’ यह बयान दिखाता है कि वंदे मातरम को लेकर खुद कांग्रेस के अंदर एक मजबूत राय नहीं है. राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी कुछ और कह रही है और राज्यों में कुछ और ही हो रहा है.
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कांग्रेस के फैसले को खतरनाक क्यों बताया?
- बीजेपी ने कांग्रेस के इस रुख को बिना देर किए एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना लिया है. रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सोशल मीडिया के जरिए कहा कि कांग्रेस द्वारा वंदे मातरम का विरोध करना अत्यंत दुर्भाग्यजनक विषय है.
- राजनाथ सिंह ने साफ किया कि संसद से पास हुआ कोई भी कानून देश के हर व्यक्ति के लिए पूरी तरह बाध्यकारी है. उन्होंने कांग्रेस के रवैये को संविधान की दृष्टि से बहुत गंभीर विषय करार दिया है.
- राजनाथ सिंह ने कहा, ‘यदि कोई इसे मानने से मना करता है, तो संविधान के प्रति उसकी निष्ठा संदेह के घेरे में आ जाती है.’ उन्होंने कांग्रेस के 1937 के प्रस्ताव वाले तर्क की भी जमकर धज्जियां उड़ाईं.
राजनाथ सिंह ने कहा कि वह प्रस्ताव कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की कट्टरपंथी मांगों के आगे झुककर पास किया था. उनका मानना है कि इसका भारी खामियाजा देश को भविष्य में विभाजन के रूप में भुगतना पड़ा था. उन्होंने चेतावनी दी कि कट्टरपंथियों के आगे समर्पण करना देश के भविष्य के लिए एक गंभीर खतरा है.
रविशंकर प्रसाद ने राजेंद्र प्रसाद और सरदार पटेल का जिक्र क्यों किया?
बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद ने भी कांग्रेस को ऐतिहासिक तथ्यों के साथ बुरी तरह घेरा है. उन्होंने सीधा आरोप लगाया कि मुस्लिम परस्ती के भारी दबाव में कांग्रेस ने उस वक्त यह फैसला लिया था. रविशंकर प्रसाद ने भारत की संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद का जिक्र किया. उन्होंने बताया कि 24 जनवरी 1947 को राजेंद्र प्रसाद ने ही घोषणा की थी कि वंदे मातरम भारत का राष्ट्रगीत होगा.
रविशंकर प्रसाद ने कहा कि राजेंद्र प्रसाद ने कभी नहीं कहा था कि वंदे मातरम को काट-छांट कर गाया जाएगा. उन्होंने एक और बेहद अहम ऐतिहासिक घटना का हवाला दिया. 15 अगस्त 1947 को जब देश आजाद हो रहा था, तब महान संगीतकार ओंकारनाथ ठाकुर ने इसे गाया था. उन्होंने सरदार पटेल के विशेष आग्रह पर यह पूरा गीत गाया था.
क्या आने वाले चुनावों में कांग्रेस को इस विवाद की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी?
- वंदे मातरम विवाद कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से जोखिम बन चुका है. आने वाले कई विधानसभा चुनावों में बीजेपी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाने वाली है. बीजेपी हमेशा से राष्ट्रवाद के मुद्दे पर बहुत आक्रामक रही है. कांग्रेस ने उसे यह नया मुद्दा एक सजी हुई थाली में सौंप दिया है.
- राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस को इस वक्त जनता से जुड़े बुनियादी और जमीनी मुद्दों पर ही फोकस करना चाहिए था. महंगाई और बेरोजगारी जैसे अहम मुद्दों से ध्यान हटकर अब राष्ट्रवाद पर आ गया है.
- विपक्ष की राजनीति में नैरेटिव सेट करना हमेशा सबसे अहम होता है. कांग्रेस इस नैरेटिव की लड़ाई में बहुत पीछे पिछड़ती दिख रही है. जब तक कांग्रेस के नेता कानूनी तर्कों से आम जनता को समझाएंगे, तब तक बीजेपी का राष्ट्रवाद वाला संदेश घर-घर पहुंच चुका होगा.
- राजनीति में पब्लिक और प्राइवेट फंक्शन का यह कानूनी तर्क आम जनता आसानी से नहीं समझती है. जनता सिर्फ यह देखती है कि राष्ट्रगीत का पूरा सम्मान हो रहा है या नहीं. इसलिए कांग्रेस को इस विवाद से बाहर निकलने के लिए जल्द ही एक नई और ठोस रणनीति की जरूरत होगी.
वंदे मातरम के कानून और उसके उल्लंघन पर क्या कहता है नया संशोधन?
मानसून सत्र में पास हुए इस नए कानून को समझना बहुत ज्यादा जरूरी है. राष्ट्र गौरव अपमान निवारण अधिनियम में ताजा संशोधन के बाद नियम बहुत ज्यादा सख्त हो गए हैं. अब वंदे मातरम का किसी भी तरह से अपमान करना एक गंभीर अपराध की श्रेणी में आ गया है. इस कड़े कानून का सीधा उद्देश्य राष्ट्रगीत को राष्ट्रगान जन गण मन के बराबर का कानूनी संरक्षण प्रदान करना है. अगर कोई व्यक्ति इस गीत को गाने से रोकता है, तो उस पर सख्त कानूनी कार्रवाई होना तय है.
कानून के जानकारों का कहना है कि यह संशोधन देश में एकरूपता लाने के लिए किया गया है. बीजेपी सरकार का मजबूत तर्क है कि राष्ट्र के प्रतीकों का सम्मान हर हाल में होना ही चाहिए. यही बड़ी वजह है कि सरकार ने इस बिल को प्राथमिकता के आधार पर पास कराया है.
कांग्रेस के लिए मुश्किल यह है कि उसने संसद में इस मुद्दे पर अपना पक्ष मजबूती से नहीं रखा. अब पार्टी के नेता बाहर जो भी तर्क दें, वह जनता के बीच बहुत ही कमजोरी का संकेत दे रहा है. कांग्रेस को अपने राजनीतिक फैसलों का असली असर जमीन पर समझने की बहुत जरूरत है.