कोलकाता: भाजपा ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक जीत हासिल की है. बीती 4 मई को घोषित परिणामों के अनुसार, भाजपा ने 294 सीटों में से 206 सीटें जीत लीं. 15 साल के तृणमूल शासन के बाद सत्ता परिवर्तन हो गया है और अब बंगाल में भाजपा की सरकार बनने जा रही है.
यह महज एक राजनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि 84 साल बाद बंगाल में हिंदुत्ववादी विचारधारा की वापसी है. इससे पहले 1941-42 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की सक्रिय भूमिका वाली ‘श्यामा-हक सरकार’ बनी थी, जिसमें वे वित्त मंत्री थे.
206 सीटों का ‘भगवा’ जनादेश
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी 1939 में हिंदू महासभा से जुड़े और जल्द ही बंगाल हिंदू महासभा के प्रमुख नेता बन गए. 1941 में बंगाल की राजनीति में बड़ा उलटफेर हुआ. मुस्लिम लीग की सरकार गिरने के बाद ए.के. फजलुल हक की अगुवाई में प्रोग्रेसिव कोएलिशन सरकार बनी. 12 दिसंबर 1941 को गठित इस सरकार में डॉ. मुखर्जी वित्त मंत्री बने.
पश्चिम बंगाल से बीजेपी और आरएसएस का सौ साल से भी ज्यादा पुराना रिश्ता है. तस्वीर AI से निर्मित है.
ऐतिहासिक संयोग: 1941 से 2026 तक का सफर
यह सरकार दिसंबर 1941 से 1943 तक चली, हालांकि डॉ. मुखर्जी ने 20 नवंबर 1942 को इस्तीफा दे दिया. उस दौरान उन्होंने हिंदू हितों की मजबूती से रक्षा की और ब्रिटिश नीतियों का खुलकर विरोध किया. सांप्रदायिक तनाव के उस दौर में, जब मुस्लिम लीग पाकिस्तान की मांग कर रही थी, डॉ. मुखर्जी ने हिंदू महासभा के माध्यम से हिंदुओं को एकजुट किया और बंगाल विभाजन का समर्थन किया ताकि हिंदू-बहुल क्षेत्र भारत में रह सकें.
‘श्यामा-हक सरकार’ को हिंदू-मुस्लिम एकता की कोशिश के रूप में भी देखा जाता है, लेकिन यह मुख्य रूप से हिंदू महासभा के प्रभाव वाली सरकार थी.
विचारक और राष्ट्रवादी डॉ. मुखर्जी
डॉ. मुखर्जी केवल मंत्री ही नहीं, बल्कि गहरे विचारक भी थे. उन्होंने ‘अवेक हिंदुस्थान’ जैसी पुस्तक लिखी, जिसमें राष्ट्रवाद और हिंदू संस्कृति पर जोर दिया गया. बालराज माधोक ने अपनी जीवनी में लिखा है कि मुखर्जी ने हिंदू महासभा को सशक्त राजनीतिक ताकत बनाया और देश की एकता के लिए संघर्ष किया. तथागत रॉय की किताब ‘द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी’ में भी बंगाल में हिंदू हितों की रक्षा और ब्रिटिश विरोध का विस्तृत वर्णन है.
वैचारिक पुनर्जागरण और भविष्य की राह
1947 के बाद वे नेहरू सरकार में मंत्री बने, लेकिन 1950 में नेहरू-लियाकत समझौते के विरोध में इस्तीफा दे दिया. 1951 में उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की मदद से भारतीय जनसंघ की स्थापना की. दिल्ली के कनॉट प्लेस के पास राजा बाजार स्थित रघुमल कन्या विद्यालय में 21 अक्टूबर 1951 को हुई बैठक में डॉ. मुखर्जी और बलराज माधोक ने जोशीले भाषण दिए. डॉ. मुखर्जी जनसंघ के पहले अध्यक्ष चुने गए. आज की भाजपा का मूल यही जनसंघ है.
डॉ. मुखर्जी का नारा था- “एक देश, एक राष्ट्र, एक संस्कृति”. 1953 में कश्मीर में उनकी रहस्यमयी मृत्यु हो गई, लेकिन उनकी विचारधारा आज भी भाजपा की प्रेरणा है.
भाजपा और मुखर्जी की विरासत
भाजपा के नेता डॉ. मुखर्जी को अपना आदर्श मानते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर अमित शाह तक सभी उन्हें श्रद्धांजलि देते हैं. मोदी जी अक्सर कहते हैं कि डॉ. मुखर्जी की देशभक्ति और हिंदुत्व की सोच भाजपा की नींव है. यहां तक कि पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी जैसे विपक्षी नेता भी उनकी ईमानदारी की सराहना करते थे.
2026 की यह जीत 1941-42 की श्यामा-हक सरकार के बाद पहला मौका है जब हिंदू महासभा की वैचारिक विरासत सत्ता में आई है. यह डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के सपनों की पूर्ति का प्रतीक है.
पश्चिम बंगाल में 9 मई को शपथग्रहण समारोह.
भाजपा ने विकास, सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान, अवैध घुसपैठ, हिंसा और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर जनता का विश्वास जीता है. बलराज माधोक ने एक बार लेखक से कहा था कि डॉ. मुखर्जी ने हिंदू समाज को राजनीतिक जागरूकता प्रदान की. तथागत रॉय की किताब में उन्हें बंगाल के हिंदुओं के लिए प्रेरणा बताया गया है.
1941 में हिंदू महासभा ने बंगाल में अपनी छाप छोड़ी थी. 2026 में भाजपा ने उसे नई ऊंचाई दी है. नई सरकार डॉ. मुखर्जी की स्मृति में हिंदू-मुस्लिम सद्भाव, शिक्षा, रोजगार और समग्र विकास पर काम करेगी. कई दशकों बाद बंगाल में हिंदुत्ववादी सरकार का आगमन उनके बलिदान को सार्थक बनाता है.